Friday, April 19, 2024
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उपेक्षित धरोहरों की चिंता, चिंतन और संरक्षण की दरकार

आज जब की विश्व विरासत दिवस मना रहे है ऐसे में इस दिवस की सार्थकता के लिए जरूरी है समुदाय और सरकार सदियों से उपेक्षित धरोहरों को संभालने, संवारने और जीवित रखने पर भी विचार करें। यही नहीं यूनेस्को ने जिन स्थलों को विरासत स्थल घोषित किया है उनमें भी अधिकांश की स्थिति अच्छी नहीं हैं। हमारे देश भारत में अभी तक 40 विश्व धरोहर घोषित की गई हैं। इनके अलावा भी हजारों विरासत स्थल है जो उपेक्षा की वजह से अस्तित्व का संघर्ष कर रही हैं। कई तो धूल धूसरित हो अपना अस्तिव्व खो चुकी है।
 देश को छोड़ हम राजस्थान की ही चर्चा करें तो अनेक धरोहरों की हालत के बारे में समय – समय पर लेखकों और मीडिया द्वारा समाचार पत्रों की सुर्खियों में देखने को मिलता है। अकेले हाड़ोती में ही राज्य पुरात्व विभाग के अधीन करीब 55 संरक्षित स्मारक है और इससे कहीं अधिक असंरक्षित हैं। जो संरक्षित हैं उनमें से नमूने के तौर पर विश्व विरासत में शामिल झालवाड़ के गागरोन दुर्ग की हालत देख कर आने वालों की जुबानी सुनी जा सकती है या जा कर देखी जा सकती है। अटरु का गडगच मंदिर पत्थरों का ढेर बन गया है अन्य मंदिर खंडहर बन रहे हैं। दरा घाटी में गुप्तकालीन शिव मंदिर के चार स्तंभ मंदिर होने का अहसास कराते हैं। संरक्षित स्मारकों के हालात ऐसे हैं तो इस सूची के बाहर अन्य स्मारकों का तो क्या कहें। ऐसे स्मारकों को खोजबीन कर लेखक प्रकाश में लाते रहते हैं। आजादी के 75 सालों में और 42 वें विश्व धरोहर दिवस के संदर्भ में देश में सबसे ज्यादा हास विरासत का हुआ और आज भी उपेक्षित ही बनी हुई है।
सवाल उठता है कि आखिर हमारी गौरवशाली धरोहर का संरक्षण, रखरखाव और जीर्णोधार कैसे हो? एक कदम यह हो सकता है की पुरातत्व विभाग के स्मारकों के बारे में एक कील भी नहीं लगेगी जैसे नियमों का सरलीकरण किया जाना चाहिए। स्मारकों के जीर्णोधार और रख रखाव में जनभागीदारी को व्यापक रूप से जोड़ा जाने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में बेस कीमती मूर्तियां चोरी चली जाती हैं। सुरक्षा की दृष्टि से स्थानीय स्तर पर समुदाय और संस्थाओं जेसे पंचायत, नगरपालिका आदि का सहयोग लिया जा सकता है।
जरूरी है की संरक्षण और जीर्णोधार के लिए दो स्तर पर कार्ययोजना बनाई जाए , एक लघु अवधि की तात्कालिक योजना और दूसरी लंबी अवधि की दीर्घकालिक योजना। व्यापक सर्वेक्षण किया जा कर धरोहरों की सूची बने और उसके आधार पर स्थिति का आंकलन करते हुए एक ब्लू प्रिंट तैयार हो और कार्यकारी योजना बनाई जाए। जो बीत गया,जितना क्षरण हो चुका उसकी भरपाई तो संभव नहीं पर जो कुछ बचा है उसी को बचाने और संरक्षित रखने पर आज के दिन विचार हो तो यहीं इस दिवस की सार्थकता हो सकती है।
 विश्व धरोहर दिवस के संदर्भ में चर्चा करें तो सांस्कृतिक धरोहर स्थलों में स्मारक, स्थापत्य की इमारतें, शिलालेख, गुफा आवास, विश्व महत्व वाले स्थान, इमारतों का समूह, अकेली इमारत,मूर्तिकारी-चित्रकारी-स्थापत्य की झलक वाले स्थल, ऐतिहासिक, सौन्दर्य एवं मानव विज्ञान तथा विश्व दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों को शामिल किया जाता है। प्राकृतिक धरोहर स्थल में वन क्षेत्र, जीव, प्राकृतिक स्थल, भौगोलिक महत्व के ऐसे स्थान जो नष्ट होने के करीब हैं, वैज्ञानिक महत्व की जगह आदि को शामिल किया जाता है। जो स्थल सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, उन्हें मिश्रित धरोहर में शामिल किया जाता है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को देखें तो संयुक्त राष्ट्र संघ की यूनेस्को संस्था की पहल पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संधि की गई, जो विश्व के सांस्कृतिक, प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। वर्ष 1982 में इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ माउंटेस एंड साईट (ईकोमार्क) नामक संस्था ने टयूनिशिया में अन्तर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल दिवस का आयोजन किया गया तथा इसी सम्मेलन में सर्वसम्मति से निर्णय लेकर विश्व में प्रतिवर्ष ऐसी संरक्षित धरोहर के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए 18 अप्रेल को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत दिवस आयोजित करने की घोषणा की गई।
किसी भी स्थान विशेष की धरोहर को संरक्षित करने के लिए ’अन्तर्राष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल परिसर’ तथा ’विश्व संरक्षण संघ’ द्वारा आंकलन कर विश्व धरोहर समिति से सिफारिश की जाती है। समिति की बैठक वर्ष में एक बार आयोजित की जाती है।
करीब 142 राष्ट्रीय पार्टियों में स्थित समस्त विश्व धरोहरों का वर्गीकरण पांच भूगोलिय भूमंडलों में किया गया है। भूगोलिय भूमंडलों में अफ्रीका, अरब राज्य जिनमें आस्ट्रेलिया और ओशनिया भी शामिल हैं, यूरोप और उत्तरी अमेरिका विशेषतः संयुक्त राज्य और कनाडा तथा दक्षिणी अमेरिका एवं कैरीबियन आते हैं। रूस एवं काॅकेशस राष्ट्र यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका भूमंडल में शामिल किए गए हैं। यूनेस्को द्वारा अब तक विश्व में 1157 धरोहर स्थलों का चिन्हिकरण कर उन्हें विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है। इनमें  ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक संपदा से भरपूर हमारे अपने भारत देश में 40 स्थलों को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।
विश्व धरोहर में शामिल होने का सिलसिला वर्ष 1983 से अनवरत चल रहा है। भारतीय सांस्कृतिक और प्राकृतिक दृष्टि से भारत में वर्ष 1983 में उत्तर प्रदेश में आगरा का ताजमहल एवं किला, महाराष्ट्र में अजंता एवं एलोरा की गुफाएं, वर्ष 1984 में उडीसा राज्य का कोणार्क मंदिर व तमिलनाडु के महाबलीपुरम के स्मारक, वर्ष 1985 में असम का कांजीरंगा राष्ट्रीय अभ्यारण्य तथा असम का मानस राष्ट्रीय अभ्यारण्य, वर्ष 1986 में गोवा का पुराना चर्च, कनार्टक में हम्पी के स्मारक, मध्यप्रदेश में खजुराहो के मंदिर एवं स्मारक व उत्तर प्रदेश में फतेहपुर सीकरी, वर्ष 1987 में महाराष्ट्र में एलीफैंटा की गुफाएं, तमिलनाडु का चोल मंदिर, कर्नाटक में पट्टाइक्कल के स्मारक, पश्चिम बंगाल का सुंदरवन राष्ट्रीय अभ्यारण्य को विश्व धरोहर में शामिल किया गया।
ऐसे ही वर्ष 1989 में मध्यप्रदेश स्थित सांची के बौद्ध स्तूप, वर्ष 1993 में दिल्ली का हुमायूं का मकबरा एवं कुतुबमीनार तथा मध्यप्रदेश में भीमवेटका, वर्ष 2002 में बिहार में महाबोधि मंदिर बौधगया, वर्ष 1999 में पश्चिम बंगाल में भारतीय पर्वतीय रेल दार्जिलिंग, वर्ष 2004 में गुजरात में चंपानेर पावागढ़ का पुरातत्व पार्क तथा महाराष्ट्र छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, वर्ष 2005 में उत्तराखंड में फूलों की घाटी एवं तमिलनाडु में भारतीय पर्वतीय रेल नीलगिरी, वर्ष 2007 में दिल्ली का लाल किला, वर्ष 2008 में हिमाचल प्रदेश में भारतीय पर्वतीय रेल कालका-शिमला, वर्ष 2012 में पश्चिमी घाट कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, वर्ष 2014 में गुजरात में रानी की वाव पाटन तथा हिमाचल प्रदेश में ग्रेट हिमालियन राष्ट्रीय उद्यान कुल्लू एवं वर्ष 2016 में चंडीगढ़ केपिटल काॅम्पलेक्स , कंचनजंगा नेशनल पार्क सिक्किम,नालंदा , बिहार, 2017 में अहमदबाद का ऐतिहासिक शहर,गुजरात, 2018 में विक्टोरिया गोथिक एंड आर्ट मुंबई महाराष्ट्र, 2021 में कालेश्वर मंदिर तेलंगाना और 2022 में हड़प्पा सभ्यता, धोलावीरा, गुजरात को विश्व विरासत घोषित किया गया।
राजस्थान में वर्ष 1985 में भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय अभ्यारण्य प्रथम बार विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। इसके उपरांत वर्ष 2010 में जयपुर के जंतर-मंतर तथा वर्ष 2013 में पहाड़ी किलों में आमेर का किला, झालावाड़ में गागरोन का किला, चित्तौड़गढ़ किला, राजसमंद का कुंभलगढ़, सवाई माधोपुर का रणथंभौर दुर्ग तथा जैसलमेर का सोनार किला तथा 2000 में जयपुर की चारदीवारी को विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।
विश्व विरासत दिवस पर  संरक्षित धरोहरों का स्मरण अच्छा है और प्रत्येक का प्रयास होना चाहिए कि वह इस दिवस को आवश्यक रूप से मनाए।  इसके लिए आप अपने शहर या शहर के नजदीक स्थल को देखने जा सकते हैं, अपने बच्चों को दिखा सकते हैं तथा आपके यहां आने वाले मेहमानों को भी इन स्थलों की सैर करा सकते हैं। विद्यालय प्रबंधक भी ऐसे स्थलों या उपलब्ध संग्रहालय का अवलोकन बच्चों का सामूहिक रूप से करा सकते हैं। राजस्थान में सरकार द्वारा संचालित संग्रहालयों को देखने के लिए इस दिन किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता है। इसका उद्देश्य यही है कि बच्चे और वहां के नागरिक अधिकाधिक संग्रहालयों में जाएं तथा वहां संजोई गई अपनी समृद्ध विरासत को देखें और समझें। ऐसे स्थलों को देखकर हमें हमारी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक एवं भौगोलिक संपदा पर गर्व होगा और हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हम जिस देश-प्रदेश के निवासी हैं, वह कितनी समृद्ध विरासत अपने में संजोए है। साथ ही  विरासत को बचाने, संवारने, जीर्णोधार और सुरक्षा की भी  चिंता और चिंतन कर उपायों को कारगर बनाए।
(लेखक मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं व पर्यटन व ऐतिहासिक स्थलों से जुड़े विषयों पर लिखते हैं आपकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी है) 
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