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कुंवर नारायण और कविता की ज़रुरत

बहुत कुछ दे सकती है कविता
क्यों कि बहुत कुछ हो सकती है कविता
जिंदगी में
अगर हम जगह दें उसे
जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़
जैसे तारों को जगह देती है रात
हम बचाये रख सकते हैं उसके लिए
अपने अंदर कहीं
ऐसा एक कोना
जहाँ जमीन और आसमान
जहाँ आदमी और भगवान के बीच दूरी
कम से कम हो।
वैसे कोई चाहे तो जी सकता है
एक नितांत कविता रहित जिंदगी
कर सकता है
कवितारहित प्रेम।

कविता की ऎसी ज़रुरत को ज़िंदगी स्वर देते हुए कुंवर नारायण ने दुनिया को अलविदा कह दिया। नयी कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कवि कुंवर नारायण का 90 साल की उम्र में बुधवार को निधन हो गया। मूलरूप से फैजाबाद के रहने वाले कुंवर अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (1959) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। परम्परा के आईने में वर्तमान को देखने वाले संवेदनशील कवि के रूप में उनकी निराली। उन्होंने कविता के साथ-साथ कहानी, लेख व समीक्षाओं के अलावा सिनेमा, रंगमंच में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाओं का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। 2005 में कुंवर नारायण को साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत किया गया था।

कुंवर नारायण शास्त्रीय अर्थ में चाहे परम्परा की उज्ज्वलता,कला की उदारता, बुद्धि की सघनता और संवेदना की ईमानदारी के कवि हैं, पर सच कहें तो उन का मन प्यार में डूबकर अपने संसार को रचता रहा।
तभी तो वह कह गए –

इतना कुछ था
इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया

कवि कुंवर नारायण वर्तमान में दिल्ली के सीआर पार्क इलाके में पत्नी और बेटे के साथ रहते थे। उनकी पहली किताब ‘चक्रव्यूह’ साल 1956 में आई थी। साल 1995 में उन्हें साहित्य अकादमी और साल 2009 में उन्हें पद्म भूषण सम्मान भी मिला था। इनके अतिरिक्त व्यास सम्मान, कुमार आशान पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार, राष्ट्रीय कबीर सम्मान, शलाका सम्मान, मेडल ऑफ़ वॉरसा यूनिवर्सिटी, पोलैंड और रोम के अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फ़ेरेनिया सम्मान भी उनकी लेखनी और जीवन की ईमानदार सक्रियता के प्रमाण कहे जा सकते हैं। वह आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेंद्र देव और सत्यजीत रे काफी प्रभावित रहे। कुंवर जी की प्रतिष्ठा सर्वमान्य है। उनकी ख्याति सिर्फ़ एक लेखक की तरह ही नहीं, बल्कि रसिक विचारक के समान भी है। याद रहे कि उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएट किया था। बाद में पारिवारिक व्यवसाय से हटकर हिंदी लेखन में ऐसा ऊंचा स्थान अर्जित कर दिखाया और दुनिया को सीधे-सपाट शब्दों में बता कर चल दिए कि –

पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक
अच्छा लगा,
पेड़ की छाया का सुख
अच्छा लगा,
डाल से पत्ता गिरा
पत्ते का मन,
अब चलूँ सोचा,
तो यह अच्छा लगा।

कविता के चितेरे मानते हैं कि कुंवर जी हिंदी में विश्लेषण को नई दिशा देने वाले अनोखे सर्जक हैं। गौरतलब है कि इधर इस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम यतींद्र मिश्र और पंकज चतुर्वेदी ने किया है। उन्होंने लगातार कई लेख लिख कर कुंवर नारायण के काव्य वैभव को जन-सापेक्ष बनाया है । जीने का उदात्त आशय में कुंवर नारायण पर दस निबंधात्मक लेख हैं। इनमें पचास वर्षों से अधिक समय में फैली उनकी काव्य-संपदा, कवि-दृष्टि और कवि-व्यक्तित्व को पहचानने की कोशिश की गई है। मध्यम मार्ग की कविता शीर्षक के अंतर्गत कुंवर नारायण का एक साक्षात्कार भी प्रकाशित है। ये सभी लेख कुंवर नारायण को गहराई से समझने में मदद करते हैं।

कुंवर नारायण के रचना-संसार को कोई एक नाम देना सम्भव नहीं है। वह इस दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार माने गए हैं। उनकी काव्ययात्रा चक्रव्यूह से शुरू हुई थी। उनके संग्रह परिवेश हम तुम के माध्यम से मानवीय संबंधों की एक विरल व्याख्या हम सबके सामने आई। उन्होंने अपने प्रबंध आत्मजयी में मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा। कुँवर नारायण ने हिन्दी के काव्य पाठकों में एक नई तरह की समझ पैदा की। नचिकेता को आधार बनाकर कुँवर नारायणजी की जो कृति 2008 में आई, वाजश्रवा के बहाने, उसमें उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा उसे अत्यधिक सात्विक शब्दावली में काव्यबद्ध किया है। अन्य संग्रहों के अलावा उनकी कहानियों तथा विचार-समीक्षा का भी अलग महत्त्व है।

बहरहाल, कुंवर नारायण जी हमें आश्वस्त कर गए हैं –

अबकी अगर लौटा तो
बृहत्तर लौटूँगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बाँधे लोहे की पूँछें नहीं
जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूँगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से

अबकी अगर लौटा तो
मनुष्यतर लौटूँगा
घर से निकलते
सड़कों पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं

अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूँगा

अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूँगा

कुंवर जी ! सृजन-संसार का आज और आने वाला कल भी आप का इंतज़ार करेगा। आप फिर आएंगे ना ?
———————————————–

(लेखक शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ ) में ,हिंदी विभाग में प्राध्यापक हैं।)

मो. 9301054300

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