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गांधी विचार पर आधारित हो नई शिक्षा नीति

भारत अलौकिक आध्यात्मिक महापुरुषों की पुण्य भूमि है। कभी यह सोने की चिड़िया भी था। लॉर्ड मैकाले ने इसे सांस्कृतिक सम्पदा और नैतिक मूल्यों से युक्त आध्यात्मिक दैदीप्यमान स्वरूप में देखा था। अंग्रेज़ सत्ता ने उसके इस अभिमत को स्वीकार कर लिया था कि भारत की प्राचीन शिक्षण-पद्धति को इस प्रकार से परिवर्तित कर दिया जाय कि भारतीय यह सोचने लगे कि जो कुछ भी विदेशी एवं आंग्ल है वही श्रेष्ठ एवं महान है, इस तरह वे अपना आत्म सम्मान, आत्म गौरव तथा मूल संस्कृति को खो देंगे और वही बन जाएँगे जो हम अंग्रेज़ चाहते हैं- पूर्ण रूप से हमारे नेतृत्व के अधीन एक देश। यह सच्चाई है कि १८२ साल बाद भी स्वाधीन भारत की शिक्षा-प्रणाली में, मैकाले की शिक्षा-प्रणाली के मूल सार आज भी विद्यमान हैं। मैकाले की भारत में को ग़ुलाम बनाए रखने की कुटिल नीति को जैनाचार्य विद्यासागर ने गहराई से समझा है। उसी को पलटने के लिए उनके आशीर्वाद से प्रतिभा स्थली ज्ञानोदय विद्यापीठों का सफलता से तीन राज्यों में संचालन चल रहा है। मोहनदास गांधी ने तो मैकाले की मानसिकता को समझकर भारत पर अंग्रेज़ी राज्य की सत्ता को झकझोर स्वतंत्रता लक्ष्य साध लिया था और ग़ुलाम मानसिकता पर आधारित अंग्रेज़ों की शिक्षा-प्रणाली से मुक्ति के लिए हर संभव जन जागरण जगाया था। इसके विपरित सत्तर साल की स्वाधीनता के बावजूद शिक्षा-प्रणाली से देश का समाज स्वतंत्र राष्ट्र की गरिमा से बहुत है।

शिक्षा-प्रणाली की कमज़ोरी से भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नक्सलवाद, अपराध, अनैतिकता, चारित्र का का पतन जैसी बुराइयों से देश ग्रस्त है। शिक्षा-प्रणाली से युवा पीढ़ी को बेरोज़गारी का सामना करना पड़ा रहा है। आत्म हत्या और निराशा का वातावरण पनपा है। चाहे ओलम्पिक हो, नोबल पुरस्कार या ज्ञान-विज्ञान में हम निचली क़तार में हैं। गुणवत्ता विहीन शिक्षा-प्रणाली से मुक्ति पाने के लिए चार आयोग गठित किए गए। किंतु अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सके है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कीसरकार के ने नई शिक्षा नीति बनाने की पहल की है। जिसे परिपूर्ण स्वरूप देने के लिए पूर्व राज्यसभा सदस्य इसरो के पूर्व प्रमुख, पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण अलंकार से सम्मानित तथा शिक्षा के क्षेत्र के जाने-माने विद्वान कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन की प्रमुखता में मानव संसाधन मंत्रालय ने नौ सदस्यीय समिति गठित की है।

यह समिति शीघ्र ही नई शिक्षा नीति को अंतिम रूप देने वाली है। भारत का भारत के लिए भारतीयता पर आधारित शिक्षा का लक्ष्य ‘जीवन का निर्माण हो, निर्वाह नहीं, इस मूल भावना को सामने रख कर गांधी ने सितंबर १९२० में यंग इण्डिया में लिखा था-“माता का दुध पीने से लेकर ही जो सँस्कार और मधुर शब्दों द्वारा जो शिक्षा मिलती है उसके और पाठशाला की शिक्षा के बीच संगत होना चाहिए। परकीय भाषा से वह श्रृंखला टूट जाती है और उस शिक्षा से पुष्ट होकर हम माृतृद्रोह करने लग जाते हैं।” २१-४-१९२० को उन्होंने लिखा था-“माध्यम की आवश्यकता पर तो किसी तरह का इतराज नहीं उठाया जाता। पर वह माध्यम, अंग्रेज़ी नहीं हो सकती।…हमारी शिक्षा-प्रणाली में अंग्रेजी भाषा को देशी भाषाओं से उच्च स्थान दिया गया है। यह कैसी अप्राकृतिक घटना है। …यह क्षा प्रणाली राक्षसी है। मैंने अपना जीवन इसी प्रणाली को नष्ट करने के लिए दे रखा है।” शिक्षा में भाषा के माध्यम का महत्त्व नींव के समान होता है।

यह बुनियादी तथ्य को हमारी शिक्षा-प्रणाली में स्वीकार हो सका है। परंतु गांधी ने इस पर जितना गहरा चिंतन किया है वह आज भी पूर्णत: प्रासंगिक है। १-०९-१९२१ को उन्होंने लिखा था :-“अब रही शिक्षा के माध्यम की बात। इस विषय पर मेरे विचार इतने स्पष्ट हैं कि यहाँ उनके दोहराने की आवश्यकता नहीं। इस विदेशी भाषा के माध्यम ने लड़कों के दिमाग़ को शिथिल कर दिया और उनकी शक्तियों पर अनावश्यक जोर डाला, उन्हें रट्टू और नक़लची बना दिया, मौलिक विचार और कार्यों के लिए अयोग्य कर दिया और अपनी शिक्षा का सार अपने परिवारवालों तथा जनता तक पहुँचाने में असमर्थ बना दिया है। इस विदेशी माध्यम ने हमारे बच्चों को अपने ही घर में पूरा पक्का परदेशी बना दिया है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का यह सबसे बड़ा दु:खांत दृश्य है। अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम ने हमारी देशी भाषाओं की बढ़ती को रोक दिया है। यदि मेरे हाथ में मनमानी करने की सत्ता होती तो मैं आज से ही विदेशी भाषा के द्वारा हमारे लड़के और लड़कियों की पढ़ाई बंद कर देता, और सारे शिक्षकों और अध्यापकों से यह माध्यम तुरंत बदलवाता या उन्हें बर्खास्त करता। मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इंतज़ार न करता, वे तो परिवर्तन के पीछे-पीछे चली आवेंगी। यह ख़राबी तो ऐसी है, जिसके लिए तुरंत इलाज की जरुरत है। …मेरा तो यह निश्चित मत है कि दुनिया में किसी संस्कृति का भण्डार इतना भरा-पूरा नहीं है जितना कि हमारी संस्कृति का है। हमने उसे जाना नहीं है, हम उसके अध्ययन से दूर रखे गए हैं और उसके गुण के जानने और मानने का मौक़ा हमें नहीं दिया गया है।”

गांधी का शिक्षा-प्रणाली पर हुआ चिंतन देश को सच्चा स्वराज्य दिला सकता है, ०५-०७-१९२८ को उन्होंने लिखा था:-” हमारे यहाँ विदेशी भाषा के माध्यम ने राष्ट्र की शिक्षा हर ली है। विद्यार्थियों की आयु घटा दी है।उन्हें आम लोगों से दूर कर दिया है और शिक्षा को बिना कारण खर्चीला बना दिया है। देश के नौजवानों परएक विदेश भाषा का माध्यम थोप देने से उनकी प्रतिभा कुण्ठित हो रही है औ इतिहास में इसे विदेशी भाषाकी बुराइयों में से सबसे बड़ी बुराई माना जाएगा। इसलिए शिक्षित भारतीय अपने आप को इस विदेशीव्यामोह से जितनी जल्दी मुक्त कर लेंगे, हिंदी और देशी भाषाओं को अपना लेंगे, उतना ही अच्छा होगा।

आगामी तीस वर्ष का ध्यान रख कर बनाई जा रही नई शिक्षा नीति में गांधी के अनुभवजन्य विचारों पर सरकारकी नई शिक्षा नीति समिति सकारात्मक रूप से चिंतन करें ही। संसद भी इस पर प्रस्ताव पारित करें। जिसमें शिक्षा में कौशल का समावेश हो। सकल बजट का कम से कम छ: प्रतिशत प्रावधान हो। अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान के समान शोध के साथ विकास पर ज़्यादा राशि खर्च करने की व्यवस्था हो। पूरे देश के लिए प्रवेश से लेकर उच्चत्तम स्तर तक एक समान पाठ्यक्रम की नीति हो। शिक्षा में गुणात्मकता को पूरा-पूरामहत्त्व मिले। उसे व्यवसायिकता से बचाया जाय। सरकार की लोकोपकारिता की झलक शिक्षा प्रणाली में दिखना चाहिए।

संपर्क

निर्मलकुमार पाटोदी,

४५, शांति निकेतन,

(बॉम्बे हॉस्पिटल कि पीछे),

इंदौर -४५२-०१० म.प्र.

सम्पर्क: ७८६९९-१७०७



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