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ट्रंप की यात्रा से संबंधों को मिली नई नींव

भारत-अमेरिका संबंधों को नई दिशा देने में ट्रंप की यात्रा एक हद तक सफल मानी जा सकती है। हालांकि अब भी कई मसले हैं जिन पर दोनों देशों को काफी काम करना है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की हालिया भारत यात्रा में अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ है और दोनों देशों के संबंधों को नए मुकाम तक पहुंचाने की पृष्ठभूमि तैयार हुई है। एक अमेरिकी राष्ट्रपति का घरेलू स्तर पर चुनावी व्यस्तताओं के बावजूद भारत की यात्रा पर आना भारत के साथ संबंधों से जुड़ी अहमियत को दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप को एक भव्य मंच मुहैया कराया जो अमेरिका में उनके मतदाताओं को लुभाने में कारगर साबित होगा। ट्रंप के पास अपनी विदेश नीति के मोर्चे पर दिखाने को थोड़ी सफलताएं ही हैं लेकिन यह दौरा एक चमकदार बिंदु माना जाएगा। अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासी तेजी से समृद्ध एवं रसूखदार हो रहे हैं और वे ‘भारत के दोस्त’ का समर्थन करने का मन बना सकते हैं। हम ब्रिटेन में हाल में संपन्न चुनावों की पुनरावृत्ति अमेरिका में भी देख सकते हैं जहां ‘फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी’ ने टोरी नेताओं के पक्ष में खुलकर लामबंदी की जबकि लेबर पार्टी पर हमलावर रहा। अमेरिकी चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी के दावेदार बर्नी सैंडर्स के कश्मीर मुद्दे पर लगातार दिए जा रहे बयानों को देखते हुए ऐसे अभियानों से इनकार नहीं किया जा सकता है जिनमें भारतीय-अमेरिकी नागरिकों को डेमोक्रेट उम्मीदवार को वोट देने से रोका जा सके। ट्रंप के खेमे को यह अच्छा लगेगा लेकिन इससे पिछले दो दशकों से अमेरिका के दोनों दलों से भारत को मिल रहा समर्थन प्रभावित होगा।

दरअसल ट्रंप ने मोदी को उनकी दी हुई सौगात लौटाई है। यह एक ऐसा शिखर सम्मेलन था जहां ट्रंप ने सारी अच्छी बातें कीं, मोदी एवं उनके नेतृत्व की जमकर तारीफ की और कश्मीर या नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दों पर अपने मेजबान को असहज स्थिति में डालने वाली किसी भी टिप्पणी से पूरी तरह परहेज किया। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान दिल्ली में बड़े पैमाने पर भड़की सांप्रदायिक हिंसा पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। एक सफल बहुलवादी एवं विविधतापूर्ण देश के रूप में भारत और एक उदार लोकतंत्र के मूल्यों के प्रति मोदी की प्रतिबद्धता की तारीफ कर मोदी के घरेलू एवं विदेशी आलोचकों को सार्वजनिक रूप से झिड़की लगाई। सार्वजनिक प्रशंसा पर फलने-फूूलने वाले और विशाल पैमाने पर राजनीतिक प्रदर्शन में माहिर नेताओं के तौर पर ट्रंप एवं मोदी दोनों को इस यात्रा से बहुत कुछ मिला है। हालांकि यात्रा के दौरान ही राजधानी की सड़कों पर हुई हिंसा की घटनाओं ने मोदी के लिए इस चमक को थोड़ा फीका कर दिया लेकिन दौरे की सुखद अनुभूति आगे भी बनी रहेगी। क्या इस दौरे का कोई सार नहीं था? वास्तव में ऐसा था। ट्रंप ने व्यापार के मुद्दे पर भारतीय रुख को लेकर खासा संयम दिखाया। अमेरिका से किए जाने आयात पर भारत द्वारा लगाए गए शुल्क को लेकर उनकी शिकायत एक हद तक संयत थी। उनका नजरिया आशावादी एवं आगे की तरफ देखने वाला था, भले ही एक विशाल एवं महत्त्वाकांक्षी व्यापार समझौता हो पाने फिलहाल अवास्तविक लग रहा है। दोनों ही पक्षों पर एक सीमित समझौता करने का भारी दबाव था लेकिन मतभेदों की वजह से ऐसा नहीं हो पाया। इस संबंध के आर्थिक स्तंभ आगे भी डांवाडोल बने रहेंगे लेकिन फिलहाल राहत मिली है।

राजनीतिक एवं सुरक्षा के मुद्दों पर ठोस नतीजे सामने आए हैं। औपचारिक वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में भारत-अमेरिका रिश्ते को ‘समग्र वैश्विक सामरिक भागीदारी’ के स्तर पर ले जाने की घोषणा की गई है। इस शब्दावली का मतलब है कि दोनों देशों के बीच कहीं अधिक व्यापक एवं करीबी सुरक्षा संबंध होंगे। हिंद-प्रशांत की संकल्पना का प्रमुखता से जिक्र हुआ है लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि यह फॉर्मूला अमेरिका की पसंद वाली अधिक सीमित भौगोलिक अवधारणा को दर्शाता है, मसलन हॉलीवुड टु बॉलीवुड या पश्चिमी प्रशांत। हिंद-प्रशांत के प्रमुख अवयव के तौर पर आसियान केंद्रीयता का उल्लेख यह भी दिखाता है कि परिचालन के स्तर पर भारत अधिक सीमित परिभाषा स्वीकार करता है, भले ही आलंकारिक रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र हिंद महासागर के पश्चिमी पाटों तक जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने खास तौर पर भारतीय एवं अमेरिकी सैन्यबलों की अंतर-सक्रियता का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के साथ इसका विस्तार दूसरे साझेदार देशों तक भी हो सकता है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग के लिए ‘चतुर्पक्षीय’ शब्दावली का पहली बार औपचारिक इस्तेमाल भी इस साझा बयान का एक अहम तत्त्व रहा। यह इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है कि भारत अब चीन या रूस की उतनी चिंता नहीं करता है जो इस सैन्य गठबंधन को ‘एशियाई नाटो’ बताते रहे हैं। इसके पहले भारत चतुर्पक्षीय शब्द का इस्तेमाल किए जाने के पक्ष में था और उसकी जगह ‘बहुपक्षीय’ शब्द चाहता था।

चीन और आसियान के बीच दक्षिण चीन सागर में एक कानूनी आचार संहिता को लेकर जारी बातचीत का भी इस बयान में उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यह सभी देशों के वैध अधिकारों एवं हितों को अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक नहीं है। चीन ने जोर दिया है कि यह संहिता क्षेत्र से बाहर के देशों को सुरक्षा एवं आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से अलग रखती है जब तक कि संबंधित पक्षों के बीच सहमति न हो जाए। साफ है कि कोरोनावायरस के प्रकोप से जूझ रहा चीन जवाबी प्रहार की अधिक गुंजाइश देता है।

अफगानिस्तान के बारे में जो नहीं कहा गया है वह बयान में उल्लिखित बिंदु से कहीं अधिक अहम है। इस बयान में अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा में बैठक के दौरान शांति समझौता होने की संभावना और अफगानिस्तान में युद्धविराम का कोई जिक्र नहीं है। यह भारत के लिए चिंता की बात है और कोई भी देख सकता है कि बयान में नए घटनाक्रम क्यों नहीं नजर आ रहे? अफगानिस्तान को लेकर भारत की चिंताओं का ध्यान नहीं रखे जाने के एवज में सीमापार आतंकवाद का विस्तार से उल्लेख और पाकिस्तान में स्थित विभिन्न आतंकवादी संगठनों की सूची जारी करने के कदम हमें दिखाई देते हैं। लेकिन इस पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के पहले अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की राह बनाने में पाकिस्तान की भूमिका काफी अहम है।

भारत-अमेरिका परमाणु सौदे के तहत छह अमेरिकी नाभिकीय रिएक्टरों की खरीद पर प्रगति की भी संभावना है। इसके अलावा अमेरिकी तेल एवं गैस की बिक्री में हुई वृद्धि को अमेरिका के लिए और बड़ा बाजार मुहैया कराने में नाकामी के हर्जाने के तौर पर देखा जा रहा है। लेनदेन की यह सोच एक बार तो काम कर सकती है लेकिन कृषि उत्पादों के लिए बाजार मुहैया कराने एवं बौद्धिक संपदा संरक्षण जैसे पुराने मसलों पर अमेरिकी व्यापार प्रतिष्ठान के रुख में नरमी आने की संभावना कम ही है।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अस्थिर, तुनकमिजाज और अप्रत्याशित स्वभाव वाले अमेरिकी राष्ट्रपति को सलीके से संभालने में बेहतरीन सियासी कौशल का प्रदर्शन किया और उन्हें अपने स्वभाव के विपरीत संयम बरतने और सोच-समझकर टिप्पणियां करने की स्थिति में ले आए। केवल सीएनएन के एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते समय ही ट्रंप थोड़ा भटके थे। अगर ट्रंप नवंबर में होने वाले चुनाव में जीतते हैं तो मोदी के साथ उनके निजी संबंध काफी काम आएंगे। शायद भारत भी इसी पर दांव लगा रहा है।

(लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)

साभार – https://hindi.business-standard.com/ से

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