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विस्थापित कश्मीरी पंडितों की चिंता किसी को नहीं

१९९० की त्रासदी के बाद भी केंद्र ने जमीनी स्तर पर जम्मू कश्मीर के प्रति अपनी न निति बदली थी और न ही अपने सलाहकारों की श्रेणी वदली थी. यह भी एक मुख्य कारण है कि प्रिथिक्ताबादी विचारों की परिभाषा और असर जम्मू कश्मीर राज्य में, ख़ास कर के कश्मीर घाटी में, काफी हद तक साल १९४७ में जो था उस से आज के दिन स्थिति काफी वदल चुकी है. पहले भी जम्मू कश्मीर से संबंधित सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक विवादों को ‘कश्मीर विवाद’ से जोड़ कर इस राज्य में लोगों और वाहरी दुनियां के सामने १९४७ के भारत के विभाजन के बाद कुछ लोग रखते रहे हैं पर केन्द्र की असंवेदनशील नीतिओं के कारण जम्मू कश्मीर की समस्याओं को ‘कश्मीर विवाद’ के नाम पर १९४७ में जम्मू कश्मीर के भारत के साथ हुए अधिमिलन से जोड़ कर देखा जाना आम जन के लिए साल १९९९ आते –आते कोई ख़ास अनहोनी बात नहीं रह गई थी .

अनुच्छेद -३७० , ‘ऑटोनोमी’, भारत के जम्मू कश्मीर राज्य में इस राज्य के स्थायी निबासी के इलावा भारत के अन्य नागरिकों के सिमित अधिकार , जम्मू कश्मीर राज्य में स्थायी सम्पति , जम्मू कश्मीर राज्य के ध्वज चिन्ह और जम्मू कश्मीर की वैधानिक प्रणाली को कुछ मुख्यधारा के कहे जाने बाले जन एवम दल भी भारतीयता कम और भारत गणराज्य से सम्बिधानिक एवम राष्ट्रीयता की दृष्टि से दूरियां दीखाने के लिए ज्यादा प्रयोग करते रहे हैं पर केंद्रीय सरकारों ने इस दिशा में आम जन के मन में पैदा होती जा रही शंकाओं और उलझनों को सुलझाने के लिए कुछ नहीं किया. अगर किया है तो बस आर्थिक अनुदान (ग्रांट्स) देने या कुछ नेताओं को लुभाने की कोशिश करने के इलावा कुछ खास नहीं किया. इसी बदले संधर्व में साल १९98- ९९ में मुफ़्ती मोहमद सईद ने पीडीपी के नाम से एक क्षेत्रीय दल की नींब रख कर शेख अब्दुल्लाह की नेशनल कांफ्रेंस की ‘अटोनोमी’ के मुकाबले भारत गणराज्य से कश्मीर घाटी की कुछ अधिक दूरी दिखाते हुए अपने ‘सेल्फ रूल फ्रेमवर्क’ के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में कदम रखा था.

जम्मू कश्मीर से लाखों कश्मीर घाटी के स्थनीय हिन्दू परिवार साल १९९० में पाकिस्तान केन्द्रित विचारधारा के बढ़ते प्रभाव और अपने को मुजाहिद कहने बाले अत्तंक्वादियों के दवाव से कश्मीर घाटी से पलायन कर गये थे और साल १९९९ आने तक भी भारत सरकार उन को वापिस ले जाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं कर पाई थी. ऐसे हालात में भारत के साथ राष्ट्रियता की स्पर्धा में लोगों को धकेलना किसी नए राजनीतिक दल के लिए उतना कठिन नहीं था. और जिस प्रकार से पीडीपी ने साल २००२ में साल १९९६ में विधानसभा में 87 में से करीब ६० सीटें लेनी बाली नेशनल कांफ्रेंस को सत्ता से वाहर निकाल दिया उस से साफ़ निष्कर्ष निकाला जा सकता था कि ऐसे विचार जो इस रियासत को भारत नहीं भारत का एक सहयोगी दिखाते हों कश्मीर घाटी में आम आदमी का ध्यान अपनी और खींच सकते हैं.

साल २००२ से साल २००८ तक कांग्रेस और पीडीपी ने जम्मू कश्मीर में सरकार चलाई. इन ६ सालों में कभी भी राष्ट्रवादी तत्बों एवं विषयों की ओर केन्द्रीय नेत्रृत्व का ध्यान नहीं गया . पीडीपी ने अधिकारिक स्तर पर लिखित रूप में अपना सेल्फ रूल फ्रेम्बर्क भी साल २००८ में सब के सामने रख दिया था. पीडीपी के सेल्फ रूल से जम्मू कश्मीर की पूरी भारतीयता पर जरूर प्रश्न उठते थे क्यों कि इस में यह कहा गया है कि जम्मू कश्मीर के कुछ विषयों पर भारत और पाकिस्तान दोनों का कंट्रोल हो सकता है. यह दावे से कहा जा सकता है कि उस समय की केन्द्र सरकार ने इस में कोई दोष नहीं देखा था यहाँ तक के जस्टिस सगीर अहमद वर्किंग ग्रुप ( प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह जी का पांचबां वर्किंग ग्रुप) ) ने अपनी रिपोर्ट में साल २०१० में सेल्फ रूल की बात करते हुए यह कहा कि पीडीपी से उस को लिखित सेल्फ रूल का विवरण नहीं मिला है पर भारत सरकार को जव भी पीडीपी से सेल्फ रूल का विवरण मिले तो उस पर विचार करना चाहिए.

वर्किंग ग्रुप कितना सम्वेधनशील था इस बात का अंदाजा इस बात से लगाएया जा सकता है कि साल २००८ में ही पीडीपी अपने सेल्फ रूल फ्रेमवर्क को सार्वजानिक कर चुकी थी और न ही सरकार ने यह रिपोर्ट मिलने के बाद इस को नजदीक से देखने की कोशिश की थी और न ही सगीर अहमद वर्किंग ग्रुप ने अपना काम संजीदगी से किया था. इस प्रकार के भारत के नेताओं और सरकारों के आचरण से अगर जम्मू कश्मीर का कोई आम निबासी सेल्फ रूल जैसे सुझाव में कोई वुराई न देखे तो उस को भारत राष्ट्र की दृष्टि से दोषी ठहराना किसी के लिए भी न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है.

आज तक की केंद्र सरकारों और कांग्रेस जैसे दलों ने कश्मीर घाटी के आम जन को बैचारिक स्तर पर भारतीयता के आगोश से दूर ले जाने बाले विचारों और आन्दोलनों को पराजित करने को कभी भी सजीदगी से प्राथमिकता नहीं दी है. राजनिति से ऊपर उठ कर इस राज्य में शांति और सद्भाव बनाए रखने के प्रयास वहुत कम हुए हैं और भारत सरकार ने अब तक इस राज्य में शंकाओं का निवारण सिर्फ आर्थिक प्रावधानों में देखने की गलती की है.

इससे बड़ी चिंता की बात और क्या हो सकती है कि आज २५ साल वाद भी भारत सरकार १९९० से घाटी के वाहर रह रहे कश्मीर घाटी के हिन्दू को उस के घर वापिस ले जाने के लिए सम्मानजनक निवास एवं जान-माल की सुरक्षा का विश्वास नहीं दिला पा रही है. जिस प्रकार की मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना अपने ही देश में कश्मीरी माईग्रेंट्स २५ साल से झेल रहे हैं उस को देखते हुए अगर वे अपना रोष कश्मीर घाटी के बहुसंख्यक समाज के धार्मिक उन्माद के नाम अपनी विपदाओं को जड़ कर व्यक्त करते है तो इस पर कश्मीर घाटी के आम बहुसंख्यक समाज को क्रोधित नहीं होना चाहिए . पर सरकार को भी इस विषय को प्राथमिकता देनी होगी नहीं तो विस्थापितों और बहुसंख्यक घाटी के परिवारों के बीच दूरियां और ग़लतफ़हमियाँ और बढती जायेंगी.

जिस प्रकार से आज भी पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर के इलाकों को कश्मीर घाटी के समाचार पत्र , घाटी के बुद्धिजीवी, पीडीपी का सेल्फ रूल और यहाँ तक के दिलीप पद्गओंकर की वार्ताकारों की टीम ने भी पाकिस्तान प्रशासित जम्मूकश्मीर कहा है और कहते है से साफ़ जाहिर होता है कि अगर भारत सरकार ने इस राज्य की समस्याओं को आर्थिक प्रभ्दानों से ऊपर उठ कर नहीं देखा तो इस राज्य की दुविदाओं का अंत निकट भविष्य में नहीं दीखता है. साल २०१५ में जम्मू कश्मीर में सत्ता में आने के लिए पीडीपी और बीजेपी ने यह कहते हुए अपना एजेंडा फार एल्लाएंस इस राज्य के लोगों के सामने रखा था कि उनकी सरकार का मूल उदेश्य जम्मू कश्मीर राज्य के लोगों की आर्थिक एवं वैचारिक प्रगति करना है. पर दोनों दल क्षेत्रीय विवादों में ज्यादा फंसे रहे और ७ जनबरी को मुफ़्ती मोहमद सईद जी के निदन के वाद आज बीजेपी तो जम्मू क्षेत्र में सबालों के घेरे में घिरी है महबूबा मुफ़्ती भी कश्मीर घाटी में अपने समर्थकों के प्रश्नों से चिंतित है.

डॉ फारूक अब्दुल्लाह की नेशनल कांफ्रेंस के कुछ नेताओं ने हो सकता है कभी १९४७ में भारत के साथ हुए अधिमिलन पर ऊंगली उठाने के संकेत दीये हों पर डॉ फारूक अब्दुल्लाह ने कभी भी अक्टूबर १९४७ के भारत के साथ हुए अधिमिलन पर प्रश्न नहीं किए हैं और कई बार यहाँ तक कह दिया है कि जिन को भारत अच्छा नहीं लगता है उन के लिए वे भारत की अन्तरराष्ट्रीय सीमाएं खुलवा सकते हैं . भारत से ‘कश्मीर’ को दूर करने की बात करने बाले प्रथिक्तावादियों को जिस सख्ती से अकसर वे ललकारते रहे हैं उतना तो कम से कम साल २००२ तक तो किसी ने नहीं ललकारा था . साल २००२ के बाद अगर कभी फारूक अब्दुल्लाह ने कुछ विरोधात्मक विचार व्यक्त किए भी हैं तो इस को वदले संधर्व में राजनीतिक मजबूरी कहा जा सकता है.

जिस प्रकार के मर्जर और अधिमिलन के नाम पर उमर अब्दुल्लाह ने साल २०१० के बाद प्रश्न खड़े किए हैं ऐसे तो फारूक अब्दुल्लाह ने साल २०१० से पहले कभी नहीं किया. पर पीडीपी के लिए भी अब अपने सेल्फ रूल के नोरों से लोगों को भरमाना आसान नहीं होगा और महबूबा जी को नेशनल कांफ्रेंस से आगे रहने के लिए नई राह तलाशनी होगी नहीं तो अगर पीडीपी बीजेपी को छोड़ भी देती है तो घाटी का वोटर उस से फिर भी यह सवाल कर सकता है की ‘कब आयेगा सेल्फ रूल ?” आज पीडीपी कश्मीर घाटी में अपने ही ‘सेल्फ रूल’ के गोरख धन्धे में फंसती दिख रही है.

हाँ यह भी एक तथ्य है कि भारत के राष्ट्रीय स्तर के दलों ने भी कभी भी जम्मू कश्मीर को राजनीतिक वोट के स्वार्थ से ऊपर उठ कर नहीं देखा है.

आज के दिन अगर कश्मीरियत को राष्ट्रीयता की तरह कुछ लोग देखने लगे हैं तो इस के लिए सिर्फ कश्मीर घाटी के कुछ स्थानीय नेताओं को दोषी नहीं ठहराएया सकता क्यों की राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने भी अकसर अपने व्यव्हार से या चुपी साध कर प्रतक्ष या अप्रतक्ष रूप में ऐसी सोच को नकारा नहीं है.

केन्द्र में बैठे लोगों को भी चिंतन करना होगा नहीं तो कश्मीर घाटी के वाहर से और इस राज्य के अल्पसंख्यक वर्ग से भी जम्मू कश्मीर राज्य की भारत से दूरियां दिखाने बाले प्रस्तावों के समर्थक वड सकते हैं.

( लेखक एक बरिष्ठ पत्रकार और जम्मू कश्मीर विषयों के जानकार हैं संपर्कः 9419796096 )

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