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गैर संवैधानिक हस्तक्षेप, लोकतंत्र और समाज

लोकतांत्रिक व्यवस्था और समाज संविधानिक प्रक्रियाओं के साथ ही नागरिकों की तेजस्विता के अभाव में प्रभावी रूप से नहीं चल सकता। लोकतंत्र में सबसे बड़ी कमजोरी नागरिकों की तेजस्विता का अभाव और अनमनापन होता है। हमारे लोकतंत्र में लोगों में याचनाभाव का अतिशय विस्तार हुआ।जिसके कारण भीड़तंत्र और भेड़ चाल का उदय हुआ। लोकतांत्रिक देश या समाज में नागरिक गण चौबीस घंटे बारहमास चौकस रहकर ही जीवन्त लोकतंत्र बना सकते हैं।पूर्ण स्वराज का संकल्प लेनेवाला समाज आज भीड़ तंत्र और भेड़चाल से ग्रस्त हो गया है। भारतीय समाज और लोकतंत्र में गैर संवैधानिक शक्तियों की देश के कोने कोने में प्राण प्रतिष्ठा हो गयी हैं। कार्यपालिका, विधायिका और नागरिकों के असंवैधानिक कार्यकलापों को तो न्यायपालिका के समक्ष ले जाकर न्याय पाया जा सकता है। पर शक्तिशाली तबके के गैर संवैधानिक हस्तक्षेप से निपटने के लिए भारत के आम नागरिकों को अपने मानस में गहराई से जड़ जमा रहे अराजकतावादी भीडतंत्र और भेड़ चाल को सोच समझ कर त्यागना चाहिए। नागरिकों के तेजस्वितापूर्ण चिंतन और कृतित्व के कारण ही भारत का संविधान भी नागरिकों के साथ खड़ा हो जाता है। भीड़ तंत्र की भेड़ चाल मूलतः गैरसंवैधानिक हस्तक्षेप का अंतहीन सिलसिला हैं।जो संवैधानिक लोकतांत्रिक राज और समाज को भीरू और श्रीहीन बना कर असहाय और लाचारी भरा जीवन जीने की दिशा में निरन्तर धकेलता है।

राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, पुलिस प्रशासन और निर्वाचन प्रक्रिया को गैर संवैधानिक शक्तियों के सामने भारतीय नागरिक आत्मसमर्पण करते निरन्तर देखता है तो वह सक्रिय नागरिकत्व की भूमिका त्याग देता है। जिससे गैरसंवैधानिक हस्तक्षेप की अनैतिक ताकत के सामने नतमस्तक होने वाले लोग अपने लोभ लालचवश,अपनी गिरावट को निरापद या व्यवहारिक रास्ता मानने लगे है। नागरिकों द्वारा अपनी नागरिक तेजस्विता के बड़े पैमाने पर विसर्जन से उपजी परिस्थितियों के चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गैर संवैधानिक शक्तियों का वर्चस्व बढ़ा है। इसके कारण अधिकतर लोग गली मोहल्ले से लेकर समूचे तंत्र में गैर संवैधानिक शक्तियों के दखल को नकारना ही भूल गये हैं।

भारतीय समाज विविध विचारों वाला समाज प्राचीन काल से रहा है। व्यक्ति और समाज ने विवेकशीलता को अपना सहज स्वाभाविक विचार माना। इसलिए हमारे आजादी के आन्दोलन में सभी धाराओं को मानने वाले लोग लगातार आजादी के आन्दोलन में भागीदारी सुनिश्चित कर लोगों को जागरूक करते रहे।पर आजादी पाने के बाद से हम सभी लोगों का व्यक्तिगत और सामूहिक आचरण लोकतंत्र की मजबूती के बजाय भीड़ तंत्र को मजबूत करने वाली धारा में बिना सोचे समझे बहने लगा।

भारतीय समाज को इस बात पर खुलकर चर्चा और विचार विमर्श करना चाहिए कि आजाद भारत में लोकतंत्र के संस्कार क्योंकर कम होते जा रहें हैं?साथ ही यह भी समझने की निरन्तर कोशिश करना चाहिए कि गैर संवैधानिक शक्तियों को भारतीय समाज और लोकतंत्र से विदा करने के तरीके क्यों नहीं विकसित हो रहे हैं? लोकतांत्रिक व्यवस्था और समाज दोनों को ही निर्भय और निष्पक्ष होना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल अकेले चुनाव सम्पन्न होने तक ही सीमित नहीं है। लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था का अर्थ है सबको इज्ज़त और सबको काम। भारतीय समाज में सब बराबर के भागीदार है।सब मिलजुल कर ही भारतीय समाज और लोकतंत्र की रखवाली कर सकते हैं। क्योंकि भारतीय समाज और लोकतंत्र सभी का है किसी एक व्यक्ति विचार या गैर संवैधानिक शक्तियों की मनमानी गतिविधियों की क्रीड़ा स्थली नहीं।

भारतीय समाज और लोकतंत्र दोनों में केवल कमियां ही है ऐसा नहीं कहा जा सकता। भारतीय समाज और लोकतंत्र में तमाम मतभिन्नताओं के बाद भी भारतीय समाज की वैचारिक जड़ें बहुत मजबूत होकर व्यापक दृष्टिकोण लिए हुए है। फिर भी आज के भारत में नागरिकों की तेजस्विता में कमी आना और भीड़तंत्र की गतिविधियों में तेजी आना काल की एक बड़ी चुनौती है।आज आभासी भारत और सूचना प्रौद्योगिकी ने ऐसा वातावरण खड़ा किया है जिससे भारतीय समाज में ऐसे मुद्दे खड़े हो गए हैं जो मानों भारत में अविवेकी समाज की रचना कर रहें हैं।आज के भारत और दुनिया में प्रत्यक्ष लोकसम्पर्क लुप्तप्राय हो गया है। आभासी गतिविधियों को ही जीवन समाज और लोकतंत्र का पर्याय मानने की दिशा में हम सब निरन्तर आंखें बंद कर बढ़ते ही जा रहे हैं। यही वह बुनियादी सवाल है जो आज हम सब से उत्तर मांग रहा है।गैर संवैधानिक शक्तियों और भीड़ तंत्र से तेजस्वी नागरिकों वाला देश ही मन मानी पूर्ण राज और समाज व्यवस्था पर अंकुश लगाने की संविधानिक क्षमता रखता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का मतलब ही लोगों की ताकत से चलने वाली राज और समाज की व्यवस्था है।

सर्वप्रभुतासम्पन्न भारतीय समाज और नागरिक अपने आप में विपन्न, लाचार और बेरोज़गार नहीं है। गैर संवैधानिक शक्तियों ने भारत की राजनीति और समाज को भीडतंत्र में बदलने वाला जो रास्ता भारत भर में चुना है वह गैर संवैधानिक शक्तियों की भारत के बारे में नासमझी ही मानी जावेगी। तभी तो गैर संवैधानिक शक्तियां भारत की विशाल लोकशक्ति को व्यक्तिश और सामूहिक रूप से तेजस्वी यशस्वी बनाने के बजाय खुद को शक्तिशाली और नागरिकों को शक्तिहीन बनाने के अप्राकृतिक रास्ते पर चल रहे हैं।

अनिल त्रिवेदी अभिभाषक एवं स्वतंत्र लेखक
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