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दवा कंपनियों के मुनाफे के मकड़जाल का शिकार हो रहा आम आदमी

मेडिकल विज्ञान में हुए विकास के कारण मानवता इस पड़ाव पर पहुँच चुकी है कि प्लेग जैसी बीमारी जो किसी समय यूरोप की एक-तिहाई आबादी को ख़त्म कर देती थी, जिसका डर इतना भयंकर था कि भारत में आम लोग इस बीमारी का नाम भी अपने मुँह पर नहीं आने देते थे, अब पूरी तरह मनुष्य के क़ाबू में है। अनेकों डॉक्टरों तथा वैज्ञानिकों की अथक मेहनत ने मानवता को इस मंज़िल तक पहुँचाया है। परन्तु अब एक बार फिर से आदमी के सामने उसी समय में वापिस पहुँचने का ख़तरा खड़ा हो रहा है, जिसका कारण दवाओं का बिना-ज़रूरत तथा ग़ैर-वैज्ञानिक इस्तेमाल है।

एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक़ भारत दुनिया में रोगाणु-रोधी (एण्टीबायोटिक) दवाओं का सबसे अधिक इस्तेमाल करने वाले देशों में से एक के रूप में उभरकर सामने आया है। 2000-2010 के दशक में भारत में इन दवाओं के इस्तेमाल में 62 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जबकि इसी अरसे में संसार के लिए यह दर 36 प्रतिशत रही है। भारत में हर व्यक्ति एक साल में रोगाणु-रोधी दवाओं की औसत 11 गोलियाँ खा रहा है; मगर ज़मीनी स्तर पर जो हालात हैं, उन्हें देखकर यह आँकड़ा काफ़ी कम लग रहा है। रोगाणु-रोधी दवाएँ खाने में चीन का नम्बर भी भारत के पीछे आता है। वैसे एक अमेरिकी नागरिक एक साल में रोगाणु-रोधी दवाओं की 22 गोलियाँ खाता है (जोकि उसके पहले के वर्षों के मुकाबले कम है), परन्तु वहाँ कुल आबादी कम होने के कारण कुल खपत भारत और चीन से कम है।

रोगाणु-रोधी दवाओं की खपत में बढ़ोत्तरी मुख्य रूप से इस कारण नहीं हो रही कि लोगों की सेहत-सुविधाओं तक पहुँच पहले से ज़्यादा हो गयी है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि इस बढ़ोत्तरी का मुख्य कारण दवाओं का बिना-ज़रूरत तथा ग़ैर-वैज्ञानिक इस्तेमाल है। दरअसल, ये दवाएँ एक ख़ास किस्म के रोगाणुओं – बैक्टीरिया के कारण होने वाली बीमारियों (जैसेकि पेचिश, दस्त के कई मामले, टाइफ़ाइड, चमड़ी, फेफड़ों तथा ख़ून के कई इंफ़ैक्शन आदि) में ही ज़रूरी तथा कारगर होती हैं।

मगर सारे इंफ़ैक्शन बैक्टीरिया के कारण नहीं होते, बल्कि आधे से ज़्यादा इंफ़ैक्शन (जैसे आम सर्दी-जुकाम, दस्त के आधे से ज़्यादा मामले, बहुत से बुखार जैसे डेंगू, चिकनगुनिया तथा अन्य अनेक वायरल बुखार आदि) एक अलग किस्म के रोगाणु – वायरस की वजह से होते हैं जिनके ऊपर न तो रोगाणु-रोधी दवाओं का कोई असर ही होता है और न ही इन इंफ़ैक्शन में इन दवाओं की कोई ज़रूरत ही होती है। मगर आमतौर पर यही देखा जाता है कि इन सब बीमारियों में, बिना यह देखे कि कारण बैक्टीरिया है या वायरस, एण्टीबायोटिक्स का इस्तेमाल हो रहा है। इससे एक तरफ़ तो आर्थिक नुक़सान होता है, तो दूसरी तरफ़ इन दवाओं के बेकार हो जाने का ख़तरा खड़ा हो गया है, क्योंकि इन दवाओं के अन्धाधुँध इस्तेमाल के चलते बैक्टीरिया की बड़ी संख्या ने इन दवाओं को प्रभावहीन करने के तरीक़े विकसित कर लिये हैं।

मसले के आर्थिक पक्ष की बात करें। भारत जैसे देश में यहाँ दो-तिहाई आबादी को समय पर दवाई नहीं मिलती, बड़ी संख्या में लोगों को सेहत ठीक रखने के लिए ज़रूरी भोजन तक नहीं मिलता, किसी मरीज़ को मेडिकल सुविधा मिल सकेगी या नहीं, इस बात पर निर्भर करता है कि वह दवाई ख़रीद पायेगा या नहीं। ऐसे में बिना ज़रूरत के दवाएँ देना, ख़ासकर मेडिकल विज्ञान के दृष्टिकोण से इतनी अहम तथा जीवन-रक्षक दवाएँ, वैज्ञानिक पक्ष से तो ग़लत हैं ही, साथ ही मानवता के प्रति अपराध भी है। यह सीधा-सीधा आम इंसान की जेब पर झपटमारी है, ऊपर से दवाओं के बुरे प्रभावों के कारण मरीज़ को जो नुक़सान झेलना पड़ सकता है, वह अलग है। इसके अलावा बिना ज़रूरत के इस्तेमाल होने से मानवीय श्रम तथा प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी होती है, वह अलग है। लेकिन आम इंसान की लूट और मानवीय श्रम तथा प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी में ही दवा-कम्पनियों से लेकर डॉक्टरों तक के लम्बे मुनाफ़ाखोरी के नेटवर्क की मोटी कमाई सम्भव है।

दवा-कम्पनी के लिए दवाओं का उत्पादन मुनाफ़े के लिए है, वह हर साल बिक्री के पहले से ज़्यादा “ऊँचे टारगेट” तय करके चलती है और अपने “टारगेट” को पूरा करने के लिए अपने उत्पादों के प्रचार हेतु “विज्ञापनबाज़ों” (जिनको कम्पनियाँ ‘मेडिकल रिप्रेजेण्टेटिव’ के अंग्रेज़ी नाम के पीछे छुपाती हैं) की बड़ी फ़ौज भर्ती करती है। थोक व्यापारी तथा कैमिस्ट अपने ऐजण्ट अलग से रखते हैं जिनका काम “फ़ील्ड” में जाकर हिस्सेदारियाँ तय करते हुए बिक्री श्रृंखला बनाना होता है।

इस चेन की अन्तिम कड़ी हैं डॉक्टर, जिनके बारे में जितना कम लिखा जाये, अच्छा है। आम निजी क्लीनिकों, अस्पतालों, नर्सिंग होमों आदि की बात ही क्या करनी, मेडिकल कॉलेजों तक में रोगाणु-रोधी दवाओं के इस्तेमाल के लिए लाजिमी दिशा-निर्देशों की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ायी जाती हैं, आम इंसान सोच भी नहीं सकता। मरीज़ों को रोगाणु-रोधी दवाओं के महँगे-महँगे टीके इसलिए नहीं लगते कि मरीज़ को उनकी हमेशा ज़रूरत ही होती है, बल्कि इसलिए भी लगते हैं कि वार्ड के “डॉक्टरों” को अपना “टारगेट” पूरा करना होता है। ग़ैर-ज़रूरी होना एक बात है, ग़ैर-वैज्ञानिक होना दूसरी बात है अर्थात “टारगेट” पूरा करने के चक्कर में यह भी नहीं देखा जाता कि मरीज़ को दी जा रही दवा बीमारी का कारण बन रहे बैक्टीरिया को कण्ट्रोल करने के लिए सही चुनाव है भी या नहीं, क्योंकि चुनाव का आधार बैक्टीरिया की किस्म, मरीज़ का हित है ही नहीं।


ऐसे सीनियर डॉक्टर भी देखने को मिलते हैं जो टीकों की शीशियाँ तक सँभालकर रखते हैं ताकि कैमिस्ट तथा कम्पनी हिसाब-किताब में ‘गड़बड़ी’ न कर सके। अकेले डॉक्टर ही नहीं है जो ग़ैर-ज़रूरी इस्तेमाल के कारण हैं, झोला-छाप डॉक्टर, कैमिस्ट इसका बड़ा कारण हैं। कई रोगाणु-रोधी दवाओं की औक़ात तो अब टाफ़ियों जितनी भी नहीं रही, हर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ में बैठा कैमिस्ट या झोला-छाप डॉक्टर इन दवाओं की मुट्ठी भर-भर आम लोगों को खिला रहा है जिसको नज़रसानी के नीचे लाना मौजूदा प्रबन्ध में असम्भव है।

आर्थिक नुक़सान के अलावा जो दीर्घकालिक और बड़ा नुक़सान समूची मानवता को झेलना पड़ सकता है और कुछ हद तक पहले ही झेलना पड़ रहा है, वह है रोगाणु-रोधी दवाइयों का बेअसर सिद्ध होना। कई रोगाणु-रोधी दवाएँ तो पहले ही नकारा हो चुकी हैं, कइयों की क्षमता कम हो गयी है और कइयों का दायरा सिमट गया है। दवा-रोधी टीबी (क्षयरोग) का सामने आना इसका एक उदाहरण है। टाइफ़ाइड के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई दवाएँ अब इस काम के लायक नहीं रहीं। भारत में अगर सबसे ज़्यादा ग़ैर-ज़रूरी रोगाणु-रोधी दवाएँ लिखी जाती हैं तो यह हर बुखार को टाइफ़ाइड घोषित करके लिखी जाती हैं।


टाइफ़ाइड के लिए आम इस्तेमाल होने वाली दवा ‘सिप्रोफ्लोक्सासिन’ तथा इसी श्रेणी की अन्य दवाओं (जो संयोग से सबसे ज़्यादा लिखी जाने वाली रोगाणु-रोधी दवाओं में से एक है) की कारगर-क्षमता अब इसी वजह से कम होती जा रही है। टाइफ़ाइड के लिए कुछ और दवाएँ जैसे ‘सिफ़िगजम (जीफ़ी), सैफ्फ़ट्रेगजोन’ आदि जो टाइफ़ाइड के कुछ ख़ास मामलों के लिए जैसे बच्चों में, गर्भवती औरतों में, ‘सिप्रोफ्लोक्सासिन-रोधी टाइफ़ाइड के इलाज में इस्तेमाल के लिए रिजर्व हैं, अब हर किस्म के बुखार के लिए यहाँ तक कि सिफ़िगजम तो सर्दी-जुकाम के लिए भी लिखी जा रही हैं। यहाँ तक कि झोला-छाप डॉक्टर, कैमिस्ट जिनको रोगाणु-रोधी दवाओं की हरेक श्रेणी तथा हरेक दवा के विशेष इस्तेमाल के पीछे वैज्ञानिक कारण बिलकुल भी पता नहीं होते, वे भी बेहद ऊँचे दर्जे की रोगाणु-रोधी दवाएँ भण्डारे की जलेबियों जैसे बाँटते हैं। नतीजा जो सामने आ रहा है, बहुत डरावना है क्योंकि मानवता को एक बार फिर बिना रोगाणु-रोधी दवाओं के युग में जाना पड़ सकता है।

इस नतीजे को वैज्ञानिक पहचानते भी हैं और देख भी रहे हैं, चेतावनियाँ भी दे रहे हैं। सरकारें भी इसे कण्ट्रोल में लाने का ख़ूब हल्ला-गुल्ला करती हैं, मगर असलियत यह है कि निजी मुनाफ़े पर आधारित मौजूदा पूँजीवादी प्रबन्ध के रहते इसे कण्ट्रोल करना सम्भव नहीं है। सबसे पहले तो दवा-कम्पनियों के मुनाफ़े को क़ाबू में करने की औक़ात किसी सरकार की नहीं है और सरकारों की मंशा भी नहीं है क्योंकि ख़ुद सरकारें पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी ही तो होती हैं और उसका वजूद ही पूँजीपतियों के मुनाफ़े को बनाये रखने, और बढ़ाने के लिए है। किसी भी सरकार या चुनावी राजनीतिक दल का इस प्रक्रिया को रोकने में कोई हित भी नहीं है। अगर सरकारों को मानवता का ज़रा भी ख़याल होता तो वह दवाओं के समूचे उत्पादन को निजी हाथों से छीनकर अपने हाथों में लेती तथा दवाइयों की बिक्री में से हर तरह के व्यापारी-एजेण्टों को बाहर कर सीधा लोगों तक सप्लाई चेन बनातीं, मगर यहाँ तो गंगा ही उल्टी बहती है।



भारत की सरकारों ने रोगाणु-रोधी दवाएँ बनाने वाली सरकारी फ़ैक्टरियों को कब का बन्द करवा दिया है, मोदी सरकार ने दवाओं की क़ीमतों को भी हर तरह के सरकारी कण्ट्रोल से “आज़ाद” कर दिया है। जब कम्पनियों के मुनाफ़े को कण्ट्रोल करना सम्भव ही नहीं है तो बाक़ी सारी बयानबाज़ी खोखली है। किसी मन्त्री, नेता, नौकरशाह का ऐसा बयान कि कम्पनी के विज्ञापनकर्ता अब डॉक्टरों को ड्यूटी के समय नहीं मिलेंगे, अक्सर ही पढ़ने को मिल जायेगा, मगर इनसे कोई पूछे कि डॉक्टर के घर पर कौन सी मिलिट्री प्लाटून बैठी रहती है कि कम्पनी का एजेण्ट डॉक्टर को उसके घर जाकर नहीं मिल सकता। अगर घर में सीसीटीवी कैमरे भी लगा दिये जायेंगे तो ऐसी “बिज़नेस मीटिंगों” के लिए यह दुनिया छोटी नहीं पड़ जाती। रही बात आम लोगों को शिक्षित करने की, यह काम सरकार तथा डॉक्टर ही कर सकते हैं। सरकार करेगी ही नहीं और डॉक्टरों के पास “समय” कहाँ है। मरीज़ देखने के वक़्त कोई डॉक्टर ऐसा करेगा नहीं क्योंकि इससे तय समय में देखे जाने वाले मरीज़ों की संख्या कम हो जायेगी। लिहाज़ा इससे ओपीडी से होने वाली कमाई भी कम होगी, फिर क्यों कोई ऐसा करेगा, आखि़र कमाई के लिए है वह “सख़्त मेहनत करके” डॉक्टर बना है!


अपने काम के बाद लोगों में प्रचार करना, इसकी बहुसंख्या डॉक्टरों से उम्मीद करना चिड़ी का दूध लेके आने के बराबर है। रोगाणु-रोधी दवाओं का ग़ैर-ज़रूरी इस्तेमाल कम करने में आधुनिक टेस्ट, स्कैन अहम भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन एक काम के टेस्टों का उपलब्धता का दायरा बहुत सीमित है, अगर टेस्ट उपलब्ध है तो टेस्टों के लिए होती मोटी वसूली भी एक रुकावट बन जाती है। ऊपर से टेस्टों/स्कैनों का अपना एक “बिज़नेस” है, जिसकी कहानी दवाओं की कहानी से ज़्यादा अलग नहीं है। कुल मिलाकर नतीजा यह निकलता है कि आप कोई भी रास्ता पकड़ेंगे, वह आपको मौजूदा पूँजीवादी प्रबन्ध के द्वार छोड़ जायेगा। इसलिए अगर विज्ञान को मानवता की सेवा में सच्चे अर्थों में लगाना है तो इस पूँजीवादी प्रबन्ध को नष्ट करना ही होगा। निजी सम्पति के ऊपर टिके इस सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को किनारे लगाना होगा; यह बात किये बिना किसी भी और ढंग-तरीक़े की बात करना या तो एक बच्चे की बेसमझ इच्छा हो सकती है, या फिर आम लोगों से छल-कपट।

साभार- http://ahwanmag.com/ से�

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