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राजकमल प्रकाशन के 70 वर्ष के अवसर पर ‘भविष्य के स्वर’

-आनेवाले समय में किताबें बुक-थिरेपी या रीडिंग थीरेपी के तौर पर इस्तेमाल की जाएंगी: विनीत कुमार

नई दिल्ली।
“राजकमल प्रकाशन का 70 साल सिर्फ़ एक प्रकाशक का व्यवसायिक वर्षगांठ नहीं है। ये पाठक और लेखक के प्रति अपनी जिम्मादारी को साथ लेकर चलने की वर्षगांठ है।“ मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के ये शब्द 28 फरवरी की शाम, आईआईसी में हुए आयोजन का सार है।

जैसे आजकल दिल्ली का मौसम अशांत है; धूप, बारिश, ठंड बहुत ही विचलित तरीके से आ जा रहे हैं, वैसे ही सत्ता के गलियारे में होने वाली हर छोटी बड़ी बात पर पुरे देश की धड़कनों को विचलित कर रही है। इस माहौल में कल की शाम सुकून और उम्मीद से भरी थी।

‘भविष्य के स्वर’ में सात वक्ता, जिनके कार्यक्षेत्र एक दूसरे से जुदा हैं लेकिन जिनका दिल हिन्दी के लिये धड़कता है, ने बहुत ही मजबूती एवं सुक्ष्मता से आने वाले समय में हिन्दी पढ़ने, सुनने, देखने और लिखने को लेकर हमारी आशंकाओं एवं नए रास्तों पर अपना वक्तव्य रखा। वक्ताओं में अनुज लुगुन, आरजे सायमा, अनिल आहूजा ,अंकिता आंनद ,गौरव सोलंकी , विनीत कुमार और अनिल यादव शामिल थे।

पहले वक्ता अनिल यादव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “ जिस हिन्दी में हम इन दिनों सोचते हैं क्या उसी में सोच भी पाते हैं। हिन्दी के टूटे सपने को पूरा करने के लिये भगीरथी उद्यम चाहिए।“ वहीं अनुज लुगुन ने आदिवासी साहित्य की चुनौतियों और संभावनाओं पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “ सामाजिक धरातल पर जो आदिवासी अलग दिखता है, रचनात्मकता के स्तर पर वह एक समान है। परिस्थितियाँ सभी मातृभाषाओं के साथ आदिवासी साहित्य को वैचारिक स्तर पर साथ लाई हैं।“

रेडियों की अपनी चिर परिचित आवाज़ में बोलते हुए सायमा ने सबका दिल जीत लिया जब उन्होंने कहा, ‘हिन्दी पहली मोहब्बत है, उर्दू इश्क़ की भाषा है।“ वहीं अंकिता के सवाल ने सभी को झकझोर दिया। उन्होंने वक्त्वय के आख़िरी हिस्से में सभी से सवाल किया कि, “हम अपने घरों में औरतों के पैर मजबूत करें या उन्हें लंगड़ी मारकर गिराएँ। यह हमें तय करना है। और यही हमारी नियत को भी दर्शाएगा। “

गौरव सोलंकी ने बहुत साफ शब्दों मेँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंश को अपने वक्त्व्य में परिभाषित किया। उन्होंने कहा, “रास्ता पूछने के लिये जिस तरह इंसानों की जरूरत ख़त्म हो रहा है, उसी तरह कहानियाँ लिखने के लिये लेखकों की जरूरत ख़त्म न हो जाए। “

दृश्य विष्फोट के खतरे और भविष्य के डिजाइन पर बात रखते हुए अनिल आहुजा ने कहा कि प्रकाशन जगत का जो नया दौर है वह तकनीकी रूप से शानदार है। भारतीय प्रकाशन जगत को आने वाले समय में विकसित होना है तो समय के साथ प्रकाशन जगत के नए आयामों को भी विकसित करना होगा”.

इस आयोजन की सफलता, कार्यक्रम में उपस्थित वो वरिष्ठ लेखक थे जो बहुत ही उत्साह और तत्परता से वक्ताओं के पास जाकर उन्हें उनके वक्तव के लिये बधाई दे रहे थे। दरअसल, यही वो दृश्य था जिसमें हिन्दी का यकींन छुपा है। यकीन ,की आने वाला कल उम्मीद की मजबूत बुनियाद पर टिका है।

राजकमल प्रकाशन के इस वार्षिक आयोजन में पाठकों के प्रति गहन लगन एव निष्ठा के लिये राजकमल से जुड़े दो सहकर्मियों को शॉल एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। सतीश कुमार राजकमल के साथ बहुत लंबे समय से जुड़े हैं तथा बतौर सेल्स हेड कार्यरत हैं। तथा अशोक त्यागी, लॉजिस्टिक विभाग से संबंधित हैं।

इस मौके पर राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने इस हमारा उत्सव वर्ष है याद दिलाया कि पिछले साल स्थापना दिवस पर जो बातें, जो वादे उन्होंने किये गए थे उन्हें पूरा किया गया। राजकमल से उर्दू और मैथिली किताबों का प्रकाशन शुरू हो चुका है। जल्द ही इसमें बृज एवं अवधि की किताबें भी शामिल हो जाएंगीं।

उन्होंने कहा “अपने 70 वे साल में हम पुस्तक लेखक और पाठकों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को गहराई से अनुभव कर रहे हैं। हिंदी भाषा और समाज के प्रति हमारी निष्ठा पूर्णता अक्षुण रहेगी। वर्तमान के साथ चलते हुए भविष्य के लिए हम तैयार हैं।”

वैसे, सवाल यह भी था कि ‘भविष्य का स्वर’ अभी क्यों? इस संबंध में अपनी बात रखते हुए राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम ने कहा कि हिन्दी में बहुत सारे सवालों को मंच नहीं मिलता। वो हमारे बीच मौजूद हैं लेकिन किसी अदृश्य आशंका से या मठों के ढ़ह जाने के डर से उन्हें दबा दिया जाता है। लेकिन, अब वो समय है कि इन सवालों को मंच मिले। इसी जरूरत को भविष्य के स्वर में व्याख्यायित करने की कोशिश है।

प्रकाशन के स्त्तरहवें वर्षगांठ पर बधाई देते हुए उन्होंने कहा, “राजकमल की 70 वर्षों की यह यात्रा, एक प्रकाशक के साथ लेखकों और पाठकों के भरोसे की सहयात्रा का इतिहास है। निरन्तर गुणवत्ता और पारदर्शिता को लेकर सचेत भाव से ही यह सम्भव हुआ है। आगे यह और बेहतर ढंग से हो, इसका प्रयास रहेगा। आने वाले वर्ष में हम हिन्दीपट्टी की मातृभाषाओं के साहित्य को भी उचित स्थान, उचित सम्मान देंगे। उनको साथ लिए बिना हिंदी बहुत दूर नहीं जा सकेगी”।

संपर्क
संतोष कुमार
M -9990937676

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