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सही राह पर आगे बढ़ाने उत्कृष्ट विचारों को मिले जगह

अपने को बदले बिना दूसरों को बदला जाना संभव नहीं है। शिक्षण, वाणी और लेखनी की शक्ति अब धीरे-धीरे घटती चली जा रही है, क्योंकि कई बार देखा गया है कि शिक्षक, वक्ता और लेखक स्वयं वैसा आचरण नहीं करते जैसा कि दूसरों से कराना चाहते हैं। गुणवत्ता आधारित व्यावहारिक शिक्षा के लिये यह आवश्यक है कि शिक्षक या संदेशवाहक दूसरों के सामने अपना आदर्श उपस्थित करें। यदि आचरण और सद्भावनाओं की सम्पदा का संसार में बढ़ाया जाना उचित और आवश्यक है तो उसका प्रथम प्रयोग अपने आप पर से ही आरंभ करना चाहिए। जो लाभ आप दूसरों तक पहुंचाना चाहते हैं, उसका उपभोग सबसे पहले हम स्वयं ही करें तो क्या बुराई है ?

वास्तव में सद्विचारों की महत्ता का अनुभव तो हम करते हैं, पर उनकी दृढ़ता नहीं रह पाती। जब कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते या सत्संग, प्रवचन सुनते हैं तो इच्छा होती है कि इसी अच्छे मार्ग पर चलें, पर जैसे ही वह प्रसंग पलटा कि दूसरी प्रकार के पूर्व अभ्यास एवं विचार पुन: मस्तिष्क पर अधिकार जमा लेते हैं और वही पुराना घिसा-पिटा कार्यक्रम पुन: चलने लगता है। इस प्रकार उत्कृष्ट जीवन बनाने की आकांक्षा एक कल्पना मात्र बनी रहती है, उसके चरितार्थ होने का अवसर प्राय: आने ही नहीं पाता।कारण यह है कि अभ्यस्त विचार बहुत दिनों से मस्तिष्क में अपनी जड़ जमाए हुए होते हैं, मन उनका अभ्यस्त भी बना हुआ है।

शरीर ने एक स्वभाव एवं ढर्रे के रूप में उन्हें समझा हुआ है। इस प्रकार उन पुराने विचारों का पूरा आधिपत्य हटे और ये उत्कृष्ट विचार वह स्थान ग्रहण करें, तो ही यह संभव है कि मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार और अंत:करण बदले। जब अंत:भूमिका बदलेगी, तब उसका प्रकाश बाह्य कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होगा। परिवर्तन का यही तरीका है। उच्च विचारों को बहुत थोड़ी देर तक हमारी मनोभूमि में स्थान मिलता है। जितनी देर सत्संग-स्वाध्याय का अवसर मिलता है, उतने थोड़े समय ही तो अच्छे विचार मस्तिष्क में ठहर पाते हैं, इसके बाद वही पुराने कुविचार आंधी-तूफान की तरह आकर उन श्रेष्ठ विचारों की छोटी-सी बदली को उड़ाकर एक ओर भगा देते हैं। स्वभावत: होता यही है कि चिरकाल से अभ्यास में आते रहने के कारण उनकी जड़ें भी बहुत गहरी हो जाती हैं। इन्हें उखाड़कर नये श्रेष्ठ विचारों की स्थापना करना सचमुच बड़े अध्यवसाय का काम है।

किसी घने जंगल में कंटीली झाड़ियां सारी भूमि को घेरे रहती हैं, गहराई तक अपनी जड़ें जमाए रहती हैं। यदि उस जंगल को कृषि योग्य बनाना हो वहां वह झाड़-झंखाड़ काटने की व्यवस्था करनी पड़ती है फिर भूमि खोदकर खेत को एक समान करना पड़ता है। खाद और पानी की व्यवस्था जुटानी होती है। इतना प्रबंध करने पर ही वह घने जंगल की ऊबड़-खाबड़ भूमि परिपूर्ण अन्न उपजाने वाली कृषि भूमि के योग्य बन पाती है। मनोभूमि को सत्कर्मों तथा सद्भावनाओं की हरी-भरी फसल उगाने योग्य बनाने के लिये ऐसा ही पुरुषार्थ किया जाना आवश्यक होता है।

दस-पांच मिनट कुछ पढ़ने-सुनने या सोचने, चाहने से ही परिष्कृत मनोभूमि का बन जाना और उसके द्वारा सत्कर्मों का प्रवाह बहने लगना कठिन एवं असंभव है। इसलिए क्रमबध्द, योजनाबध्द, दीर्घकालीन और सुस्थिर प्रयत्न करना होता है। फैलाया हुआ पानी नीचे की ओर आसानी से बिना प्रयत्न के बहने लगता है, पर यदि उसे ऊपर पहुंचाना हो तो इसके लिए कई उपकरण जुटाने की व्यवस्था की जाती है। बिना विशेष प्रयत्नों के पानी ऊपर नहीं चढ़ सकता है। इसी प्रकार स्वल्प प्रयासों से मनोभूमि पर परिवर्तन भी संभव नहीं और बिना आंतरिक परिवर्तन के बाह्य जीवन में श्रेष्ठता की स्थापना हो ही कैसे सकती है?

विचारों को जितनी तीव्रता और निष्ठा के साथ जितनी अधिक देर मस्तिष्क में निवास करने का अवसर मिलता है, वैसे ही प्रभाव की मनोभूमि में प्रबलता होती चलती है। देर तक स्वार्थपूर्ण विचार मन में रहें और थोड़ी देर सद्विचारों के लिये अवसर मिले तो वह अधिक देर रहने वाला प्रभाव कम समय वाले प्रभाव को परास्त कर देगा। इसलिए उत्कृष्ट जीवन की वास्तविक आकांक्षा करने वाले के लिये एक ही मार्ग रह जाता है कि मन में अधिक समय तक प्रौढ़, अधिक प्रेरणाप्रद उत्कृष्ट कोटि के विचारों को स्थान मिले।

जिसका बहुमत होता है उसकी जीत होती है। बहती गंगा में यदि थोड़ा मैला पानी पड़ जाए तो उसकी गंदगी प्रभावशाली न होगी, पर यदि गंदे नाले में थोड़ा गंगाजल डाला जाए तो उसे पवित्र न बनाया जा सकेगा। इसी तरह यदि मन में अधिक समय तक बुरे विचार भरे रहेंगे तो थोड़ी देर, थोड़े से अच्छे विचारों को स्थान देने से भी कितना काम चलेगा? उचित यही है कि हमारा अधिकांश समय इस प्रकार बीते, जिससे उच्च भावनाएं ही मनोभूमि में वितरण करती रहें.अच्छाई में भी अपनी शक्ति एवं विशेषता होती है, पर वह प्रभावशाली तभी बनती है, जब मन, वचन और कर्म में एकता हो। यदि प्रौढ़ और परिपक्व आचरण के श्रेष्ठ व्यक्ति कभी प्रकाश में आते हैं तो उनसे भी अगणित लोग प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

उत्कृष्ट एवं प्रौढ़ विचारों को अधिकाधिक समय तक हमारे मस्तिष्क में स्थान मिलते रहे ऐसा प्रबंध यदि कर लिया जाए तो कुछ ही दिनों में अपनी इच्छा, अभिलाषा और प्रवृत्ति उसी दिशा में ढल जायेगी। और जीवन में वह सात्विक परिवर्तन स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा। विचारों की शक्ति महान है, उससे हमारा जीवन में बदलता ही है, संसार का नक्शा भी बदल सकता है।

दुर्भाग्य एक और भी है कि स्वाध्याय के उपयुक्त साहित्य भी कहीं-कहीं ही दृष्टिगोचर होता है। आज की परिस्थितियों में जो भी संभव हो हमें ऐसा साहित्य तलाश करना चाहिए, जो प्रकाश एवं प्रेरणा प्रदान करने की क्षमता से संपन्न हो।स्वाध्याय में जो पढ़ा गया था, उस आदर्श तक पहुंचने के लिये हम प्रयत्न करें, जो कुछ सुधार संभव है उसे किसी न किसी रूप में जल्दी ही आरंभ करें। श्रेष्ठ लोगों के चरित्रों को पढ़ना और वैसा ही गौरव स्वयं भी प्राप्त करने की बात सोचते रहना मनन और चिंतन की दृष्टि से आवश्यक है। सुलझे हुए विचारों के सच्चे मार्गदर्शक न मिलने के अभाव की पूर्ति सद प्रेरणास्पद साहित्य से ही संभव है। आज उलझे हुए विचारों के लोग बहुत हैं। धर्म के नाम पर आलस्य, अकर्मण्यता, निराशा, दीनता, कर्तव्य की उपेक्षा, स्वार्थपरता, संकीर्णता की शिक्षा देने वाले सत्संगों से जितनी दूर रहा जाए, उतना ही कल्याण है।

जीवन को सही राह पर आगे बढ़ाने हेतु सुलझे हुए उत्कृष्ट विचारों को मस्तिष्क में जगह देने का साधन जुटाना चाहिये। स्वाध्याय से, सत्संग से, मनन से, चिंतन से जैसे भी बन पड़े, वैसे यह प्रयत्न करना चाहिए कि हमारा मस्तिष्क उच्च विचार धारा में निमग्न रहे यदि इस प्रकार के विचारों में मन लगने लगे, उनकी उपयोगिता समझ पड़ने लगे, उनको अपनाते हुए आनंद का अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आधी मंजिल पार कर ली गयी। ज़िंदगी अपना काम करने लगी है।
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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी
ऑटोनॉमस कालेज, राजनांदगांव।
मो.9301054300



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