ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

कुतुबमीनार का एक एक हिस्सा चीख चीख कर कह रहा है कि ये प्राचीन वैधशाला है

महरौली स्थित कुतुबमीनार । महरौली ( मिहिरावली ) के पास स्थित कुतुबमीनार के आज के प्रसिद्ध नाम के अतिरिक्त अन्य अनेक नाम प्रचलित रहे हैं । जैसे- विश्वकर्मा प्रासाद , यमुनास्तम्भ , विजय – स्तम्भ , कीर्त्तिस्तम्भ , सूर्यस्तम्भ , वेधस्तम्भ , विक्रम – स्तम्भ , ध्रुवस्तम्भ – विष्णुध्वज ध्रुवध्वज , मेरुध्वज , पृथ्वीराज की लाट , दिल्ली की लाट , महरौली की लाट , कुतुब की लाट आदि । मुस्लिम सुलतान मुहम्मद बिनसाम ( शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ) , ग्यासुद्दीन ( मुहम्मद गौरी का बड़ा भाई ) , कुतुबुद्दीन , इलतुतमिश , अलावद्दीन खिलजी , फिरोजशाह लोधी ने किसी न किसी रूप में अपना सम्बन्ध इस स्तम्भ ( मीनार ) से जोड़ने का यत्न किया है तथा इस पर कुरान की आयते खुदवाकर , अपना बनाया बता कर अथवा बिजली गिरने से टूटने पर मरम्मत कराने तक का उल्लेख किया है ।

यह सब कार्यवाही सन् 1193 से लेकर सन् 1407 ई 0 के मध्य की गई है । इस मीनार के सर्वविध सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह सिद्ध होता है कि मीनार खगोलविद्या जानने के लिए आचार्य वराहमिहिर द्वारा महाराजा विक्रमादित्य के काल में विशुद्ध भारतीय पद्धति पर बनवाया हुआ , वेधशाला के मध्यभाग का अवशेष सूर्यस्तम्भ है । इसे भारतीय स्थापत्य सिद्ध करने में निम्नलिखित हेतु, तर्क , प्रमाण आदि हैं । पाठक कुतुबमीनार पर जाकर स्वयं देखें और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर , बुद्धि का उपयोग करके निर्णय लेने का यत्न करें ।

1 . 238 फीट 1 इंच ऊंची मीनार का मुख्य प्रवेशद्वार उत्तर दिशा ( ध्रुवतारे ) की ओर है । मुस्लिम धार्मिक भवन पूर्वाभिमुख होते हैं ।

2 . इस मीनार के प्रथम खण्ड में दस ( सात बड़ी , 3 छोटी ) , द्वितीय खण्ड में पांच तथा तीसरे , चौथे , पांचवें खण्ड में चार – चार खिड़की हैं । ये कुल मिलाकर 27 हैं । ज्योतिष के अनुसार 27 नक्षत्र होते हैं । समय विशेष में प्रत्येक नक्षत्र का अध्ययन करने के लिये एक – एक खिड़की का प्रयोग किया जाता था । बाहर से देखने पर ये खिड़कियां मात्र एक झरोखा दिखती हैं , परन्तु भीतर की ओर इतनी चौड़ी हैं कि कई व्यक्ति एक साथ खड़े होकर अथवा दो व्यक्ति यन्त्रों सहित बैठकर अध्ययन कर सकें । ये झरोखे स्तम्भ में प्रकाश के लिए कदापि नहीं हैं । यदि प्रकाश के लिये होते तो एक ही अनुपात से चारों ओर समानान्तर बनाये गये होते है । इसके विपरीत जहाँ प्रकाश की आवश्यकता जान पड़ती है , वहाँ एक भी झरोखा नहीं बना है । ये झरोखे नक्षत्रों की चाल और ऋतु के अनुकूल बनाये गये हैं ।

3 . इस मीनार में स्थान – स्थान पर भारतीय कला के प्रतीक कमल के फूल , चक्र मन्दिर की घण्टियां , जंजीर ( बेल ) आदि बनी हुई हैं । ये प्रतीक मुस्लिम कलाशैली के सर्वथा विपरीत हैं ।

4 . इस स्तम्भ के बाहर चारों और जो अरबी भाषा में अभिलेख उत्कीर्ण किये हुए हैं , यदि उन पत्थरों को निकालकर देखा जाये तो उनके पृष्ठभाग में हिन्दूदेवप्रतिमायें बनी हुई हैं , उनके नाम , मुख आदि तोड़कर उन्हें पलटकर वहीं लगा दिया गया और दूसरे भाग में अरबी में लेख खुदवा कर यह सिद्ध करने का असफल प्रयत्न किया गया है कि यह मीनार मुस्लिम शास्कों द्वारा निर्मित है । यदि ऐसा प्रमाण ( जिस पर एक और हिन्दू प्रतिमा है तथा दूसरी ओर अरबी में कुरान की आयत खुदी हुई है ) आप देखना चाहें तो कुतुबपरिसर के मुख्य प्रवेशद्वार ( पार्किंग स्थल ) के सामने सड़क पर पूर्व को ओर एक छोटा – सा संग्रहालय है , उसमें जाकर किसी भी अधिकारी से प्रार्थना करके देख सकते हैं । वैसे उसके दिखाने पर प्रतिबन्ध – सा है । क्योंकि उसके प्रचार – प्रसार से हठधर्मी लोग अप्रसन्न हो सकते हैं । उसी संग्रहालय में मस्जिद के बुलन्द दरवाजे के दोनों ओर से मरम्मत के नाम पर निकाले गये तीन विशाल प्रस्तरों पर सुन्दर हिन्दू देव प्रतिमायें बनी हुई प्रदर्शित की गई हैं तथा अनेक प्रतिमायें उसी द्वार में भीतर की ओर मूर्ति का मुख करके लगाई हुई हैं ।

5 . अनेक अरबी लेखों के बीच – बीच में कमलपुष्प , घण्टी , चक्र आदि चित्रित हैं , जिनका लेख के साथ मेल नहीं खाता है ।

6. इस मीनार के पास बनी कुव्वत – उल – इस्लाम नामक मस्जिद के मुख्य द्वार पर अरबी भाषा में लिखा एक अभिलेख ( शिलालेख ) लगा हुआ है । उसमें कुतुबुद्दीन ऐबक ने लिखवाया है –
ई हिसार फतह कर्दं ईं मस्जिद राबसाखत बतारीख फीसहोर सनतन समा व समानीन वखमसमत्य अमीर उल शफहालार अजल कबीर कुतुब उल दौला व उलदीन अमीर उल उमरा एबक सुलतानी उज्ज उल्ला अनसारा व बिस्ती हफत अल बुतखाना करकनी दर हर बुतखाना दो बार हजार बार हजार दिल्लीवाल सर्फ सुदा बूददरी मस्जिद बकार बस्ता सदा अस्त ।

अर्थात् हिजरी सन् 589 ( 1121-12 ईसवी सन् ) में कुतुबुद्दीन ऐबक ने यह किला विजय किया और सूर्यस्तम्भ के घेरे में बने 27 बुतखानों ( मन्दिरों ) को तोड़कर उनके माले से यह मस्जिद बनवाई । ये मन्दिर एक – से – मूल्य के थे । एक – एक मन्दिर 20-20 लाख दिल्लीवाल ( दिल्ली में बने सिक्के का नाम ) की लागत से बना हुआ था ।

( अर्थात् ) 27 मन्दिर पांच करोड़ चालीस लाख रुपयों से बने हुये थे । उनमें ज्योतिष से सम्बन्धित यन्त्र भी अवश्य लगे हुये होंगे तथा मूल्यवान् हीरे , जवाहरात , स्वर्ण – रजत आदि से विभूषित होंगे । यहां ध्यान देने योग्य बात है कि मुस्लिम लेखक ने “ बीस लाख ” शब्द न लिख कर ” दो बार हजार ” लिखा है । क्या उन्हें बीस लाख तक की गिनती भी नहीं आती थी । )
7 . 8 सितम्बर 1222 में इसी कुवत – उल – मस्जिद के आग्नेय कोण ( दक्षिणी – पूर्वी कोण ) में लाल पत्थर के खम्भे पर खुदा एक लेख सर्वप्रथम मेरे द्वारा प्रकाश में लाया गया था । यह लेख लगभग आठवीं शती ईस्वी का हैं । इस लेख में 9 पंक्तियां हैं । लेख बहुत घिसा हुआ है । पुनरपि कुछ अक्षर इस प्रकार पढ़े गये हैं —
पंक्ति 1. नमो भगवते .. पंक्ति 6 . वारिकवे सिद्धा ..
पाक्त 2 . श्री देव पंक्ति 7 . प्रतिहस्तकः पाकड . पंक्ति 3. न्द्रस्य पौत्रे .. पंक्ति 8 . दिभि : देव ..
पंक्ति 4. डल्हणेन दत्ता पंक्ति 9. स्थापितः।।
पंक्ति 5. गणयति चातप ..

जब यह लेख भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग में निदेशक की दृष्टि में लाया गया तो उन्होंने अपना 250 वर्ष पुराना रिकार्ड चैक किया और बताया कि कुतुब क्षेत्र के सारे लेख इस पुस्तक में छपे हैं , परन्तु आप द्वारा खोजा गया यह लेख पहली बार प्रकाश में आया है । दिसम्बर 1992 में जब यह सूचना मैंने नवभारत टाइम्स में सचित्र प्रकाशित करानी चाही तो उन्होंने कहा – अयोध्या मन्दिर – मस्जिद का झगड़ा तो अभी शान्त नहीं हुआ है , आप एक झगड़े की जड़ और ले आये । हम इस सूचना को नहीं छाप सकते । और यह भी कहा कि पुरातत्त्व विभाग के अधिकारियों से लिखवाकर लाइये कि यह अभिलेख पहली बार प्रकाश में आया है और आपने इसे ठीक ही पढ़ा है । मैंने कहा- पुरातत्त्व अधिकारी तो इसे गलत पढ़ रहे हैं । जैसे कि जिस पद को मैं ‘ नमो भगवते’ पढ रहा हूँ उसे ही पुरातत्त्व के विशेषज्ञ ‘ 793 संवत् ‘ पढ रहे हैं , और अभी तक अप्रकाशित तो है ही । यह सुनकर भी सम्पादक महोदय टाल गये तथा अभिलेख का चित्र तथा सूचना न तो छापी, न ही वापिस लौटाई ।

यह है स्वतन्त्र भारत के समाचार पत्रों की मानसिकता । बाद में पंजाबकेसरी समाचार पत्र ने इस सूचना को प्रकाशित किया था । इस सारे विवेचन से यह सिद्ध है कि यह मीनार कुतुबुद्दीन ऐबक से कम से कम 400 सौ वर्ष पहले तो अवश्य विद्यमान थी ।

7. अरबी भाषा में कुतुबी तारा ध्रुवतारे का नाम है । जिस मीनार से ध्रुवतारा आदि का निरीक्षण किया जाये वह कुतुबुमीनार कहाती है । कुतुबुद्दीन ऐबक से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने करवाया होता तो इस पर अपना नाम , संवत् , निर्माण विषयक अन्य जानकारी आदि अवश्य लिखाता जैसे उसने इसी के पास बनवाई कुवत उल इस्लाम नामी मस्जिद , अजमेर का अढाई दिन का झोंपड़ा और पलवल के मन्दिर को गिराकर बनवाई गई मस्जिद पर जब अपना शिलालेख लगवा दिया तो कुतुबमीनार जैसी महत्त्वपूर्ण रचना को बनवाने वाला होता तो इसपर अपने नाम का लेख क्यों नहीं 1 खुदवाया ।

9. सैनिक आदि लोग दिशा ज्ञान के लिये कम्पास नामक एक यन्त्र अपने पास रखते हैं , इसकी सूई सदा उत्तर दिशा में रहती हैं । इसका एक नाम कुतुबनुमा भी है अर्थात् ध्रुवतारे की दिशा का ज्ञान कराने वाला यन्त्र । इस नाम से कोई कुतुब शब्द देखकर यह कहने लगे कि कुतुबनुमा यन्त्र का आविष्कार कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया है तो का इसे संसार सत्य मान लेगा । यही बात कुतुबमीनार के कुतुब शब्द पर भी लागू होती है । इसी भांति ध्रुवतारे को कुतुबी तारा कहते हैं तो क्या इसे भी कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया हुआ मान लिया जाये ?

ज्योतिष की दृष्टि से दक्षिण की ओर झुकाव देकर कुतुबमीनार का निर्माण किया गया है । इसीलिये सबसे बड़े दिन 29 जून को मध्याह्न में इतने विशाल स्तम्भ की छाया भूमि पर नहीं पड़ती । कोई भी पाठक वह जाकर इसका निरीक्षण कर सकता है । इसी प्रकार दिन – रात बराबर होने वाले दिन 29 मार्च 22 सितम्बर को भी मध्याह्न के समय इस विशाल स्तम्भ के मध्यवर्ती खण्डों की परछाई न पड़ कर केवल बाहर निकले भाग को छाया पड़ती है और वह ऐसे दीखती है जैसे पांच घड़े एक दूसरे पर औंधे रक्खे हुये हों । वर्ष के सबसे छोटे दिन 23 दिसम्बर को मध्याह्न में इसकी छाया 280 फीट दूर तक जाती है , जबकि छाया 300 फीट तक होनी चाहिये । क्योंकि मूलत : मीनार 300 फीट की ( 16 गज भूमि के भीतर और 84 गज भूमि के बाहर = 200 गज = 300 फीट) यह 20 फीट की छाया की कमी इसलिये है कि मीनार की सबसे ऊपर के मन्दिर का गुम्बद जैसा भाग टूट कर गिर गया था , जितना भाग गिर गया , उतनी ही छाया कम पड़ती है , मीनार का ऊपरी भाग न टूटता तो छाया भी 300 फीट ही होती ।

11 . दिल्ली के वर्तमान कालका मन्दिर का सम्बन्ध भी इसी वेधशाला से था । इसका नाम काल का = समय का मन्दिर है । कुतुबमीनार के पूर्व की ओर उत्तरपूर्व ( ईशान ) कोण तथा दक्षिणापूर्व ( आग्नेय ) कोण में न मन्दिर थे । इसी भांति पश्चिम में पश्चिमोत्तर ( वायव्य ) कोण तथा दक्षिणपश्चिम ( नैर्ऋत ) कोण में भी तीन मन्दिर थे । छोटे बड़े और समाज दिन – रात होने के समय कुतुबमीनार पर चढ़कर प्रातः सांय देख सकते हैं कि सूर्योदय ठीक मन्दिर की चोटी पर से उदय हो रहा है और सायंकाल सूर्यास्त के समय पश्चिम दिशा में मन्दिर की चोटी पर अस्त हो रहा है । यह दृश्य वर्ष में तीन वार ( 29 मर्च , 29 जून और 23 दिसम्बर को ) देखा जा सकता था । आज भी उन पांच मन्दिरों के अवशेष पूर्व – पश्चिम में विद्यमान है । छठा काल का मन्दिर तो अभी तक पूर्णयता सुरक्षित है ही।

12 . कुतुबुमीनार के झरोखों भीतर की ओर ज्योतिष सम्बन्धी कुछ गूढ़ अक्षर , अंक और रेखा आदि संकेतक चिन्ह बने हुये हैं । उन्हें मुस्लिम कारीगर तो क्या ज्योतिषविद्या रहित कोई संस्कृत का पण्डित भी नहीं जान सकता । जैसे ना 2 स 12673 , 2 त्रो , ना 3 स्त , 5 रु रो 10 ता , 4 घे 12 म आदि । इस सूर्यस्तम्भ पर चढ़कर नक्षत्रों का अध्ययन करने वाले ज्योतिषियों ने ये संकेत खगोलीय वेध आदि विशेष अवसरों पर लिखे लिखवाये होंगे ।

13 . प्रसिद्ध दार्शनिक और इतिहास के विद्वान् श्री आचार्य उदयवीर शास्त्री , श्री महेशस्वरूप भटनागर , श्री केदारनाथ प्रभाकर आदि अनेक शोधकर्त्ताओं ने सन् 1970-71 में कुतुबमीनार और इनके निकटवर्ती क्षेत्र का गूढ निरीक्षण किया था । उस समय इस मीनार की आधारशिला तक खुदाई भी कराई थी , जिससे ज्ञात हुआ कि यह मीनार तीन विशाल चबूतरों पर स्थित है । पूर्व से पश्चिम में बने चबूतरों की लम्बाई 42 फीट तथा उत्तर से दक्षिण में बने चबूतरे की लम्बाई 45 है । यह दो फीट का अन्तर इसलिए है कि मीनार का झुकाव दक्षिण दिशा की ओर है , इसका सन्तुलन ठीक रक्खा जा सके । उसी निरीक्षण काल में श्री केदारनाथ प्रभाकर को मस्जिद के पश्चिमी भाग की दीवार पर बाहर की ओर एक प्रस्तर खण्ड पर एक त्रुटित अभिलेख देखने को मिला। उसके कुछ पद इस प्रकार पढ़े गये थे –
सूर्य मेरुः पृथिवी यन्त्रैः मिहिरावली यन्त्रेण इन शब्दों से भी यह स्थान ज्योतिष केन्द्र सिद्ध होता है ।

14 . मुस्लिम सम्प्रदाय के प्रसिद्ध नेता सर सैयद अहमद खान ने कुतुबमीनार पर दृढ रस्सों के सहारे एक बड़ा और मजबूत टोकरा लटकवाकर उसमें बैठकर मीनार पर खुदे अभिलेखों को सबसे पहले पढ़ा था । उसके मतानुसार अरबी में लिखे ये अभिलेख बिना किसी योजना एवं बिना उद्देश्य के लिखे हुये हैं । वे कहते हैं कि इन अभिलेखों की भाषा और अक्षर रचना भी अशुद्ध हैं । वे अपने ग्रन्थ ‘ असर – उस संदिद ‘ में लिखते है कि यह भवन राजपूत काल में निर्मित हुआ प्रतीत होता है ।

15 . भारत के प्रसिद्ध ज्योतिषी आचार्य वराहमिहिर के नाम पर मिहिरावली नामक ग्राम बसा हुआ था । यही नाम कालान्तर में विकृत होता – होता महरौली बन गया । प्रसिद्ध भाषा विशेषज्ञ और महान् शिक्षाविद् श्री डॉ० लोकेशचन्द्र जी पूर्व सांसद की मान्यता है कि महरौली का प्राचीन नाम मिहिरपल्ली था । पल्ली शब्द ग्राम का याचक है । अर्थात् ज्योतिषी ब्राह्मणों का ग्राम । दक्षिण भारत में अभी यह प्रथा देखी जा सकती है । यूनानी भाषा में मिहिर शब्द सूर्य का वाचक है । कुषाण सम्राट् कनिष्कने अपनी मुद्राओं पर वायु , चन्द्रमा , सूर्य आदि भारतीय देवों की प्रतिमायें चित्रित करवाई थीं । उनपर सूर्य को ग्रीक लिपि में ही लिखा है । आचार्य वराहमिहिर भारतीय पद्धति के महान् ज्योतिषी तो थे ही साथ ही वे यूनानी पद्धति से भी ज्योतिषविद्या के पूर्ण ज्ञाता थे । उनके ग्रन्थों में ताबुरि , जितुमलेय , पाथोन , जूक , आकोकेर , हेलि , हिबुक , आस्फुजित् , अनफा , सुनफा , आपोक्लिम , पणफर , मेषूरण , रिफ : आदि यावनी भाषा के शब्दों का प्रयोग बतलाता है कि वे संस्कृत भाषा की भांति यूनानी भाषा के माध्यम से यूनान देश को भी ज्योतिष सम्बन्धी विशाल ज्ञान दे गये हैं ।

16 . कुतुबुमीनार की शैली पर ही अफगानिस्तान में भी एक मीनारेजाम बनी हुई मिली है । महाराज विक्रमादित्य के समय भारत की सीमा बल्ख बुखारा तक थी । उसी समय आचार्य वराहमिहिर ने अफगानिस्तान स्थित यह मीनारेजाम भी बनवाया होगा , ऐसी सम्भावना व्यक्त की जाती है । वह मीनार 193 फीट ऊंची है । यह मीनार अफगानिस्तान के हीरात प्रान्त की हरिरूद नामक नदी के पास स्थित है ।

इस संक्षिप्त विवेचन से पाठक समझ गये होंगे कि महरौली स्थित यह सूर्यस्तम्भ = ध्रुवस्तम्भ कुतुबमीनार भारतीय प्राचीन ज्योतिषियों द्वारा निर्मित महान् स्थापत्य कला का एक जीता – जागता उदारहण है । इसके निर्माण में मुस्लिम सुल्तानों का कोई योगदान नहीं है । यथाशक्ति कोई कसर नहीं छोड़ी । ये मुस्लिम शासक भारत में अपना राज्य जमाने के लिये सदा लड़ते रहे । इसे विकृत और नष्ट करने में उन्होंने यथामति उनके राज्य में सुख चैन नहीं रहा , ऐसे युद्धों की विभीषिका में ऐसे रचनात्मक कार्य कैसे कर सकते थे । आशा है पाठक लोग उपर्युक्त विवेचन से सत्यासत्य के निर्णय करने में सक्षम हो सकेंगे ।

(लेखक पुरातत्व संग्रहालय गुरुकुल झज्जर के निदेशक हैं)
प्रस्तुति – अमित सिवाहा

image_pdfimage_print


Get in Touch

Back to Top