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ओशो और हरिसिंह गौर

मैं सागर विश्वविद्यालय में विद्यार्थी था। उस विश्वविद्यालय का निर्माण किया सर हरिसिंह गौर ने। वे भारत के बहुत बड़े वकील थे। बड़े तर्क-शास्त्री थे। और भारत में ही उनकी वकालत नहीं थी। वे तीन दफ्तर रखते थे। एक पेकिंग में, एक दिल्ली में, एक लंदन में। सारी दुनिया में उनकी वकालत की शोहरत थी।

मैंने उनसे एक दिन कहा कि आपकी वकालत की शोहरत कितनी ही हो, वकील और वेश्या को मैं बराबर मानता हूं!
उन्होंने कहा, क्या कहते हो!
वे गुस्से में आ गए। वे संस्थापक थे विश्वविद्यालय के। प्रथम उपकुलपति थे। और मैं तो सिर्फ एक विद्यार्थी था। मैंने कहा कि मैं फिर कहता हूं कि वकील वेश्या होता है! अगर वेश्याएं नर्क जाती हैं, तो वकील उनके आगे-आगे झंडा लिए जाएंगे! और तुम पक्के–झंडा ऊंचा रहे हमारा–उन्हीं लोगों में रहोगे।
उन्होंने कहा, तू बात कैसी करता है? तुझे यह भी सम्मान नहीं कि उपकुलपति से कैसे बोलना!
मैंने कहा, मैं वकील से बात कर रहा हूं, उपकुलपति कहां! मैं सर हरिसिंह गौर से बात कर रहा हूं।
वे कहने लगे, मैं मतलब नहीं समझा कि क्यों वकील को तू वेश्या के साथ गिनती करता है!
मैंने कहा, इसीलिए कि वकील को जो पैसा दे दे, उसके साथ। वह कहता है कि तुम्हीं जीत जाओगे।
मुल्ला नसरुद्दीन एक दफा अपने वकील के पास गया। उसने अपना सारा मामला समझाया। और वकील ने कहा कि बिलकुल मत घबड़ाओ। पांच हजार रुपए तुम्हारी फीस होगी। मामला खतरनाक है, मगर जीत निश्चित है।
उसने कहा, धन्यवाद। चलता हूं!
जाते कहां हो? फीस नहीं भरनी! काम नहीं मुझे देना!
उसने कहा कि जो मैंने वर्णन आपको दिया, यह मेरे विरोधी का वर्णन है। अगर उसकी जीत निश्चित है, तो लड़ना ही क्यों!
यह मुल्ला भी पहुंचा हुआ पुरुष है!
जब तुम कह रहे हो खुले आम कि इसमें जीत निश्चित ही है–यह तो मैं अपने विरोधी का पूरा का पूरा ब्यौरा बताया। अपना तो मैंने बताया ही नहीं! तो अब मेरी हार निश्चित ही है। अब पांच हजार और क्यों गंवाने! नमस्कार! तुम अपने घर भले, हम अपने घर भले!
वकील को भी चकमा दे गया। वकील ने भी सिर पर हाथ ठोंक लिया होगा। सोचा ही नहीं होगा कि यह भी हालत होगी! वह तो अपना मामला बताता तो उसमें भी वकील कहता कि जीत निश्चित है। आखिर दोनों ही तरफ के वकील कहते हैं, जीत निश्चित है! वकील को कहना ही पड़ता है कि जीत निश्चित है। तभी तो तुम्हारी जेबें खाली करवा पाता है।
तो मैंने कहा वकील की कोई निष्ठा होती है? उसका सत्य से कोई लगाव होता है? तो मैं उसकी वेश्या में गिनती क्यों न करूं! वेश्या तो अपनी देह ही बेचती है। वकील अपनी बुद्धि बेचता है। यह और गया-बीता है।
उन्होंने मेरी बात सुनी। आंख बंद कर ली। थोड़ी देर चुप रहे और कहा कि शायद तुम्हारी बात ठीक है। मुझे अपनी एक घटना याद आ गई। तुम्हें सुनाता हूं।
प्रीव्ही काउन्सिल में एक मुकदमा था, जयपुर नरेश का। मैं उनका वकील था। करोड़ों का मामला था। जायदाद का मामला था, जमीन का मामला था। और तुम जानते हो कि मुझे शराब पीने की आदत है। रात ज्यादा पी गया। दूसरे दिन जब गया अदालत में, तो नशा मेरा बिलकुल टूटा नहीं था। कुछ न कुछ नशे की हवा बाकी रह गई थी।
नशा कुछ झूलता रह गया था। सो मैं भूल गया कि मैं किसके पक्ष में हूं! सो मैं अपने मुवक्किल के खिलाफ बोल गया। और वह धुआंधार दो घंटे बोला! और मैं चौंकूं जरूर कि न्यायाधीश भी हैरान होकर सुन रहे हैं! मेरा मुवक्किल तो बिलकुल पीला पड़ गया है! और वह जो विरोधी है, वह भी चकित है! विरोधी का वकील भी एकदम ठंडा है, वह भी कुछ बोलता नहीं! और मेरा जो असिस्टेंट है, वह बार-बार मेरा कोट खींचे! मामला क्या है!
जब चाय पीने की बीच में छुट्टी मिली, तो मेरे असिस्टेंट ने कहा कि जान ले ली आपने! आप अपने ही आदमी के खिलाफ बोल गए! बरबाद कर दिया केस! अब जीत मुश्किल है।
हरिसिंह ने कहा, क्या मामला है, तू मुझे ठीक से समझा। बात क्या है! मुझे थोड़ा नशा उतरा नहीं। रात ज्यादा पी गया एक पार्टी में। चल पड़ा सो चल पड़ा, ज्यादा पी गया।
तो उसने बताया कि मामला यह है कि जो-जो आप बोले हो, यह तो विपरीत पक्ष को बोलना था! और वे भी इतनी कुशलता से नहीं बोल सकते, जिस कुशलता से आप बोले हो। इसलिए तो बेचारे वे खड़े थे चौंके हुए, कि अब हमें तो बोलने को कुछ बचा ही नहीं। और मुकदमा तो गया अपने हाथ से!
कहा, मत घबड़ाओ। हरिसिंह गौर ने कहा, मत घबड़ाओ। और जब चाय पीने के बाद फिर अदालत शुरू हुई, तो उन्होंने कहा कि न्यायाधीश महोदय! अब तक मैंने वे दलीलें दीं, जो मेरे विरोधी वकील देने वाले होंगे। अब मैं उनका खंडन शुरू करता हूं!
और खंडन किया उन्होंने। और मुकदमा जीते!
तो वे मुझसे बोले कि शायद तुम ठीक कहते हो। यह काम भी वेश्या का ही है।
तर्क वेश्या है। तर्क कैसे ऋषि होगा? तर्क तो किसी भी पक्ष में हो सकता है। तर्क की कोई निष्ठा नहीं होती। वही तर्क तुम्हें आस्तिक बना सकता है; वही तर्क तुम्हें नास्तिक बना सकता है। इसलिए तो जो सच्चे धार्मिक हैं, उनकी आस्तिकता तर्क-निर्भर नहीं होती। तर्क पर जिसकी आस्तिकता टिकी है, वह आस्तिक होता ही नहीं। वह तो कभी भी नास्तिक हो सकता है। उसके तर्क को गिरा देना कोई कठिन काम नहीं है।

आस्तिक कहता है कि मैं ईश्वर को मानता हूं, क्योंकि दुनिया को कोई बनाने वाला चाहिए। और नास्तिक भी यही कहता है कि अगर यह सच है, तो हम पूछते हैं कि ईश्वर को किसने बनाया? तर्क तो दोनों के एक हैं।

आस्तिक कहता है, ईश्वर बिना बनाया है। तो नास्तिक कहता है, जब ईश्वर बिना बनाया हो सकता है, तो फिर सारी प्रकृति बिना बनाई क्यों नहीं हो सकती? क्या अड़चन है? और अगर कोई भी चीज बिना बनाई नहीं हो सकती, तो फिर ईश्वर को भी कोई बनाने वाला होना चाहिए। इसका जवाब दो।

अब यह तर्क तो एक ही है। अब कौन कितना कुशल है, कौन कितना होशियार है, किसने अपनी तर्क को कितनी धार दी है, इस पर निर्भर करता है। इसलिए आस्तिक नास्तिकों से बात करने में डरता है।

तुम्हारे शास्त्रों में लिखा है: नास्तिकों की बात मत सुनना। सुनना ही मत। ये आस्तिकों के शास्त्र नहीं हैं। ये नपुंसकों के शास्त्र हैं। नास्तिक की बात मत सुनना? दूसरे धर्म वालों की बात मत सुनना! क्यों? क्योंकि डर है कि अपनी ही बात तर्क पर खड़ी है, और उसी तर्क के आधार पर गिराई भी जा सकती है।
जो बोले सो हरि कथा-(प्रश्नोत्तर)-प्रवचन-06

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