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हमारे डिजिटल लेन-देन से करोड़ों अरबों के वारे न्यारे करेगी अमरीकी कंपनियाँ

भारत की आर्थिकी को नोटबंदी ले डुबेगी तो उससे अधिक लुटाने वाला काम डिजिटल लेन-देन है। वजह कई हैं। एक, इससे गरीबों से धंधा कर पैसा वसूला जाएगा। उसके सौ रु की वेल्यू एक-एक रुपए घटती जाएगी। उसके हर लेन-देन पर कंपनियां धंधा करेगी। पैसा कमाएगी। इस धंधे में चुपचाप मलाई खाएगी अमेरिका की वीसा और मास्टर कार्ड कंपनियां। भारत सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नीति आयोग के अमिताभ कांत कैसलैश इकोनोमी, नकदी खत्म करने, बैंक के जरिए आनलाइन लेन-देन करवाने की जितनी भी बाते कर रहे हंै उन सबके पीछे बड़ी कारोबारी कंपनियों की लॉबिग है। इनमें सर्वाधिक पौ-बारह अमेरिकी कंपनियों की होगी।

पता नहीं संघ परिवार और नरेंद्र मोदी के स्वदेशी-भक्तों को मालूम है या नहीं लेकिन सबको जान लेना चाहिए कि कैसलैश लेन-देन का फायदा दीर्घकाल में यदि किसी को सर्वाधिक होना है तो वह अमेरिका की वीसा और मास्टर कार्ड जैसी उन कंपनियों को है जो बैंकिंग लेन-देन को प्रोसेस करवाने की तकनीक, नेटवर्क और ढाचा लिए हुए है। कोई माने या न माने 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा और उसके बाद नरेंद्र मोदी व अरुण जेटली की कैसलेश लेन-देन करवाने की सर्वाधिक तारीफ अमेरिका ने और उसकी कंपनियों ने की है। बूल्मबर्ग, फॉरबेस, फार्च्यून जैसी विदेशी-नामी आर्थिक एजेंसियां, पत्रिकाओं में खबरें छपी है कि नोटबंदी से अमेरिका की वीसा, मास्टर कार्ड, एमेक्स आदि कंपनियों की किस्मत खुल गई है। इनके शेयर यह सुन उछले कि भारत कैसलैश बन रहा है। यों स्वदेशी लोग कह सकते हैं कि रुपए के देशी पेमेंट गेटवे,रूपे कार्ड, रिलांयस की जियो या पेटीएम आदि इन अमेरिकी कंपनियों को पछाड़ देगी लेकिन ऐसा सोचना मूर्ख संसार में रहना है। इस मामले में हमेशा दिमाग में यह उदाहरण पैठाए रखें कि जैसे अमेरिकी आनलाइन खरीदारी कंपनी एमेजोन के आगे एक-एक कर भारत के आनलाइन श़ॉपिंग ब्रांड पिछड़े हंै और अमेरिकी कंपनी अपनी गहरी पॉकेट के लंबे विजन में एक-एक कर देशी खिलाडि़यों को जैसे फेल कर रही है वही ट्रैंड कैसलेश के धंधे में होगा।

हां, कैशलेस का मतलब है धंधा। यदि मैंने-आपने नकदी से, जेब में रखे नोट से लेन-देन नहीं किया है और मोबाईल, पीटीएम, ई वैलेट, क्रेडिट-डेबिट कार्ड से किया है तो उस सुविधा की, सेवा की मुझे बाकायदा कीमत देनी होगी। मेरे लेन-देन पर बैंक, इंटरनेट, आनलाइन से ट्रांजेक्शन के नेटवर्क की लागत वाली कीमत वसूलेगा। कार्ड, बैंक, कंपनियां, सरकार लेनदेन करते वक्त भले पैसा वसूलते हुए सामने नहीं दिखाई दे मगर ये चुपचाप आपकी सौ रु की अदायगी को 101 रु की बनाएंगे या आपसे वसूली करनी है तो दिखने में 100 रु होंगे लेकिन होंगे वे 99 रु ही। यह एक रु का चार्ज, शुल्क बैंक-कार्ड स्टेटमेंट में चुपचाप होगा। और सर्विस टैक्स आदि अलग।

कह सकते हंै कि क्या फर्क पड़ता है एक, दो या तीन रु के चार्ज या इतनी चुपचाप वसूली पर? पर भारत में पड़ता है। भले भारत के उन 4 प्रतिशत लोगों के लिए यह मतलब वाली बात नहीं होगी जो भारत की कुल संपदा का 53 प्रतिशत जेब में रखे हुए है। सुपर रिच और अरबपतियों याकि अंबानी, अडानी, बिड़ला आदि के लिए 100 रु का छोटा हिसाब बेमतलब है। इनके लिए भले यह विकास होगा मगर मनरेगा के मजदूर के लिए तो जेब कटना है।

इस बात को समझा जाना चाहिए कि आनलाइन पेमेंट कुल मिलाकर बड़े लोगों को सुविधा, लक्जरी के नाते मुहैया हुई एक सुविधा है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में यह कन्सप्ट जेब में पैसे रखने के झंझट से निजात पाने के लिए बना। अमीर देशों में उन अमीर लोगों की सेवा के लिए सुविधा बनी जो जेब में पैसा रखना झंझट मानते है। वैसे कई मायनों में यह बात सर्वकालिक है कि राजा लोग जो होगे उसके लिए खंजाची होंगे। दरबार के मंत्री लोग अपने मुलाजिमों से लेन-देने करवाते थे। मतलब बड़े लोगों की बड़ी बात में कैसलैश की सुविधा है। अब यदि कोई सुविधा देगा तो वह बदले में फीस, अपना मेहनताना वसूलेगा।

इसी कन्स्पट में अमेरिका में वीसा, मास्टरकार्ड व एमेक्स कंपनियां फली-फूली है। आप बैंक के डेबिट, क्रेडिट कार्ड पर गौर करें, चिप के साथ वीसा, मास्टर कार्ड का लोगो मिलेगा। इसका अर्थ है कि लेन-देन में बैंक इनके प्रोसेस सिस्टम की सेवा लेता है। आम तौर पर लेन-देन की मशीन पर जब भी कार्ड स्वैप करते है तो हर लेन-देन पर वीसा और मास्टर कार्ड कोई 0.11 प्रतिशत हिस्सा बैंकों, कार्ड देने वाली कंपनियों से वसूलती है। इस आनलाइन लेन देन में वीसा-मास्टर कार्ड, बैंक-मर्चेंट बैंक, शॉपर खाते वाले बैंक की तीन कमीशनखोरी बनती है। पेमेंट प्रोसेसर के नाते अकेले मास्टर कार्ड कंपनी वैश्विक पैमाने पर कोई 24 हजार बैंक-वित्तिय संस्थाओं के क्रेडिट-डेबिट कार्ड में सेवा देता है। नंबर एक कंपनी वीसा है। सो इस तथ्य का सभी ध्यान रखे कि जब भी आनलाइन लेन-देन में आप कार्ड मशीन पर स्वैप करेंगे या एटीएम से पैसा निकालते है तो अमेरिका की इन दो कंपनियों को न केवल लाभ है बल्कि आप तक उनकी पहुंच भी है।

तभी नोटबंदी की घोषणा के बाद वैश्विक न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग की खबर थी-नकदी के खिलाफ भारत की जंग के ये दो विजेता निश्चित ही- वीसा और मास्टर कार्ड कंपनियां।

जेनिफिर सुरेन की इस खबर में दर्ज इन बातों पर भी गौर करें- विश्लेषकों के अनुसार वीसा और मास्टरकार्ड नेटवर्क नकदी खत्म कराने के लिए भारत सरकार को पुश कर रहे थे। वीसा कंपनी ने अक्टूबर में यह रिपोर्ट जारी की कि डिजिटल पेमेंट को बढ़वा कर भारत अगले दशक में 70 अरब डालर बचा सकता है। इस पर नीति आयोग के अमिताभ कांत ने कहा हम कई कदम उठा रहे हैं जिससे भारत कैशलेस समाज बने। प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा की तो दक्षिण एशिया के मास्टरकार्ड प्रमुख पौरूषसिंह ने इस कदम का समर्थन किया। मास्टरकार्ड ने भारत सरकार और इंडियन बैंक एसोशिएसन के साथ इलेक्ट्रोनिक पेमेंट की नीतियाँ बनाने की कोशिशों में साझा किया है। मास्टरकार्ड कंपनी के सीईओ भारतीय मूल के अजय बंगा हैं और वे कई दफा नरेंद्र मोदी से मिले हैं। उन्होंने भारत को नकदी से नकदीरहित बनाने के प्रयास भारत-अमेरिका सीईओ फोरम के सदस्य के नाते भी किए। उन्होंने कई मौको पर नरेंद्र मोदी से इस बारे में बात की।

सोचा जा सकता है कि सवा सौ करोड़ लोगों की जेब खाली करा कर, मजबूरी में उन्हे डिजिटल लेन-देन की तरफ धकेलने के पीछे अऱबों-खरबों रु का कैसा बड़ा धंधा बनने वाला है। यदि सवा सौ करोड़ लोगों में से 25 करोड़ लोग भी डिजिटल लेन देन की आदत बनाएं तो अमेरिका की इन कंपनियों को कितना बड़ा फायदा होगा जो प्रति लेन-देन 3 रु वसूलते हैं। हर साल अरबों (या खरबों रु ?) रु का नया धंधा!

साभार- http://www.nayaindia.com/ से

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