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चीन से भी बड़े दुश्मन तो हमारे धूर्त राजनेता हैं

पिछले 45 वर्षों में पहली बार भारत को चीन के साथ झड़प में अपने सैनिकों की शहादत का सामना करना पड़ा है। चीनी सैनिकों ने डंडे, पत्थर और कीलें लगी लाठियों से हमला किया जिसमें हमारे 20 सैनिक शहीद हो गए। इस दौरान हमलावर चीनी सैनिकों के पीछे मशीनगन, तोपें और टैंक भी कतार में खड़े थे। कुछ भारतीय सैनिकों की मौत पिटाई की वजह से हुई तो कुछ सैनिकों को नीचे बह रही गलवान नदी में धकेल दिए जाने की वजह से हो गई। वहीं कुछ सैनिक लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान में भारी ठंड लगने से मर गए। चीन ने बहुत विचित्र ढंग से भारत को गहरा घाव दे दिया है।

हमारी त्वरित प्रतिक्रिया हल्ला मचाकर दोष देने की है। चीनी उत्पादों का बहिष्कार, चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के पुतले जलाना और टेलीविजन चैनलों से लेकर सोशल मीडिया एवं व्हाट्सऐप ग्रुप तक हर जगह चीनी लोगों को नापसंद करने से उपजा रोष नजर आ रहा है। इस पर हंसी आती है क्योंकि यह भाव हालात से उपजे एवं भावनात्मक हैं। आर्थिक एवं सैन्य स्तर पर अधिक ताकतवर होना भारत का जवाब होना चाहिए। सच तो यह है कि भारत एवं चीन दोनों ही 1978 तक गरीब देश माने जाते थे लेकिन चीन ने उसके बाद आर्थिक सुधार लागू कर खुद को बदल लिया जबकि भारत अपने ही मुंह मिट्ठू बनता रहा है। हालांकि भारत को भी समय-समय पर कुछ खुशकिस्मत बदलाव मिले हैं लेकिन हमें उस मुकाम तक पहुंचने में अभी 15-20 साल लग जाएंगे जहां पर चीन अभी खड़ा है और ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान एवं अब वियतनाम पांच साल में पहुंच चुके हैं। चीनी उत्पादों के खिलाफ हमारा गुस्सा असल में गलत दुश्मन पर निकल रहा है। चीन को दोष देकर हम अपने नेताओं को बच निकलने का मौका दे रहे हैं जिन्होंने हमें गरीब, कमजोर एवं बेवकूफ बनाए रखा है। इन कारणों से इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा।

1. चीन के बारे में कोई सुराग न होना: पश्चिमी देशों के चीन-विरोधी टिप्पणीकार कहते हैं कि वह दुनिया पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए 100 वर्षीय रणनीति पर काम कर रहा है। उसकी नजर में पश्चिमी लोकतंत्र एवं नागरिक स्वतंत्रता के लिए कोई सम्मान नहीं है, उसकी साम्राज्यवादी आकांक्षा हैं, और पश्चिम को कमजोर करने के लिए लगातार आर्थिक, तकनीकी एवं सूचनात्मक युद्ध में संलग्न है। पश्चिम की बौद्धिक पूंजी को चुराने और खरीदने के अलावा अपनी मेड इन चाइना 2025 नीति बनाने से इसे जैव-प्रौद्योगिकी, उन्नत चिप डिजाइन, कृत्रिम मेधा, रोबोटिक्स और क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में बढ़त हासिल करने में मदद मिलेगी। पता नहीं, यह सच है या महज साजिश का सिद्धांत लेकिन यह साफ है कि भारतीय राजनयिक एवं हमारे राजनेता चीन के साथ निपटने के मामले में बच्चे ही साबित हुए हैं।

भारत ने चीन की दूरसंचार प्रौद्योगिकी कंपनी हुआवे के बारे में अमेरिकी चेतावनियों को दरकिनार करते हुए उसे 5जी तकनीक के परीक्षणों में शामिल होने की मंजूरी दे दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन में भारतीय अधिकारियों ने वर्ष 2023 तक भारत में 1.4 करोड़ चीनी पर्यटकों के आगमन का ऐसा महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है जिस पर हंसी आती है। इसकी वजह यह है कि वर्ष 2017 में भारत आने वाले चीनी पर्यटकों की तादाद महज 2.4 लाख थी। दोनों देशों ने कूटनीतिक रिश्तों की बहाली के 70 साल पूरे होने पर इस साल कई समारोहों की योजना बनाई हुई है। मोदी और चिनफिंग का साबरमती नदी में नौका विहार, गांधी आश्रम में झूले पर बैठना और दर्जनों बार हुई मुलाकातों में गर्मजोशी से गले मिलना एवं दोस्ताना रुख अब महज भलमनसाहत ही लगता है। ऐसा लगता है कि भारत को चीन के नजरिये एवं तरकीबों के बारे में कोई खबर ही नहीं है।

2. अपनी ही नाक काटना… चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा वर्ष 2019 में करीब 57 अरब डॉलर का था। इस स्थिति को बदल पाने की सामथ्र्य भारत के पास नहीं है। भारतीय उपभोक्ताओं ने चीन से होने वाले सस्ते आयात का जमकर फायदा उठाया है। क्या वे दक्षिण कोरिया या जापान के अपेक्षाकृत महंगे उत्पादों के लिए भुगतान करने को तैयार होंगे? कठोर सच यह है कि भारत आर्थिक रूप से गैर-प्रतिस्पद्र्धी है और चीन का मुकाबला कर पाना बर्दाश्त नहीं कर सकता है। मसलन, भारत करीब 70 फीसदी बल्क दवाएं चीन से मंगाता है। क्या हम ऐंटीबायोटिक दवाओं के बगैर रह सकते हैं? जहां भारत के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी 14 फीसदी है वहीं चीन अपने कुल आयात का एक फीसदी से भी कम भारत से मंगाता है। हम अपने चेहरे को बिगाडऩे के लिए अपनी नाक काट सकते हैं लेकिन इससे चीन को नुकसान नहीं पहुंचेगा। यहां से हम मामले के केंद्रीय बिंदु भारत की आर्थिक कमजोरी की तरफ चलते हैं।

3. भारतीय प्रगति का कोई मॉडल नही: अगर भारत ने आर्थिक सुधारों की राह पकड़ी होती तो इन सब बातों का कोई मतलब नहीं होता। चीन ‘चीनी चरित्र वाले पूंजीवाद’ के विकास में सफल रहा और इसने काम भी किया। यह मॉडल उस पर फिट भी बैठा। हमें अपने लोगों को सरकारी एवं निजी उगाही और किराया-वसूली के चंगुल से आजाद कराने के प्रयास करने चाहिए थे क्योंकि यह हर कदम पर हमारी ऊर्जा सोखते हैं। एक शोषक राज्य की संकल्पना खंडित होने से नवाचार एवं प्रगति को अकल्पनीय रफ्तार एवं आयाम मिला होता। लेकिन ऐसा करने के बजाय लगातार सरकारों ने एक से बढ़कर एक कठोर नियम लागू किए और अवपीड़क राज्य ने उन्हें नजरअंदाज किया। सुधारों के नाम पर महज हल्की-फुल्की मरम्मत होती रही। इनका हमारी आर्थिक प्रतिस्पद्र्धात्मकता पर कोई असर नहीं रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे सार्वजनिक क्षेत्र खासकर बैंकों के साथ किया गया बरताव है।

हम चीन को एक सबक सिखाना चाहते हैं। ऐसा करने के लिए हमें अपनी आर्थिक प्रतिस्पद्र्धात्मकता बढ़ानी है। इस मकसद को हासिल करने के लिए हमें पहले नकारा, भ्रष्ट एवं अपने हितों के लिए ही काम करने वाले नेताओं एवं बाबुओं के खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी। इन लोगों ने ही भारत को कमजोर एवं गरीब बनाए रखा है और हमारी शिक्षा व्यवस्था की खस्ता हालत, स्वास्थ्य देखभाल की चरमराती व्यवस्था, गिरती उत्पादकता और नाममात्र का नवाचार इसकी बानगी हैं। भारत की आर्थिक कमजोरी की भरपाई उग्र-राष्ट्रवादी आख्यानों से करना और चीन को बलि का बकरा बनाना असल में भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की अपनी नाकामी को छिपाने की तरकीबें हैं। हो सकता है कि ऐसा करने से फौरी तौर पर जनता का गुस्सा शांत हो जाए लेकिन आगे चलकर यह हमें ही कमजोर करेगा। हमारा दुश्मन चीन या पाकिस्तान से कहीं अधिक बड़ा है। और वह हमारी सीमा के भीतर ही है, दूसरी तरफ नहीं।

साभार https://hindi.business-standard.com/ से

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