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पद्मा सचदेवः दिल्ली का वो मितवा अब सूना हो गया

मितवा घर की मीत चली गयीं । दिल्ली जैसे शहर में जिस के घर पर कोई नेम प्लेट नहीं बस बाहर एक सुंदर सी तख्ती टंगी रहती थी जिस पर लिखा रहता है मितवा घर। यानि मीतों ,दोस्तों का घर । और ये घर अपने नाम को पूरी तरह सार्थक करता है । इस घर में जो प्रवेश कर गया वो प्रख्यात हिंदी और डोगरी की लेखिका पद्मा सचदेव और सुप्रसिद्ध गायक सिंह बंधुओं में से एक सरदार सुरेंद्र सिंह सचदेव का खास मेहमान खास मीत बन जाता था । अपने ज़माने की दो महान हस्तियां दोनों पद्मश्री से सम्मानित । जिनका रसूख भारत के साहित्य जगत से उतना ही दिल्ली के शक्तिशाली दरबार में प्रधानमंत्री से लेकर पूरी कैबिनेट में उनका रुतबा था ।उनके घर जाकर कभी ऐसा नहीं लगता था हम इतनी बड़ी हस्तियों से मिल रहे हैं । पद्मा सचदेव जी का मुस्कुराता चेहरा सरदार सुरेंद्र सिंह जी की मीठी आवाज़ और सबसे बड़ा उनका आथित्य भाव आपको ऐसी डोर में बांध लेता था जो कभी छूट नहीं पाता था ।

हमारे घर धर्मयुग तब से आता था जब हम छोटे बच्चे थे । डब्बू जी का कोना पढ़ते पढ़ते कब पूरा धर्मयुग पढ़ लेने का चस्का लग गया पता ही नहीं चला । और पद्मा सचदेव नाम तो रट गया था इतने अच्छे इंटरव्यू करती थीं वो । भाषा में ऐसी रवानगी ऐसा सुंदर वर्णन कि आँखों के सामने पूरा चित्र खींच जाए । श्रीमति इंदिरा गांधी का जो उन्होनें एख बड़ा इंटरव्यू किया था उसकी कई बातें मुझे आज भी याद हैं । इंदिरा जी ने पद्मा जी को बताया था —-” कोई हिंदुस्तानी लड़की इतनी अच्छी बहु नहीं हो सकती थी जितनी सोनिया विदेशी होने के बावजूद है । सोनिया मेरे उधड़े हुए कुर्तों पर तुरपाई भी कर देती है । किचन में जा कर खाना बना लेती है “। उनको पढने में जो आंनद आता था उसको शब्दों में कह पाना मुश्किल है । मैं उनकी जबरदस्त फैन बन गयी । बच्चन परिवार डॉक्टर कर्ण सिंह महाराजा कश्मीर की राखी बहन ।

दिल्ली पत्रकारिता में नौकरी करने आयी तो उसी साल दिल्ली में सिखों के खिलाफ भयंकर हिंसा भड़क गयी । कारण था श्रीमति इंदिरा गांधी की सिख युवकों द्वारा हत्या । उन दिनों में माया पत्रिका में काम करती थी मुझसे कहा गया कि मैं सरदार सुरेंद्र सिंह सचदेव और पद्मा सचदेव की राय इस बारे में लेकर आऊं । मुझे लगा कि आज मैं अपनी पसंदीदा लेखिका से मिलूंगी । मन में जाने कैसी कैसी आशंकाएं थीं । इतने बड़े प्रख्यात दंपत्ति पता नहीं सीधे मुंह बात करेंगें या नहीं । उन दिनों पद्मा जी बंगाली मार्किट में पहली मंज़िल पर रहती थीं । जब मैं उनके घर पहुंची तो मेरे कदम ठिठक गए बाहर किसी की नेम प्लेट नहीं थी वहां लिखा था मितवा घर । उन दिनों मोबाइल फोन का ज़माना नहीं था । मैनें अपनी नोटबुक में लिखा पता दोबारा चैक किया पता तो सही है । फिर खैर मैंनें घंटी बजायी दरवाज़ा खुद पद्मा जी ने खोला । मैनें अपना परिचय दिया । उन्होनें एक पल में मुझे अपना बना लिया । आओ आओ अंदर आओ । सर्दियों के दिन थे पहले उन्होनें गर्मा गर्म चाय पिलायी कुछ खिलाया और कहा पहले खा पीलो फिर बात करते हैं । दिल्ली में इतना अपनापन कम ही देखने को मिलता है ।

पहले तो उन्होनें ही मेरा पूरा परिचय लिया सब कुछ पूछा घर परिवार कहां की रहने वाली हो । जब मैनें बताया कि चंड़ीगढ़ से हूं तो वो तुंरत पंजाबी में बात करने लगीं — कुड़िए तू ते मेरी गंवाड़ी होई न लड़की तू तो मेरी पड़ोसी हुई जम्मू चंड़ीगढ़ पडोसी हैं ना । और ये एक मुलाकात फिर पक्का रिश्ता बन गयी । सरदार सुरेंद्र सिंह जी भी उतने ही गर्म जोश क्या मजा़ल की आप उनके घर से बिना खाए पीए आ जाओ । प्यार से अपने साथ टेबल पर बिठा कर खिलाना । यदि कभी खाने को मना किया मैनें तो कहतीं — चल कुड़िए फेर लस्सी ते पी ल ।

धीरे धीरे आत्मीयता बढ़ी तो वे कहा करती — तेरी सस्स नूं लै जण काले चोर । तेरी सास को काले चोर ले जाएं । पंजाब हिमाचल हरियाणा जम्मू कश्मीर में लड़कियों को प्यार से कहा जाता है कुछ लोग तो लड़कियों को खसमां खाणी भी कहते हैं । पद्मा जी को अंहकार कहीं छू कर नहीं गया था । मुझ जैसी नयी नवेली पत्रकार को भी इतना प्यार इतना सम्मान इतना आथित्य दिया उ्न्होनें । हर समय पूरी तैयार हो कर रहा करती थीं । मांग में सिंदूर माथे पर दमकती बिंदी । जीवन से भरपूर प्रेम स्नेह से भरपूर । बाद में उन्होनें बंगाली मार्किट वाला घर बेच दिया और वे लोग चितरंजन पार्क चले गए । फिर वहां जाना थोड़ा कम हो गया था लेकिन उनके साथ रिश्तों की डोर बंधी रही ।

दिल्ली में जहां लोग घर बुलाने के नाम पर पसीना पसीना हो जाते हैं और दस बहाने लगाते हैं कि किसी तरह आप उनके घर न जाओ बस ऐसे में मितवा घर के दरवाज़े हम जैसे साधारण पत्रकारों के लिए हमेशा खुले रहते थे । और खाने पीने के दौर चलते रहते थे । पद्मा सचदेव जी आप दुनिया से ज़रूर चली गयी लेकिन आपकी लेखनी अमर रहेगी । आप हमारे दिल में हमेशा मीठी याद बन कर रहोगी । हमेशा आपका मुस्कुराता चेहरा आंखों के सामने रहेगा । अब कौन कहेगा — तेरी सस्स नूं लै जाण काले चोर । अलविदा ।

पद्मा सचदेव को मिले सम्मान
पद्म श्री पुरस्कार (2001)
साहित्य अकादमी पुरस्कार (1971)
कविता के लिए कबीर सम्मान (2007-08)

पद्मा सचदेव की लेखकीय यात्रा

नौशीन. किताबघर, 1995.
मैं कहती हूँ आखिन देखि (यात्रा वृत्तांत). भारतीय ज्ञानपीठ
भाई को नही धनंजय. भारतीय ज्ञानपीठ
अमराई. राजकमल प्रकाशन
जम्मू जो कभी सहारा था (उपन्यास). भारतीय ज्ञानपीठ
फिर क्या हुआ?, जानेसवेरा और पार्थ सेनगुप्ता के साथ. नेशनल बुक ट्रस्ट
इसके अलावा तवी ते चन्हान, नेहरियाँ गलियाँ, पोता पोता निम्बल, उत्तरबैहनी, तैथियाँ, गोद भरी तथा हिन्दी में एक विशिष्ठ उपन्यास ‘अब न बनेगी देहरी’ आदि

पद्मा सचदेव की एक कविता
सच्चो सच्च बताना साईं
आगे-आगे क्या होना है

खेत को बीजूँ न बीजूँ
पालूँ या न पालूँ रीझें
धनिया-पुदीना बोऊँ या न बोऊँ
अफ़ीम ज़रा-सी खाऊँ या न खाऊँ
बेटियों को ससुराल से बुलाऊँ
कब ठाकुर सीमाएँ पूरे
तुम पर मैं क़ुरबान जाऊँ
आगे-आगे क्या होना है।

दरिया खड़े न हों परमेश्वर
बच्चे कहीं बेकार न बैठें
ये तेरा ये मेरा बच्चा
दोनों आँखों के ये तारे
अपने ही हैं बच्चे सारे
भरे रहें सब जग के द्वारे
भरा हुआ कोना-कोना है
आगे-आगे क्या होना है।

बहे बाज़ार बहे ये गलियाँ
घर-बाहर में महकें कलियाँ
तेरे-मेरे आंगन महकें
बेटे धीया घर में चहकें
बम-गोली-बन्दूक उतारो
इन की आँखों में न मारो
ख़ुशबुओं में राख उड़े न
आगे आगे क्या होना है

जम्मू आँखों में है रहता
यहाँ जाग कर यहीं है सोता
मैं सौदाई गली गली में
मन की तरह घिरी रहती हूँ
क्या कुछ होगा शहर मेरे का
क्या मंशा है क़हर तेरे का
अब न खेलो आँख मिचौली
आगे आगे क्या होना है

दरगाह खुली , खुले हैं मन्दिर
ह्रदय खुले हैं बाहर भीतर
शिवालिक पर पुखराज है बैठा
माथे पर इक ताज है बैठा
सब को आश्रय दिया है इसने
ईर्ष्या कभी न की है इसने
प्यार बीज कर समता बोई
आगे आगे क्या होना है

 

 

 

 

 

 

( लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं व न्यूज़ सन्मार्ग में उपसंपादक हैं)

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