आप यहाँ है :

देश विभाजन और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

देशवासी प्रायः यह सोचते हैं कि देश विभाजन का कार्य जिन्ना ने किया। मगर बहुत कम को ज्ञात हैं कि मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी बनाने में अलीगढ मुस्लिम का हाथ रहा है। इसके संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान ने लिखा था कि-मैं किसी भी रूप में हिंदुस्तान को एक राष्ट्र मानने को तैयार नहीं हूँ।

अपनी इस मान्यता का प्रचार व प्रसार करने के लिए सर सैय्यद अहमद खां ने 1857 में मुहम्मद-एंग्लो-ओरिएण्टल-कॉलेज की स्थापना की जिसने 1920 में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का रूप धारण किया। 1883 में बैंक नमक एक अंग्रेज की नियुक्ति इस कॉलेज के प्रिंसिपल के पद पर हुई। 1899 तक यह व्यक्ति अपने पद पर रहा। इन 16 वर्षों की अवधि में सर सैय्यद इसके पूरी तरह प्रभाव में रहे। परिणाम ये दोनों राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन गये। बैंक ने इंग्लैंड से भारत रवाना होने से पूर्व एक भाषण दिया
जिसमें उसने बोला था कि-

भारत के मुसलमान हिन्दुओं के दवाब में है। वहां के मुसलमान इसका विरोध करते हैं और इसलिए वो इसे चुप रहकर स्वीकार नहीं करेंगे।

1885 में कांग्रेस की स्थापना के 3 वर्ष बाद बैंक की सलाह पर सैय्यद अहमद ने Patriotic Association के नाम से एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य पार्लियामेंट को यह विश्वास दिलाना था कि भारत के मुसलमान स्वराज्य आदि के संघर्ष में हिन्दुओं के साथ नहीं हैं। 1899 में इंग्लैंड की संसद में सर चार्ल्स ब्रैडला ने भारत में अंशत: लोकतंत्रात्मक शासन पद्यति लागू करने के लिए पार्लियामेंट में एक बिल प्रस्तुत किया। बैंक ने इस बिल का विरोध करने के लिए अलीगढ़ कॉलेज के विद्यार्थियों को देश के कौने-कौने में भेजा और मुसलमानों के हस्ताक्षर कराये। कुछ विद्यार्थियों को लेकर वह स्वयं दिल्ली पहुँचा और जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ गया। ज़ुम्मे की नमाज़ से लौटते मुसलमानों से इस ज्ञापन पर यह कहकर हस्ताक्षर करवाये कि यह ज्ञापन मुसलमानों की ओर से सरकार से यह अनुरोध किया गया है कि वह गौहत्या पर रोक लगाकर मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करे। इस प्रकार बिल के विरोध में

20375 मुसलमानों हस्ताक्षर कराके इंग्लैंड भेजें गये।

1895 में बैंक ने इंग्लैंड में एक भाषा दिया था जिसमें उसने कहा था-अंग्रेजों के साथ तो मुसलमानों का मेल हो सकता है, परन्तु अन्य किसी मत वाले के साथ नहीं।

इस प्रकार की भावना के रहते सांप्रदायिक सद्भाव तथा देशभक्ति का ख्याल भी मुसलमानों के भीतर कैसे ठहर सकता था। अहमद खान और बैंक के निधन के बाद उसके उत्तराधिकारी थियोडोर मेरीसन ने बैंक का काम जारी रखा। उसने मुस्लिम छात्रों को यह कहकर भड़काया कि भारत में लोकतंत्र का अर्थ होगा-अल्पसंख्यकों का लकड़हारे, घसियारे और पानी भरने वाले झींवर बन जाना। उसके बाद प्रिंसिपल पद पर आर्चिवाल्ड नामक अंग्रेज आया। उन दिनों बंग विभाजन की धूम थी। यह अंग्रेज शिमला जाकर वाइसराय से मुसलमानों को विशेष प्रतिनिधित्व देने की अपील करता है। उसके द्वारा तैयार किये गए ज्ञापन को लेकर सर आगा खान के नेतृत्व में 1 अक्टूबर 1906 को एक शिष्ट मण्डल वाइसराय से इसके लिए मिला। अंग्रेज पहले से तैयार थे। वाइसराय की पत्नी लेडी मिण्टो को एक अधिकारी ने लिखा कि- इस प्रकार 6 करोड़ मुसलमानों को राष्ट्र मुख्य धारा से काटकर उन्हें हिन्दू और हिंदुस्तान दोनों का विरोधी बना दिया गया। लेडी मिण्टो ने अपनी डायरी में लिखा कि- इस प्रकार के खादपानी से साम्प्रदायिकता का विषवृक्ष फलता-फूलता रहा। बहुत जल्दी इसकी शाखा प्रशाखा दूर तक फैल गयी। 3 महीने बाद 30 दिसंबर

1906 को ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के 3 महीने बाद ही अलीगढ के विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए वकारुल मालिक ने कहा-साम्प्रदायिकता से विषाक्त अलीगढ कॉलेज की नींव पर ही अलीगढ़ यूनिवर्सिटी खड़ी हुई। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की एक-एक ईंट, वहां के पेड़-पौधों की एक-एक पत्ती में इतना विष भरा है कि उसे जड़ मूल से उखाड़े बिना सांप्रदायिक विद्वेष की भावना को दूर नहीं किया जा सकता। इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी बनाने में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का बड़ा हाथ रहा है। अपनी परम्पराओं के अनुरूप यहाँ से शिक्षित दीक्षित मुसलमानों ने 1920-1947 तक जजों कुछ किया उसी के परिणाम स्वरूप 1947 में बंटवारा हुआ।
मार्च 1947 में वायसराय बनकर भारत आये माउंटबेटन आने से पहले भारत के धुर विरोधी चर्चिल से मिला।

ने उससे कहा-मुझे खेद है कि तुमको भारत को स्वतंत्रता देनी पड़ रही है। मैं यह नहीं कहूंगा कि कैसे देनी है। पर यह अवश्य कहूंगा कि किसी भी मुसलमान का बाल भी बांका नहीं होना चाहिये। ये ये वो लोग हैं, जो हमारे मित्र है। और ये वो है जिन्हें हिन्दू अब दबा कर रखेगा। इसलिए आपको ऐसे कदम उठाने चाहिए कि हिन्दू ऐसा न कर सकें।
चर्चिल की सलाह पर भारत का ऐसा विभाजन हुआ कि मुसलमानों को पाकिस्तान के रूप में एक स्वतंत्र देश मिल गया भारत पर उनका पूर्ण अधिकार ज्यों का त्यों बना रह गया। यही हिन्दू मुस्लिम समस्या आज भी ऐसी ही बनी हुई है। आज भी भारत के अधिकांश मुसलमानों के मन में पाकिस्तान के प्रति जो प्यार है। वो भारत के लिये नहीं है। स्वर्गीय बलराज मधोक ने इंदिरा गाँधी को कभी सलाह दी थी कि अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का डीएवी कॉलेज, लाहौर से बदल देना चाहिये ताकि यह विष वृक्ष सदा के लिए उखड़ जाये। पर इंदिरा गाँधी ने तुष्टिकरण के चलते उनकी सलाह पर ध्यान नहीं दिया।

पाठकों को अंत में एक ही बात कहकर लेख को विराम दूंगा- जिस कौम ने अपने इतिहास से नहीं सीखा। उसका वर्तमान ही नहीं भविष्य भी अंधकारमय होने वाला है।

[सन्दर्भ ग्रन्थ-स्वामी विद्यानन्द सरस्वती अभिनन्दन ग्रन्थ, डॉ रघुबीर वेदालंकार (संपादक), श्री सत्य सनातन वेद मंदिर, दिल्ली,1995, पृ. 49-52]

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Back to Top