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संयम, संतोष और समाधान का ‘महावीर’ मार्ग : एक अनुचिंतन

अखिल विश्व को अहिंसा, अनेकांत, अपरिग्रह का सन्देश दे कर जीवन में संयम, संतोष और समाधान का सच्चा मार्ग बताने वाले भगवान महावीर की वाणी का अनंत वैभव मानवता की धरोहर है। वास्तव में, श्रमण संस्कृति में पद की नहीं, गुणों की पूजा की गई है। संस्कृति जो बाहर की दुनिया को अपने वश में रखने ले लिए आतुर नहीं, संस्कृति जिस के सामने एक नगण्य प्राणी भी भयातुर नहीं, संस्कृति जिस में है संयम का वास और आत्म विजय का पूरा विश्वास। यह संस्कृति किसी को बंधन में नहीं रखती। यही कारण है कि भगवान महावीर का दर्शन अहिंसा, अनेकान्त और समता का ही दर्शन नहीं है, वह जीवंत क्रांति का भी दर्शन है।

महावीर स्वामी ने अपने समग्र परिवेश को सक्रिय किया। जन-जन को आत्म बोध, आत्म कल्याण के साथ तीर्थंकर बनने का रहस्य समझाया। तीर्थंकर महावीर लोक यानी दुनिया में उत्तम हैं। लोकोत्तम कौन हो सकता है? लोकोत्तम वही व्यक्ति हो सकता है, जो अहिंसा का पुजारी हो। जैसे श्रीराम परम योद्धा, पुरुष श्रेष्ठ थे। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है, श्रमण महावीर परम अहिंसक थे, इसीलिए शास्त्रों में उन्हें लोकोत्तम कहा।

भगवान महावीर के सन्देश प्रकाश स्तम्भ के समान हैं। ‘मूकमाटी’ के सृजेता आचार्य श्री विद्यासागर जी ने एक स्थल पर प्रबोधन किया है कि हर युग में दो प्रकार के मनुष्य और दो तरह के व्यवहार अवश्य देखे जा सकते हैं। इनमें से एक मनुष्य भोग-राग का मार्ग चुनता है और दूसरा तप-त्याग और आत्मध्यान को धुनता है। दौड़-धूप और आपाधापी के बीच उन में से एक का जीवन शव के समान पड़ा रह जाता है। दूसरे का जीवन शिव के समान खरा बन जाता है।

महावीर स्वामी के सन्देश यदि शव को भी शिव में बदलने की शक्ति रखते हैं तो उसके पीछे अहिंसा की साधना का बल है। अनेकांत की चेतना का संबल है। प्रत्येक मनुष्य को ही नहीं प्राणिमात्र को वह जहां है, जैसा भी है, वहां से अपने कर्मों के दम पर ऊपर उठने और आगे बढ़ने का रास्ता बताने वाले महावीर, वास्तव में संसार को निराशा से उबारकर आशा का अद्भुत आलोक देते हैं। उसे समझना शब्द और वाणी का विषय नहीं,अनुभूति का विषय है। कहा गया है कि जहां न पहुंचे रवि,तहाँ पहुंचे कवि। किन्तु महावीर का मार्ग तो उस से भी आगे जा कर घोषणा करता है कि जहां न पहुंचे कवि, वहां पहुंचे आत्मानुभवी।

महावीर स्वामी ने हिंसा की ज्वाला से जल रही दुनिया को अहिंसा के शीतल जल से कुछ इस प्रकार तृप्त किया कि समूची मानवता को जीने की एक नई कला, एक नई राह मिल गई। उन्होंने बताया कि जो अपने को जीतता है, वही वास्तव में सही जिंदगी जीता है। आज दुनिया भर में प्रबंधन विशेषज्ञ लोगों को सफलता का मन्त्र पढ़ा रहे हैं लेकिन दुनिया की जीत का, जितेन्द्रिय बनने का सबसे बड़ा मन्त्र तो महावीर ने दिया। आधुनिक दृष्टि से भी देखें तो महावीर के सन्देश जीने, जीवन दान करने के साथ-साथ स्वयं को जीतने के महाप्रबंधन का महामार्ग है।

महावीर स्वामी ने दूसरे के दुःख दूर करने की धर्मवृत्ति को अहिंसा धर्म कहा है जिस में समाहित है मानवीय संवेदनाओं की पहचान, जीवन-मूल्यों और आदर्शों की महक और सात्विक वृत्तियों का विकास। इन्द्रियों का निग्रह। आचरण की शुद्धता और विचारों की स्वच्छता। मनोवृत्तियों का नियंत्रण और अंततः सर्वमैत्री का आलोक। इन सभी नैतिक सूत्रों की आधार भूमि है अहिंसा। वही सर्वधर्म समभाव की आधारशिला है, समता, सामाजिक न्याय और मानव प्रेम की प्रेरक शक्ति भी है। सच्ची अहिंसा वह है जहाँ मानव व मानव के बीच ही नहीं जीव और जीव के बीच भी भेदभाव न हो। जहाँ समन्वय का संगीत हो। सारी वृत्तियाँ एक तान, एक लय होकर मानवीय संवेदनाओं के इर्द-गिर्द घूमें। सारे भेद मिटे, अंतर हट जाएँ। जहाँ पहुँचकर हम सुख-दुःख बाँटे,आँसू और मुस्कान की साझेदारी हो। दूरियों का दर्द मिटे। पृथ्वी पर सब की जीवनलता हरित-भरित और उल्लसित हो।

महावीर स्वामी की मूल शिक्षा है अहिंसा। आज ‘अहिंसा परमो धर्म: का प्रयोग समस्त मानव जाति के लिए बहुत बड़ा अवदान है और इसे वैश्विक प्रसिद्धि दिलवायी भगवान स्वामी ने। महावीर ने अपनी वाणी से और अपने स्वयं के जीवन से इसे वह प्रतिष्ठा दिलाई कि उन का नाम अहिंसा से एकाकार हो गया। अहिंसा का सीधा-साधा अर्थ करें तो वह होगा कि व्यावहारिक जीवन में हम किसी को कष्ट नहीं पहुँचाएँ। किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिए दु:ख न दें। ‘आत्मान: प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत् इस भावना के अनुसार दूसरे व्यक्तियों से ऐसा व्यवहार करें जैसा कि हम उनसे अपने लिए अपेक्षा करते हैं।

महावीर का एक महत्वपूर्ण संदेश है ‘क्षमा”। भगवान महावीर ने कहा कि ‘खामेमि सव्वे जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे, मित्ती में सव्व भूएसू, वेर मज्झं न केणई। अर्थात् ‘मैं सभी प्राणियों को क्षमा करता हूं। मुझे सभी क्षमा करें। मेरे लिए सभी प्राणी मित्रवत है। मेरा किसी से भी वैर नहीं है। हम भली भाति समझ सकते हैं कि उनकी देशना यही कह रही है कि –

हार को जीत में बदलने की कला सीखो,
रुदन को गीत में बदलने की कला सीखो।
जीवन की हकीकत को समझना है अगर,
रुदन को गीत में बदलने की कला सीखो।

इस तरह, महावीर बनने की कसौटी है आत्म परिष्कार और ह्रदय का अपार विस्तार। जहां अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत की चर्चा होती है वहां भगवान महावीर का यशस्वी नाम स्वत: सामने आ जाता है। महावीर का संपूर्ण जीवन, तप और ध्यान की पराकाष्ठा है इसलिए वह स्वत: प्रेरणादायी है। उन के उपदेश जीवनस्पर्शी हैं। जिनमें जीवन की समस्याओं का समाधान निहित है।

व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है, यह उद्घोष भी महावीर की चिंतन धारा का प्रतीक है। प्रत्येक व्यक्ति के मानव से महामानव, कंकर से शंकर और नर से नारायण बनने की कहानी ही महावीर का जीवन दर्शन है।

अब तक चौबीस तीर्थंकर हुए हैं। माना जाता है कि उन तीर्थंकरों के शरीर के दक्षिणांग में एक चिन्ह था, जिसे ध्वज भी कहा जाता है। महावीर का ध्वज चिन्ह सिंह है। सुन कर लगता है कि यह कैसी विसंगति है। एक तरफ अहिंसा अवतार महावीर और दूसरी तरफ सिंह, जो हिंसा का प्रतीक है। क्या इसमें भी कोई राज है? हम दूसरे प्रकार से सोचें तो पता चलेगा कि यह बेमेल नहीं, बल्कि बहुत उचित मेल है। सिंह, पौरुष और शौर्य का प्रतीक है। भगवान महावीर की अहिंसा शूरवीरों की अहिंसा है, कायरों की नहीं। पलायनवादी और भीरु व्यक्ति कभी अहिंसक नहीं हो सकता। अहिंसा की आराधना के लिए आवश्यक है -अभय का अभ्यास। सिंह जंगल का राजा होता है, वन्य प्राणियों पर प्रशासन व नियंत्रण करता है। इसी तरह महावीर की अहिंसा का अर्थ है अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण करना।

भगवान महावीर अहिंसा की अत्यंत गहन है । आज विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि वनस्पति सजीव है, पर महावीर ने बहुत पहले ही कह दिया था कि वनस्पति भी सचेतन है, वह भी मनुष्य की भांति सुख-दुख का अनुभव करती है। उसे भी पीड़ा होती है। महावीर ने कहा, पूर्ण अहिंसा व्रतधारी व्यक्ति अकारण सजीव वनस्पति का भी स्पर्श नहीं करता। उसे नुक़सान नहीं पहुँचाता।

आज पर्यावरण संरक्षण और जागरूकता अभियान में महावीर वाणी के नई दिशा मिल सकती है। महावीर के अनुसार परम अहिंसक वह होता है, जो संसार के सब जीवों और प्रकृति के साथ तालमेल स्थापित कर लेता है, जो सब जीवों को अपने समान समझता है। ऐसा आचरण करने वाला ही महावीर की परिभाषा में अहिंसक है। उनकी अहिंसा की परिभाषा में जीव हत्या ही हिंसा नहीं है, किसी के प्रति बुरा सोचना, बुरे भाव रखना भी हिंसा है।

श्रमण महावीर की अहिंसा उनकी समग्र आत्मविभूति थी, चेतना थी। वे अहिंसा ही थे। अहिंसा को उन्होंने अनेक आयामों में देखा आैर अनुभव किया। चलते-फिरते, हिलते-डुलते, बोलते-खाते जीवों या प्राणियों में तो जीवन सब ही देखते हैं, बहुतों ने देखा है, लेकिन महावीर एक ऐसे समता-पुरुष थे, जिन्होंने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति तक पंच महाभूतों में जीवन का, चेतना का, अपनत्व का दर्शन किया और बड़ी उदारता से अपने को उनके समकक्ष रख दिया। वे मन से, वचन से, काया से पूर्ण प्रेममय थे। यही प्रेमबीज वे जन-जन के ह्रदय में बोना चाहते थे। प्रेम की पराकष्ठा का नाम है अहिंसा।

महावीर स्वामी के जीवन की घटनाएं अदभुत हैं, अतिमानवीय लगती हैं । उन्होंने अपने को अनेक बार प्रतिकूल परिस्थितियों में झोंक दिया। इसलिए नहीं कि उन प्रतिकूलताओं पर वे विजय प्राप्त कर लेंगे या किसी को पराजित कर देंगे। यह सब उन्होंने इसलिए किया कि लोग भय और भ्रम से, झूठ और झंझट से मुक्त हों। वे सम्यक दृष्टि और सम्यज्ञानी बनें, सम्यक चारित्र का पालन करें।

जो हमें सताता है, मारता-पीटता है, गाली गलौज करता है, अपमानित करता है, उसमें भी प्रेम है और उस प्रेम का दर्शन मनुष्य को तभी हो सकता है जब वह स्वयं प्रेममय हो। जिसे हम क्रूर से क्रूर और भयंकर से भयंकर जीव कहते हैं, वह भी प्यार का प्यासा है और चिरकाल तक प्यास न बुझने से उसकी आग उल्टी दिशा में प्रहारात्मक बन जाती है। महावीर ने इसे अनुभव किया, ऐसी आग को अनेक बार झेला और तब धरती के कण कण ने इस शुद्ध स्वर्ण को, प्रेम के सागर को, आत्मसात किया। वहीं महावीर की अहिंसा फलीभूत हुई।

महावीर स्वामी की साधना-यात्रा की एक अद्भुत प्रयोग स्थली। कनकखल आश्रम से होकर वे उत्तर-वाचाला की तरफ गतिमान थे। कुछ ही कदम आगे बढ़े थे कि जंगल से परिचित ग्वाल-बालों ने पुकारा, “देवार्य, रूको ! यह रास्ता छोड़ दो, इसमें एक भयानक नाग रहता है। वह दॄष्टिविष है और अपनी विष ज्वाला से उसने असंख्य यात्रियों को भस्म कर डाला है। पेड़ पौधे झुलस गये हैं । इसलिए यह मार्ग छोड़ दें, निरापद मार्ग से जाने की कृपा करें प्रभु !

महावीर तनिक मुस्कुराये। अभय का हाथ ऊपर उठा कर संकेत दिया, “बच्चों घबराओ नहीं।”
और फिर बच्चे क्या जानें कि महावीर तो विष-ज्वाला के लिए अमृत-जल थे।

महावीर धीरे-धीरे जंगल के बीच विषधर की बांबी के निकट पहुंच गये। घूमता हुआ नाग बांबी के पास आया। नाग आश्चर्य से देखता रह गया कि आज यह कौन मनुष्य यहां भटक गया है। उसकी आंखों से बिषमयी ज्वालाएं निकलने लगीं। लेकिन महावीर पर उसका कोई असर नही हुआ। उसकी क्रोधग्नि भड़क उठी। उसका विष – प्रहार बार-बार निष्प्रभ होने लगा। आखिर उत्तेजित होकर उसने महावीर के अंगूठे को डस लिया।

नाग जरा पीछे हटकर यह देखने लगा कि यह अब गिरा,तब गिरा ! लेकिन उसने देखा कि जहॉँ डसा गया है, वहॉँ से दूध जैसी धारा बह रही है। नागराज दूध पीते-पीते बालक की भॉँति इस दृश्य से अभिभूत था, उनकी ओर निहार रहा था। महावीर के रोम-रोम से मानों करुणा, जीव दया और अहिंसा की धारा फूट पड़ी थी। महावीर ने संबोधित किया, “चंडकोशिक, समझो! समझो! अपने क्रोध को शांत करो। अपने में आओ। चंडकोशिक नाग पानी-पानी हो गया। उसे जातिस्मरण हो गया। पूर्व जीवन की घटनाएं उसके सामने नाचने लगीं।अब वह बिषधर नहीं था, वह अमृतपान कर चुका था। महावीर का प्रेम-प्रयोग सफल हुआ। यह विभाव पर स्वभाव की, क्रोध पर शांति की, हिंसा पर अहिंसा की जीत थी।

महावीर स्वामी ने जीवन में तनाव, भेदभाव और दुराग्रह दूर करने के लिए अनेकांत की अचूक दृष्टि दी। वह अनेकांत जिसे दुनिया के महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने अपने सापेक्षता सिद्धांत यानी थियरी ऑफ रिलेटिविटी में सम्मान दिया। अगर हम ध्यान से देखें और समझने का प्रयास करें तो सत्य पाने का मार्ग बहुत कठिन है। सत्यार्थी अगर सत्य पाने के लिए कटिबद्ध है, तो उसे बहुत सा त्याग करना चाहिए। अटूट सावधानी भी जरूरी है । उसके स्वयं का दृष्टिकोण या नजरिया भी उसके सत्य पाने में बाधक हो सकता है। महावीर का अनेकांत सत्य की व्यापक और सर्वांगीण समझ का दूसरा नाम है। यह विभेद और तनाव को दूर करने का माध्यम है।

महावीर ने बताया कि सत्य के खोजी को अपने पूर्वाग्रह या कदाग्रह को तत्क्षण त्याग देना चाहिए। अन्यथा सत्य बाधित होगा। मनुष्य सोचे कि उसका चिंतन,उसकी धारणाओं, उसके आग्रहों से प्रभावित तो नहीं हो रहा ? वह सोचे कि कहीं वह अपने ही नज़रिये के मोहजाल में तो अटक नहीं गया है ? स्वच्छंद और एकांगी चिंतन में तो नहीं बह रहा ? प्रायः ऐसी स्थिति हमें, सत्य तथ्य से भटका देती है। हम पक्षपाती हो जाते हैं जो अंततः वैचारिक पक्षाघात का कारण बनता है।

हम में से प्रत्येक पर किसी न किसी विचारधारा का प्रभाव होता है। तथ्यों की परीक्षा-समीक्षा करते हुए, अनायास ही हमारा पलड़ा सत्य विरूद्ध झुक सकता है। और अक्सर हम सत्य के साथ ‘वैचारिक पक्षपात’ कर बैठते हैं। इस तरह के पक्षपात के प्रति पूर्ण सावधानी जरूरी है। अपनी विचारधारा और अपने मत की परीक्षा और दूसरों के विचार और उनके मत के सम्मान की उदारता भी चाहिए। विवेक के इस बहुकोणीय दर्शन का नाम ही महावीर का अनेकांत है। वह सत्य निष्ठा की ऎसी पहल है जो चीजों को सभी पहलुओं से देखना जानती है।

यह निश्चित है कि कोई एक ‘परम सत्य’ अवश्य है। सत्य के प्रति यही आस्था, सत्य जानने का दृढ मनोबल प्रदान करती है। उसी विश्वास के आधार पर हम अथक परिश्रम पूर्व सत्य मार्ग पर डटे रह सकते हैं । अन्यथा जरा सी प्रतिकूलता, सत्य संशोधन को विराम दे देती है। परीक्षा करें कि हमारे विचार तर्कसंगत-सुसंगत हैं या नहीं। वे न्यायोचित हैं या नहीं। जैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं । दूसरे पहलू पर भी विचार जरूरी है। जल्द निर्णय का प्रलोभन त्याग कर, कम से कम एक बार तो विपरीत दृष्टिकोण से चिंतन करना ही चाहिए। परीक्षक से सदैव तटस्थता की अपेक्षा की जाती है। सत्य सर्वेक्षण में तटस्थ दृष्टि आवश्यक ही है।

वस्तुएँ, कथन, व्यवहार आदि को समझने के लिए, महावीर के अनेकांत जैसा एक गूढ़ किन्तु व्यावहारिक सिद्धांत हमें उपलब्ध है। संसार में अनेक विचारधाराएं प्रचलित हैं । लोग अपनी एकांत दृष्टि से वस्तु को देखते हैं। इससे वे वस्तु के एक अंश को ही व्यक्त करते हैं। प्रत्येक वस्तु को विभिन्न दृष्टियों, विभिन्न अपेक्षाओं से पूर्णरूपेण समझने के लिए अनेकांत दृष्टि चाहिए।अनेकांतवाद के नय, निक्षेप, प्रमाण और स्याद्वाद अंग है। इनके भेद-विज्ञान से सत्य का यथार्थ निरूपण सम्भव है।

महावीर स्वामी कहीं ठहरे नहीं, चलते रहे। उन्होंने सत्य को बाहर से नहीं, भीतर से ग्रहण किया। महावीर व्यक्ति नहीं, सत्य का नाम है। अहिंसा का नाम है। विश्व मैत्री का नाम है। उन्होंने केवल इंसान और इंसान के बीच समानता से आगे बढ़कर हर प्राणी, हर जीव को एक समान माना। ऎसी महान आत्म क्रांति कोई साधारण घटना नहीं है।

आज महावीर को मानने से नहीं, जीने से हालात बदलेंगे। विग्रह, विभ्रम और विषमता से मुक्ति के लिए महावीर स्वामी द्वारा बताई गई हर युक्ति हमें बार-बार पुकार कर यही कह रही है कि –

सवाल जलने का नहीं, प्रकाश का है,
सवाल कहने का नहीं, विश्वास का है।
काँटों से भरे बीहड़ पथ पर,
सवाल चलने का नहीं, विकास का है।

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संपर्क डॉ. चन्द्रकुमार जैन

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राजनांदगांव. मो. 9301054300



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