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मूल्यों की दिव्यता के शिखर : महात्मा गांधी

 

गगन मुस्कराता, धरा गीत गाती,
पवन गुनगुनाती बही जा रही है।
हमारी कहानी ख़तम हो चुकी है,
तुम्हारी कहानी कही जा रही है।।

जीवन के खुदरा अनुभवों से मुठभेड़ करता हुआ, औसत काठियावाड़ी दीखता एक मनुष्य संयोगवश डेढ़ सौ बरस पहले जन्म लेकर धीरे-धीरे खुद को तराशता अक्षत महामानव में तब्दील हो रहा था। अलग-अलग कसैले अनुभव ज़िंदगी में ऊंची पायदान पर चढ़ने की स्थितियां मुहैया करवा रहे थे। ये मनुष्य कोई और नहीं, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे। अपने अनुभवों से लगातार सीखते गाँधी, जिन्होंने अंततः कह दिया – “हमारा जीवन, विद्यार्थी का जीवन होना चाहिए।”

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने ठीक ही कहा है कि प्रभावित होना और प्रभावित करना जीवंतता का लक्षण है। अपने चिंतन, वाणी तथा आचरण से असंख्य लोगों के मानस को झकझोर देने वाले गांधी स्वयं इस जीवंतता के प्रतिमान बन गए। गांधी पर भारतीय प्रभाव पर विचार करते समय रामायण और गीता का उल्लेख सहज रूप से किया जा सकता है। वास्तव में गांधी के जीवन-संघर्ष में इस ग्रंथों की प्रेरणा का अविस्मरणीय स्थान है। इनसे उन्होंने अपनी संत-प्रवृत्ति और सार्वजनिक व्यक्तित्व के मध्य संतुलन बनाये रखने के सूत्र ग्रहण किये।

गांधी ने कहा है कि यदि अहिंसा और प्रेम हमारा आजीवन-धर्म नहीं होता तो इस मर्त्यलोक में हमारा जीवन कठिन हो जाता। अहिंसा की अग्नि परीक्षा तो तब होती है जब हिंसा के लिए भयंकर से भयंकर उत्तेजना होते हुए भी मनुष्य मन, वाणी और कर्म से अहिंसक बना रहे। अहिंसा से मनुष्य और पशु का भेद स्पष्ट हो जाता है। ज़ाहिर है कि बापू के लिए अहिंसा स्वयं जीवन है, वह मनुष्य का स्वभाव है। उसमें मानवता का भविष्य है।

लेकिन, एक तरफ तो हमारी जबान महात्मा गांधी और अहिंसा की आरती उतारे और दूसरी तरफ बन्दूकें और तलवारें जनता के ऊपर चलती रहें। भीड़ की हिंसा जारी रहे। आवाज़े कुचली जाएँ। ऑनर किलिंग एक तरह के फैशन में तब्दील हो जाए। अपनी बात कहने की आज़ादी कहने मात्र कहने की आज़ादी बन कर रह जाये। सच को छुपाया जाए और झूठ को सच बनाकर परोसा जाए। कथनी और करनी में एकता एक स्वप्न मात्र बनकर रह जाए, जीवन में खरापन खो जाए और दोहरापन आबाद नज़र आए, सीधी कमर और सीधी कलम की बात सोचना भी बेमानी हो जाए , असामनता, असहिष्णुता और भेदभाव ही एकमात्र अभेद्य साधना बन जाए तो तय मानिए कि बापू की अहिंसा की सही समझ और उस पर अमल की ज़रुरत आज पहले भी ज्यादा है।

याद रखना होगा कि नये हिन्दुस्तान की बुनियाद में निर्बल की नहीं बलवान की अहिंसा की जरूरत की वकालत गांधी ने की। गांधी असल में महान बनने के बदले भारत के हर खेत में इंसानियत की फसल उगाने के फेर में थे। उन्होंने अपने चरणों का उपयोग दूसरों के सिर पर रखने के बदले सड़कें और पगडंडियाँ नापने में किया। यह पहली बार हुआ जब आराध्य अपने भक्तों के मुकाबले दिखाऊ नहीं बना।

अहिंसा के आराधक गांधीजी प्रखर, प्रभावशाली या निर्णायक दिखने तक से परहेज करते थे। विनम्रता उनका नैसर्गिक गुण थी। नैसर्गिक जन्मजात के अर्थ में नहीं, उनकी व्यापक रणनीति की केन्द्रीय संवेदना के अर्थ में। उन्हें भीरुता, कायरता तथा हीन आत्मसमर्पण से बेसाख्ता नफरत थी। अहिंसक वीरता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण था। वे अहिंसा के प्रचारक मात्र नहीं थे। वह उनके लिए सत्य का दूसरा पहलू थी, जिसे जुदा करना मुमकिन नहीं था। गांधीजी ने वस्तुत: अहिंसा को महसूस करने वाले तत्व के बदले लोक हथियार के रूप में तब्दील किया था। उन्होंने व्यक्तिगत अहिंसा के साथ-साथ समूहगत अहिंसा यानी सत्याग्रह के प्रदर्शन का पुख्ता उदाहरण भी पेश किया है। यही वह बीजगणित है जो गांधीजी को आज तक हमारे सामाजिक व्यवहार का ओसजन बनाये हुए है।

महात्मा गांधी के पूरेे दर्शन में दो बातें महत्वपूर्ण हैं – सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसा में पूर्ण विश्वास। सत्य और अहिंसा के साथ-साथ निर्भयता को वह बहुत ही आवश्यक मानते थे। गोरखपुर जिले की चौरी चौरा की हिंसक घटनाओं के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था। इस फैसले का विरोध हर स्तर पर हुआ लेकिन गांधी जी किसी भी कीमत पर अपने आंदोलन को हिंसक नहीं होने देना चाहते थे। उनका कहना था कि अनुचित साधन का इस्तेमाल करके जो कुछ भी हासिल होगा, वह सही नहीं है।

महात्मा गांधी के दर्शन में साधन की पवित्रता को बहुत महत्व दिया गया है और यह हिंद स्वराज का प्रमुख भाव है। लिखते हैं कि अगर कोई यह कहता है कि साध्य और साधन के बीच में कोई संबंध नहीं है तो यह बहुत बड़ी भूल है। यह तो धतूरे का पौधा लगाकर मोगरे के फूल की इच्छा करने जैसा हुआ। हिंद स्वराज में लिखा है कि साधन बीज है और साध्य पेड़ है इसलिए जितना संबंध बीज और पेड़ के बीच में है, उतना ही साधन और साध्य के बीच में है। हिंद स्वराज में गांधी जी ने साधन की पवित्रता को बहुत ही विस्तार से समझाया है। उनका हर काम जीवन भर इसी बुनियादी सोच पर चलता रहा है और बिना खड्ग, बिना ढाल भारत की आजादी को सुनिश्चित करने में सफल रहे।

महात्मा गांधी अहिंसा और शांति के अजेय योद्धा का नाम है। उनकी कुछ सूक्तियाँ अमर हो गयी हैं। जैसे – अहिंसा सबसे बड़ा कर्तव्‍य है। यदि हम इसका पूरा पालन नहीं कर सकते हैं तो हमें इसकी भावना को अवश्‍य समझना चाहिए और जहां तक संभव हो हिंसा से दूर रहकर मानवता का पालन करना चाहिए। गांधी जी ने समझाया – जैसे हमारे मस्तिष्क में युद्ध का वातावरण निर्मित होता है वैसे ही शांति भी हमारे मस्तिष्क से ही आरम्भ होती है। इस प्रकार शांति की संस्कृति का उद्भव और विकास मनुष्य के मन से ही होता है। इसलिए बन्दूक से नहीं, बदलाव से मानवता की प्रतिष्ठा होती है।

दरअसल शांति की संस्कृति का विकास शांति की ईमानदार चाह पर निर्भर है। गांधी शाश्वत विश्व शांति के प्रवक्ता थे। कथनी और करनी की एकता के कारण शांति को लेकर भी उनका आशावाद अप्रतिम था। वे अहिंसा की अनंत स्थापना के प्रति पूर्णतः आश्वस्त रहते थे। वे लोगों के दिमाग में शांति चाहते थे। मानसिकता में शांति को नेमत मानते थे। गांधी जानते और मानते थे कि शांति की संस्कृति ही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का सौन्दर्य है। शांति ही अंतिम लक्ष्य और शांति ही शरण्य हैं।

गांधी जी ने कहा “मैं शांति पुरूष हूं, लेकिन मैं किसी चीज की कीमत पर शांति नहीं चाहता। मैं ऐसी शांति चाहता हूं, जो आपको कब्र में नहीं तलाशनी पड़े।” उनके जीवन से स्पष्ट है कि उन्होंने अहिंसा और शांति नाम पर कोई समझौता नहीं किया। उनका शांतिवाद किसी के व्यक्तिगत जीवन में अहिंसा के प्रति वचनबद्धता है जिसमें सहिष्णुता, धैर्य, दया, क्षमा और प्रेम आदि मूल्यों का अक्षय स्रोत है।

हिंसा और मानव निर्मित घृणा से ग्रस्‍त दुनिया में महात्‍मा गांधी आज भी सार्वभौमिक सदभावना और शांति के नायक के रूप में अडिग खड़े हैं और भी दिलचस्‍प बात यह है कि गांधी जी अपने जीवनकाल के दौरान शांति के अगुवा बनकर उभरे तथा आज भी विवादों को हल करने के लिए अपनी अहिंसा की विचार-धारा से वे मानवता को आश्‍चर्य में डालते हैं। बहुत हद तक यह महज एक अनोखी घटना ही नहीं है कि राष्‍ट्र ब्रिटिश आधिपत्‍य के दौर में कंपनी शासन के विरूद्ध अहिंसात्‍मक प्रतिरोध के पथ पर आगे बढ़ा और उसके साथ ही गांधी जी जैसे नेता के नेतृत्‍व में अहिंसा को एक सैद्धांतिक हथियार के रूप में अपनाया। यह बहुत आश्‍चर्यजनक है कि उनकी विचारधारा की सफलता का जादू आज भी जारी है। गांधी के ‘सत्याग्रह’ का आधार भी शांति और सविनय अवज्ञा ही था।

गांधीजी ने भगवद्गीता से दो पाठ सीखे – निःस्वार्थ कर्म और भौतिक लाभों के प्रति उदासीनता। विरोधियों को क्षमा करना शांति स्थापना का अचूक उपाय है। गांधी सक्रिय अहिंसक संवाद के माध्यम से शांति को साधने वाले अनोखे साधक हैं। उनकी शिक्षाएँ आज भी विभिन्‍न वैश्विक विवादों को हल करने या समाप्‍त करने के मार्ग और माध्‍यम सुझाती हैं।

गांधीजी ने शांतिवादियों को बताया कि उन्हें यह तय करना है कि युद्ध में कौन सा पक्ष न्यायपूर्ण है। वैसे उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा – ” मैं किसी भी तरह के युद्ध के पक्ष में विश्वास नहीं करता। “अहिंसा गांधीजी के जीवन और दर्शन का सार है। जैन परंपरा में अहिंसा धर्म की नींव है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव मोहनदास पर बचपन में पड़ा। कहा जा सकता है कि अहिंसा ने गांघी की गुप्त संभावनाओं का सृजन कर दिया था। उन्होंने सविनय अवज्ञा, स्वदेशी और स्वराज के लिए संघर्ष विचार और व्यवहार के स्तर पर अहिंसा के दम पर ही किया।

स्मरणीय है कि अहिंसा जैन धर्म का परम उद्घोष है। इस सन्देश के आलोक में गांधी जी ने गहरायी से माना कि अहिंसा सावधानी और विवेक का दूसरा नाम है। वह मानव मुक्ति तथा सर्वकल्याण का राजमार्ग भी है। गांधी जी ने अहिंसा को आत्मसात कर लिया था। उन्होंने भलीभांति समझ लिया था कि विरोधी के दृष्टिकोण को समझने की सच्ची उत्सुकता ही अहिंसा का क-ख-ग है। यही विचार उनके सत्याग्रह का आधार बना। उनकी अहिंसा साधना का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि आज उनके जन्म की सार्द्ध शती पूरी होने पर भी पूरी दुनिया उनके जन्म दिन को अहिंसा दिवस के रूप में मना रही है।

साबरमती आश्रम में ग्यारह व्रतों का पालन अनिवार्य होता था, उनमें से पहले पांच में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का स्थान, वास्तव में जैन धर्म के पंचाचार का प्रभाव था। अहिंसा बापू का साधन नहीं साध्य थी। अत्यंत विकट चुनौती और घोर घमासान के क्षणों में भी उन्होंने अहिंसा का दामन नहीं छोड़ा। कोई समझौता उन्हें स्वीकार नहीं था। अहिंसा का पालन न होने पर उन्होंने कई बार आंदोलन वापस भी लिए।

गांधी जी की अहिंसा के कुछ लक्षण इस प्रकार गिनाये जा सकते हैं – अहिंसा का पथ पीड़ादायक और कठिन है। यह कमजोर व्यक्तियों का औजार नहीं है। अहिंसा आत्मा की शक्ति और आत्मा का मूल स्वभाव है। परन्तु, भौतिक जीवन में चरमोत्कर्ष तक इसका पालन संभव नहीं है। अहिंसा सभी जीवों की साख और मान है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि हिंसक प्राणियों के प्रति भी अहिंसा का भाव रखना चाहिए। गांधी ने लिखा है – “अहिंसा आत्मा के लिए आहार है जो उसे लगातार प्राप्त होते रहना चाहिए। इस सन्दर्भ में संतुष्टि का कोई स्थान नहीं है ” ( हरिजन, 2 अप्रैल 1938 )

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने व्यवहार के धरातल पर उतरकर मनुष्य की सोयी हुई चेतना के साथ-साथ आज़ादी की अलख जगाई। महात्मा गांधी ने अपने जीवन के समस्त अनुभवों का प्रयोग मानवता के एक सूत्र में बाँधने और जीव मात्र के कल्याण में किया। उनका कहना था कि भारत की हर चीज़ मुझे आकर्षित करती है। सर्वोच्च आकांक्षाएँ रखने वाले किसी भी व्यक्ति को अपने विकास के लिये जो कुछ चाहिये, वह सब उसे भारत में मिल सकता है। भारत अपने आप में कर्मभूमि है, भोग भूमि नहीं।

महात्मा गांधी ने गाय को करुणा का काव्य है। गौमाता की महत्ता को, जन्म देने वाली माता से भी बड़ा माना। परन्तु यह भी कहा कि ‘गौरक्षा का अर्थ केवल गाय की रक्षा ही नहीं बल्कि उन सभी जीवों की रक्षा है जो असहाय और दुर्बल हैं।’ महात्मा गाँधी की दृष्टि में प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए जीवों के प्रति दया का भाव रखना जरूरी है। यहाँ उनकी अहिंसा चराचर जगत से जुड़ जाती है।

यह कैसी विडंबना है कि प्रकृति में रहने वाले जिन प्राणियों की सहायता हम जीवन निर्वहन में लेते हैं, उन्हें ही सताते भी हैं। महात्मा गांधी ने पशुपालन को आधारभूत शिक्षा का अंग बताया था। उनके शब्दों में ‘अहिंसा प्राणिमात्र के प्रति दया है।’ महात्मा गाँधी को समझने की कोई भी ईमानदार कोशिश तभी सफल हो सकती है जब आप मनुष्य और समाज के सभी आयामों के साथ-साथ जीवजगत के साथ भी सही सरोकार स्थापित कर सकें। हमारे समय की गहन पुकार है कि हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों को जीव दया के सन्दर्भ में गहराई से समझने का प्रयास करें।

गाँधी की अहिंसा वर्तमान समय के सभी आयामों को जोड़ते हुए जैसे, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक जीवन शैली को प्राकृतिक जैविकता के आधार पर संरक्षित करने की बात करती है। जहाँ एक ओर अंतरराष्ट्रीयता पर बल प्रदान करती है तो वहीं मानवता की दिशा में बढ़ती हुई दिखती है। गाँधी अहिंसा की बात करते हुए यह कहते हैं कि हिंसा, प्रतिहिंसा को जन्म देती है और अहिंसा प्रेम, दया और करुणा को जन्म देती है। इसे हम इस रूप में समझ सकते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध ने ही द्वितीय विश्वयुद्ध को जन्म दिया। जहाँ एक और द्वितीय विश्वयुद्ध का नेतृत्व कर रहे दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर ने हिंसा के सहारे दुनिया को बदलना चाहा वहीं दूसरी ओर अहिंसा के माध्यम से दुनिया को नष्ट होने से बचाने की बात गाँधी कर रहे थे। भारतीय दर्शन में अहिंसा का विचार पूर्व से विद्यमान था, जिसे गाँधी ने नया आयाम दिया।

इसलिए हम कभी ना भूलें –

गांधी हैं युग-युग की भाषा
गांधी हैं युग-युग के पानी।
सदियों में जो बन पाती है
गांधी ऎसी अमर कहानी।।

राजनांदगांव
छत्तीसगढ़
मो. 9301054300

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