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दो कौड़ी के नेताओं को जनता ही सबक सिखा सकती है

सुधीर चौधरी
एडिटर-इन-चीफ (जी न्यूज/जी बिजनेस/WION)

इस बार के लोकसभा चुनाव का प्रचार, आज़ाद भारत के निम्नतम स्तर पर है। नेता विवादित बयान तो हमेशा से देते थे, लेकिन इस बार नैतिक मर्यादाओं को भी तोड़ रहे हैं। पूरे हफ़्ते रामपुर से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आज़म ख़ान का बयान मीडिया में छाया रहा। अपनी प्रतिद्वंद्वी बीजेपी की उम्मीदवार जयाप्रदा के लिए उन्होंने ऐसी अभद्र टिप्पणी की, जिसे आप अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए कभी नहीं सुनना चाहेंगे। लेकिन आज़म ख़ान को अपनी टिप्पणी पर कोई पछतावा नहीं। माफ़ी माँगना तो दूर, उन्होंने खेद तक नहीं जताया। इसी बयान के साथ उनका एक और बयान भी आया जिसमें वो कह रहे थे कि अल्लाह ने चाहा तो सरकारी अफ़सरों से जूते साफ करवाएँगे। हैरानी की बात ये है कि इन दोनों बयानों के समय सामने खड़ी जनता तालियाँ बजाकर आज़म ख़ान का जोश बढ़ा रही थी।

सबसे दुखद ये है कि जिस भाषा को लोग अपने लिए या अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए कभी स्वीकार नहीं करेंगे, वही भाषा जब दूसरों के लिए प्रयोग की जाती है तो उस पर तालियाँ बजती हैं। चुनाव आयोग ने तीन दिन का प्रतिबंध लगाकर कार्रवाई करने की रस्म निभा दी। आज़म ख़ान ने बदज़ुबानी की तो मायावती ने वोटों की ख़ातिर, धर्म का डर दिखाया और मुसलमानों से कहा कि अगर उनका वोट बँटा, तो बीजेपी आ जाएगी। मायावती को भी चुनाव आयोग ने दो दिन के लिए चुनाव प्रचार से बाहर कर दिया। लगभग यही काम मेनका गांधी ने किया और कह दिया कि अगर मुसलमानों ने वोट नहीं दिया, तो बाद में अपने काम लेकर भी ना आएं। मेनका गांधी के लिए नौकरी दिलवाना भी एक सौदा है, मुसलमान अगर उन्हें वोट देंगे तभी वो उन्हें नौकरी दिलवाएंगी। यहां भी चुनाव आयोग की वही कार्रवाई यानी दो दिन का प्रतिबंध।

अब ज़रा नवजोत सिद्धू की भाषा पर ग़ौर कीजिए। उन्होंने बिहार के कटिहार में मुसलमानों से अपील की कि अगर वो एक साथ नहीं मिले तो फिर से मोदी की सरकार बन जाएगी। अगले ही दिन सिद्धू ने प्रधानमंत्री मोदी को तू कहकर संबोधित किया और उन्हें चोर कहा। उधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि बीजेपी ने चुनाव में फायदा उठाने के लिए रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया। ये अलग बात है कि उन्हें रामनाथ कोविंद का पूरा नाम भी याद नहीं आ रहा था। ये सारे उदाहरण आपको इसलिए दिए ताकि आप समझ सकें, कि हमारे देश में अमर्यादित भाषा के कौन से ज़हरीले बाण वोट बैंक को भेदते हैं। स्त्रियों पर कसी जाने वाली कौन सी फब्तियों पर तालियाँ बजती हैं। और कैसे वोट पाने के लिए मुसलमानों को अगर उत्तेजित किया जाए, या डरा दिया जाए तो उसमें भी कोई बुराई नहीं है।

इन सारे बयानों की चारों तरफ घोर निंदा हुई है। यानी मीडिया में, चुनाव आयोग में अदालतों में। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग को उसकी शक्तियों का अहसास दिलाना पड़ा। अब सवाल ये है कि इन छोटे-छोटे दो या तीन दिवसीय प्रतिबंधों से क्या ये नेता सुधर जाएंगे? और ये नेता चुनाव आयोग से और अदालत से डरते क्यों नहीं। इसमें पहला कारण तो ये है कि चुनाव प्रचार पर जो प्रतिबंध लगते भी हैं वो आधे अधूरे और सांकेतिक होते हैं। इसे असरदार बनाने के लिए, ये प्रतिबंध ना सिर्फ उनके चुनाव प्रचार पर लगना चाहिए, बल्कि मीडिया को भी ये हिदायत देनी चाहिए कि वो इस दौरान ऐसे नेताओं को पूरी तरह से ब्लैक आउट करे। क्योंकि इन नेताओं को सारी शक्ति अख़बार और न्यूज़ चैनलों की हेडलाइन से ही तो मिलती है।

दूसरा सुझाव ये है कि अमर्यादित नेताओं की पार्टियों पर भी, कार्रवाई होनी चाहिए। अभी के समय में पार्टियाँ ये कहकर बच जाती हैं कि ये इन नेताओं की निजी राय थी। जब इन नेताओं की वजह से इनकी पार्टियों के चुनाव प्रचार भी बंद हो जाएंगे, तभी पार्टियाँ इन्हें क़ाबू में रखेंगी और इनकी ज़ुबान से निकले एक-एक शब्द का ऑडिट करेंगी। चुनाव आयोग को ऐसे नेताओं के प्रति Zero Tolerance की नीति अपनानी चाहिए। जब तक ऐसे दो-चार नेताओं के चुनाव रद्द नहीं होंगे, तब तक इनकी बदज़ुबानी बुलेट ट्रेन की गति से चलती रहेगी। लेकिन चुनाव आयोग की समस्या ये है कि हमारे देश की सरकारों ने उसे कभी इतनी शक्तियाँ दी ही नहीं कि वो बदज़ुबान नेताओं का कुछ बिगाड़ पाए। आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर उसके पास कुछ ज़्यादा करने का क़ानूनी अधिकार नहीं है।

चुनाव आयोग ने अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वो 1998 से केंद्र सरकार को सुधारों के लिये प्रस्ताव भेज रहा है। वर्ष 2004 में आयोग ने चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिये 22 प्रस्ताव भेजे थे। UPA-2 के कार्यकाल में चुनाव आयोग ने दो बार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी थी, लेकिन उस पर कोई काम नहीं हुआ। चुनाव आयोग ने वर्ष 2016 में 47 प्रस्ताव सरकार के पास भेजे थे। यानी चुनाव आयोग भी अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए चिठ्ठियां लिख-लिखकर थक गया।

अब एक आख़िरी सवाल आप सब से। ऐसा क्यों होता है कि कोई नेता, जितनी बदज़ुबानी करता है, मर्यादा की जितनी सीमाएँ तोड़ता है और भाषाई स्तर पर जितना ज़्यादा गिरता है, उतना ही बड़ा स्टार प्रचारक बनता है? नवजोत सिद्धू और आज़म ख़ान जैसे लोग, बड़े स्टार प्रचारकों में गिने जाते हैं। सिद्धू तो ये दावा करते हैं कि इस बार कांग्रेस के चुनाव प्रचार में सबसे ज़्यादा डिमांड उन्हीं की है। स्टार प्रचारक वही लोग बन पाते हैं जो अपनी सभाओं में ज़्यादा से ज़्यादा भीड़ को खींच पाएँ और अपनी पार्टी को मीडिया में बड़ी बड़ी हेडलाइन दिलवा पाएँ। इससे वोट भले ही ना मिलें, लेकिन भीड़ की पूरी गारंटी है। एक माहौल सा बना देते हैं ये लोग। और पार्टियाँ इन्हें लाती भी इसीलिए हैं। इसके लिए एक हद तक हमारे देश के लोग भी ज़िम्मेदार हैं, वो भीड़ भी ज़िम्मेदार है, जो सस्ते मनोरंजन के लिए इनकी सभाओं में खिंची चली आती है, जो गाली पर ताली ठोंकती है। इसीलिए तो सिद्धू बात बात पर बोलते हैं कि ठोको ताली और जनता ताली ठोक देती है।

अपनी तालियों को ऐसे बर्बाद मत कीजिए, अपनी तालियों को इतना सस्ता मत बनाइये। लोकतंत्र में तालियाँ बहुत क़ीमती होती हैं। अपने आपको संस्कारी समाज बताने वाले इस देश के लोग, इतनी अमर्यादित भाषा कैसे बर्बाद कर सकते हैं? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है.. तो क्या सबसे गंदा लोकतंत्र भी है? पिछले सत्तर साल में हर चुनाव के साथ चुनाव प्रचार के स्तर में भी गिरावट आती चली गई। आज स्थिति ऐसी है कि हमारे चुनाव प्रचार का स्तर गली मोहल्लों के गुंडों जैसा हो गया है। जिसमें वो कहते हैं वोट दे दो नहीं तो…. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अगर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की पगड़ी भी छोटी-छोटी सभाओं में उछलने लगेगी तो बाकी की दुनिया आप पर तरस ही खा सकती है।

इस दौरान हमने सरकारों को देख लिया, चुनाव आयोगों को देख लिया, अदालतों को देख लिया इन नेताओं का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया। अब आख़िरी उम्मीद इस देश की जनता से है। अपने सोए हुए संस्कारों को जगाइये। इस देश को अपना परिवार मानिए और अनैतिक और अमर्यादित नेताओं को असुर समझिए। सबसे पहले इन नेताओं की भीड़ में शामिल होना बंद कीजिए, इनकी गाली पर ताली बजाना बंद कीजिए और फिर अपने वोट के ज़रिये इनके ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक कीजिए। जिस दिन ऐसे नेताओं को आपकी तरफ से कड़ा जवाब मिलने लगेगा, उसी दिन से इनकी भाषा भी संस्कारी हो जाएगी। इस चुनाव में अभी 6 चरण बाकी हैं। इस फ़ॉर्मूले को आज ही ट्राई करें।

साभार- https://www.samachar4media.com से

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