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95 वर्षों से निरंतर देश की सेवा करने वाले संगठन के लोग हत्यारों के आसान शिकार

इस विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 95 वर्ष पूर्ण हो गए। इन वर्षों में भारत व दुनिया ने कई ऐतिहासिक घटनाएँ देखीं तथा भारत को स्वतंत्रता भी मिली। वहीं इस तथाकथित आधी स्वतंत्रता की कीमत विभाजन का दर्द भी आज तक कितने ही राष्ट्रवादी भारतीयों को पीड़ा देता रहा है।

आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसका मूल मंत्र, मूल उद्देश्य, इस देश से जुड़ा है। जिसका ध्येय मंत्र “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” यानी “हे प्यार करने वाली मातृभूमि! मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ।” 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन आरएसएस की स्थापना डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उसके बाद से संघ “चरैवेति चरैवेति” सिद्धांत को ईमानदारी से चरितार्थ करता हुआ, मानवता की सतत सेवा कर रहा है।

अपने स्थापना दिवस से लेकर आज तक संघ अपने सेवा कार्यों से राष्ट्र को कितनी ही आपदाओं से बचा चुका है। भारत के गाँव-गाँव व नगरों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा सांस्कृतिक-सामाजिक उत्थान व प्राकृतिक संरक्षण से संबंधित कार्य नियमित शाखाओं व स्वयंसेवकों के माध्यम से होते हैं।

राष्ट्रीय भाव को जाग्रत करना तथा आम भारतीयों में राष्ट्र प्रेम के प्रति अलख जगाने का काम भी संघ पिछले 95 वर्षों से सफलतापूर्वक करता आया है। वहीं संघ की कार्यक्षमता व समाज में इसकी स्वीकार्यता इस आँकड़े से ही आसानी से लगाई जा सकती हैं कि वर्तमान में विश्व के 40 देशों में संघ की शाखाएँ हैं। वहीं भारत में ही संघ की करीब 57,000 शाखाएँ नियमित कार्यरत है। पिछले एक वर्ष में करीब 6,000 नई शाखाएँ खुली हैं। ऐसी कितनी ही विशेषता व अनगिनत उपलब्धियाँ संघ के खाते में है।

यहाँ इन बातों को बताने के पीछे संघ का गुणगान करने का उद्देश्य बिल्कुल नहीं है। ये सब बातें तो भारत के अधिकांश लोगों को पता हैं और कितनी ही बार राष्ट्रीय मीडिया में आ चुकी हैं। इस विषय में हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी भी संघ के मुख्यालय नागपुर से संघ के कार्यों की प्रशंसा कर चुके हैं।

मेरा इस लेख के माध्यम से वर्तमान केंद्र सरकार व तथाकथित बुद्धिजीवियों से यह प्रश्न है कि आखिर कब तक संघ के कार्यकर्ताओं की केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड जैसे राज्यों में हत्याएँ होती रहेंगी? कितनी शर्म व चिंता का विषय है कि लगातार कुछ सालों से संघ के कार्यकर्ताओं की कई राज्यों में हत्याएँ हो रहीं हैं।

इन हत्याओं में किसका हाथ है? किन कारणों से ये जघन्य अपराध, दुनिया के सबसे सुसंगठित व शांतिप्रिय संगठन के खिलाफ क्यों हो रहें हैं? कहीं इनके पीछे कोई राजनीतिक षड्यंत्र तो नहीं? किन्हीं राष्ट्र विरोधी ताकतों का तो हाथ नहीं? इन सब प्रश्नों का समाधान एक स्वतंत्र न्यायिक जांच ऐजेंसी से जनता के सामने आना चाहिए।

स्वयंसेवकों की हत्याओं के आंकड़ों की ही बात करें तो केरल राज्य में ही सन् 2000 से 2016 तक संघ व भाजपा के 160 कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हो चुकी हैं। वहीं बंगाल में पिछले एक दशक से संघ के कार्यकर्ताओं की हत्याओं की खबरें लगातार राष्ट्रीय समाचार पत्रों में आती रहीं हैं।

बंगाल में पिछले साल संघ के एक कार्यकर्ता के परिवार के तीन सदस्यों की हत्या कर दी गई, जिसमें एक गर्भवती महिला व एक बच्चा को भी निर्दयता से मार दिया गया। सन् 2017 में 52 संघ के लोगों की बेहरमी से हत्या की गई। 2019 में भी भारत के गृहमंत्री ने भारत की संसद में 120 राष्ट्रीय स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं की हत्याओं की बात कही है।

इसके अलावा संघ की विचारधारा से संबंधित राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की हत्याओं के आँकड़े और अधिक हैं। जो कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था के लिए वर्तमान में बहुत ही चिंता का विषय है। लेकिन फिर वही बात आती है कि इसपर सरकार व पुलिस द्वारा क्या कदम उठाए गए ? मानवाधिकार आयोग ने भी इन घटनाओं का संज्ञान नहीं लिया है। जिस संगठन का कार्यकर्ता संकट की हर घड़ी में आम भारतीयों के लिए हर बार निस्वार्थ भाव से आगे आता है, उनके विरुद्ध यह कौन-सा राजनीतिक षड्यंत्र चल रहा है जिसमें उनकी निर्दयता से हत्या ही कर दी जाती है।

जिस भाजपा सरकार को संघ की राजनीतिक विचारधारा से संबंधित व करीबी बताया जाता रहा है, उस सरकार के सत्ता में आए सात साल हो गए हैं। लेकिन इन सात सालों में उक्त गंभीर विषय पर इस सरकार ने क्या किया? संघ के कार्यकर्ताओं की हत्याओं को रोकने के कौन-से प्रयास किए? क्या कोई राष्ट्रीय या राज्य स्तर की स्वंतत्र जाँच एजेंसी या न्यायिक जांच एजेंसी इन हत्याओं की जाँच करने के लिए गठित की गई? यदि जाँच की भी है तो कितने हत्यारे आज तक पकड़े गए हैं? उनमें से कितनों को उचित दंड मिला है? छोटी-छोटी बातों पर इस देश के तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाते रहते हैं! लेकिन इस विषय में आज तक सर्वोच्च न्यायालय में कितनी याचिकाएँ लगाई गई हैं? यह हमारी सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना-चिंतन पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता है।

ये सारी बातें जनता व राष्ट्र के सामने आनी चाहिए। मानवता व राष्ट्र की सेवा में सतत लगे संघ कार्यकर्ताओं को कब न्याय मिलेगा? इनकी सुरक्षा के लिए सरकार ने अब तक क्या विशेष कार्य किया है? आशा है, इस विजयादशमी पर संघ प्रमुख अपने संदेश में इस गंभीर व चिंतनीय विषय पर सरकार से इस गंभीर विषय पर जाँच की माँग करेंगे? वहीं केंद्र सरकार से भी अपेक्षा है कि आगामी दिनों में इस विषय में कुछ कदम उठाए जाएँगे।

साभार-https://hindi.swarajyamag.com/ से

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