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पितरो का महापर्व : श्राद्ध पक्ष और इसकी प्रासंगिकता

भाद्र पद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 दिन श्राद्ध पक्ष कहलाते है। “श्रद्धया क्रियते यत् तत् श्राद्धम् ” यानिपूर्वजो के प्रति सम्मान व् श्रद्धा मूल तत्व है श्राद्ध का ।

मनुजो का एक मास पितरों के एक दिन के बराबर होताहै। कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की अष्टमी तक पितरो का दिन होता है और शुक्ल पक्ष अष्टमी से कृष्ण पक्ष अष्टमी तक पितरो की रात्रि होती है, तथा अमावस्या होती है ठीक मध्य मे।

इसीलिए श्राद्ध का विधान दोपहर में रखा गया है। प्रत्येक अमावस्या को पितृ तर्पण और श्राद्ध पितरों को दिया गया दैनिक भोजन है।

अश्विन कृष्ण पक्ष के 15 दिन पितरो का “महा पर्व” है, उत्सव है इसीलिए पितृ पक्ष के श्राद्ध को “पार्वण श्राद्ध” भी कहते है। इन दिनों पितृगण अपने घर लौटते है और अपने सगे संबंधियो द्वारा प्रदत्त “कव्य” से तृप्त होकर प्रतिफल में आशीर्वाद देते है।

पिता, पितामह और प्रपितामह तथा इसी प्रकार माता, दादी और परदादी इन तीन पीढ़ियों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए । शेष पूर्वजो को यह मान लिया जाता है कि वह कर्मानुबंध से मुक्त हो गए।

पितृ पक्ष को “कनागत” भी कहते है जो “कन्यागत” का अपभ्रंश है। कन्यागत से अभिप्राय सूर्य के कन्या राशिगत भ्रमण से है। यह तो संभव है कि श्राद्ध पक्ष की प्रतिपदा के दिन सूर्य कन्या राशि में न हो किन्तु पितृ पक्ष की अमावस्या के दिन सूर्य निश्चित रूप से कन्या राशि में ही होता है और क्योकि “अमावस्या” पितृो के अहोरात्र का मध्यान्ह है इसलिए इस दिन (अमावस्या के दिन) सूर्य के कन्या राशि में रहने के कारण ही पितृ पक्ष को “कनागत” या “कन्यागत” कहा जाता है।

अश्विन में ही श्राद्ध पक्ष क्यों किया जाय इसका एक ज्योतिषीय कारण यह भी है कि सूर्य कन्या राशि के 10 अंश से भ्रमण करते हुए जब तुला राशि के 10 अंश पर पहुँचता है तब परम नीच हो जाता है।

परम नीच से ज्योतिषीय तात्पर्य यह है कि सूर्य पृथ्वी के सबसे निकट होता है और पितृ लोक सूर्य लोक के ऊपर है अतः यह माना जाता है कि इस समय कव्य का पँहुचाना अपेक्षाकृत अधिक सुगम होता है, नजदीक होने के कारण।

पितृ गणों की महत्ता इस बात से भी सिद्ध होती है कि पृथ्वी सहित जो 7 उर्ध्व लोक है उनमे पितृ लोक को ऋषियों ने एवम् मनीषियों ने देव लोक से ऊपर अवस्थित माना है। दूसरा कारण है पितरों को हमने स्वयं देखा भी है, अनुभव है हमें पूर्वजो का, सानिध्य मिला है हमें पितरों का।

श्राद्ध सदैव स्वयं के घर पर ही करना चाहिए ऐसा शास्त्रो का निर्देश है दूसरे की भूमि पर श्राद्ध प्रशस्त नहीं है।

पिता को “वसु”, दादा को “रूद्र”,और परदादा को “आदित्य” की संज्ञा है। यानि 8 वसु 11 रूद्र और 12 आदित्य कुल 31 अर्थात देवताओं में से सिर्फ 2 अश्विनी कुमारो को छोड़कर सभी 33 कोटि देवताओं का प्रतिबिम्ब या प्रतिनिधित्व पितरों में है।

प्रति वर्ष दो बार श्राद्ध करना होता है । एक निधन की तिथि को और दूसरा पितृ पक्ष में।

“श्राद्धम् कुर्यात् न विस्तरेत” यानि श्राद्ध में दिखावा या प्रदर्शन नहीं होना चाहिए ऐसा शास्त्रो का निर्देश है।

(लेखक चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और धार्मिक व अध्यात्मिक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैंं)

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