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जेब काट रहा है डिजिटल लेन-देन

डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना आम आदमी को महंगी पड़ रही है। निजी ही नहीं सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान भी डिजिटल भुगतान पर कई सौ रुपये वसूल रहे हैं। राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) से लेकर स्कूलों और कॉलेजों की फीस डिजिटल प्रणाली से भरने की कीमत लोगों को चुकानी पड़ रही है।

सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के विभिन्न बैंक तय राशि से ज्यादा की जमा-निकासी पर शुल्क वसूलने के बावजूद एनईएफटी, आरटीजीएस और आईएमपीएस से लेनदेन पर शुल्क ल रहे हैं। इससे डिजिटल वॉलेट, पेमेंट बैंक, डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान महंगा पड़ रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार कैशलेस इकोनॉमी पर गंभीर नहीं है, अन्यथा डिजिटल लेनदेन के शुल्क पर अंकुश लगाती। हालांकि नोटबंदी के दौरान पेट्रोल पंपों समेत अन्य कुछ सुविधाओं पर डिजिटल भुगतान से छूट अभी जारी है, जिसका फायदा लोगों को मिल रहा है। लेकिन दूसरी ओर एनपीएस योजना में भुगतान पर सेवाकर और उस पर जीएसटी के अलावा डिजिटल भुगतान पर भारी शुल्क (50 हजार पर 470 रुपये) और उस पर जीएसटी वसूला जा रहा है। इसी तरह स्कूलों की प्रति माह या तिमाही फीस भरने में इंटरनेट बैंकिंग से भुगतान पर न्यूनतम 20 रुपये और क्रेडिट कार्ड व ई-वॉलेट के गठजोड़ के जरिये भुगतान पर 170 रुपये तक वसूले जा रहे हैं।

मेट्रो से लेकर निजी क्षेत्रों में पीओएस मशीन के जरिये भुगतान पर एक से 1.5 प्रतिशत तक एमडीआर शुल्क लिया जा रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली हालांकि कह चुके हैं कि डिजिटल भुगतान जितना बढ़ेगा, शुल्क उतना ही कम होगा। ऐसे में यह स्पष्ट है कि तब तक डिजिटल लेनदेन करने वालों को शुल्क का भार सहना होगा। विभिन्न बैंकों ने क्रेडिट कार्ड पर अपने शुल्क तय कर रखे हैं।

मोबाइल वॉलेट धन स्थानांतरण में 3 से 4 प्रतिशत तक अधिभार वसूलते हैं। जबकि पेमेंट बैंक से नकदी निकालने पर 0.65 प्रतिशत और धन स्थानांतरण पर 0.5 प्रतिशत की अलग कीमत ग्राहक को चुकानी पड़ती है। यूपीआई, भीम और आधार पे से भुगतान पर शुल्क नहीं है।

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