350 से ज्यादा लापता बच्चों को खोज निकालने वाले पुलिस अधिकारी सुनील दत्त दुबे

“मैंने गुमशुदा बच्चों की तलाश के अभियान को एक चुनौती के रूप में लिया। कार्रवाई सिर्फ कागज़ों पर ही न दिखे, इसका भी मैंने ध्यान रखा। बेसहारा बच्चों को रखने वाली देश के कई हिस्सों में चल रही NGO से मिला। मैंने जो पाया कि गरीब परिवार अपने गुमशुदा बच्चों को खोजने का सामर्थ्य नहीं रखते थे।”

यूपी पुलिस के अधिकारी सुनील दत्त दुबे अब तक 350 से अधिक खोए बच्चों को खोज कर उनके परिवार से मिला चुके हैं। सुनील दत्त दुबे वर्तमान में जिला महराजगंज के फरेंदा में डिप्टी SP के पद पर सेवाएँ दे रहे हैं। लापता बच्चों को तलाशने के साथ ही इन्होंने कई गायों को भी कटने से बचाया है। साथ ही पुलिस के कई संगठित अपराध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में शामिल रहे हैं। ऑपइंडिया ने उन्हें बात कर के इस उपलब्धि के बारे में और अधिक जानकारी ली।

ऑपइंडिया से बात करते हुए सुनील दत्त दुबे ने कहा, “मैंने गुमशुदा बच्चों की तलाश के अभियान को एक चुनौती के रूप में लिया। कार्रवाई सिर्फ कागज़ों पर ही न दिखे, इसका भी मैंने ध्यान रखा। बेसहारा बच्चों को रखने वाली देश के कई हिस्सों में चल रही NGO से मिला। मैंने पाया कि गरीब परिवार अपने गुमशुदा बच्चों को खोजने का सामर्थ्य नहीं रखते थे। मैंने ऐसे बच्चों की तलाश के लिए अपने थाने में एक टीम बनाई। जैसे ही किसी गुमशुदगी की सूचना मिलती थी, मेरी वो टीम सक्रिय हो जाती थी। मैं रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और गायब होने के स्थान के आसपास से फुटेज उठाता था। देश भर के NGO के नंबर और ई-मेल लेने के बाद उन्हें मेल और फोन कर सूचना देता था। इस के चलते कई बच्चे चेन्नई, मुंबई और कोलकाता से बरामद हुए।”

एक गुमशुदा को सऊदी अरब से तो एक अन्य को 41 साल बाद खोजा

सुनील दत्त दुबे ने बताया, “अपनी तलाश के दौरान एक बच्चा सऊदी अरब की जेल में मिला। मैंने लोगों से पैसे जुटा कर उसको वापस लाने में सफलता पाई। भदोही जिले के औराई क्षेत्र के गाँव सहसेपुर का 15 साल की उम्र में एक बच्चा बिछड़ गया था। सन् 1977 में गुमशुदा वो बच्चा 42 साल बाद 57 साल की उम्र में अपने परिवार से मिला था। वो राजस्थान की एक संस्था में रह रहा था और उसे अपने घर के बारे में सिर्फ वाराणसी की जानकारी थी। जब उसको खोजा गया, तब उसकी माँ जीवित थी। उसने अपने भाइयों को भी पहचाना। आज वो अपने परिवार में ख़ुशी से रह रहा है। ख़ास बात तो ये है कि सरकारी कागज़ों में उसका नाम ही गायब हो गया था।”

डीएसपी फरेंदा के मुताबिक, “इसी प्रकार रेलवे स्टेशन पर मिले एक बच्चे को मैंने नेपाल में उसके घर पहुँचाया था। इसके अलावा बिहार से 6 साल की उम्र में आया एक बच्चा चाय की दुकान पर काम करता था। उसको अपने घर के बारे में पता ही नहीं था। उसको ले कर हमें 3 बार बिहार जाना पड़ा। एक बार भदोही जिले की 2 लड़कियाँ गायब हुई थीं, तब मैंने उन्हें एक संस्था के माध्यम से चेन्नई में बरामद किया था। एक बार तो प्रयागराज की एक संस्था में मिर्जापुर का एक बच्चा अपना घर और परिवार जानते हुए भी नहीं जाना चाहता था, क्योंकि उसका मन संस्था में ही लग गया था। मैंने उसके घर वालों को बुला कर उनके हवाले किया।”

सुनील दत्त दुबे ने बताया, “जिसके घर का बच्चा गायब होता है उसके घर में चूल्हे नहीं जलते। उनके परिवार वाले बदहवास हो कर भटकते हैं। ऐसे में गुमशुदा बच्चों को उनके परिवार से मिलाने के बाद के भावनात्मक दृश्य मुझे इस काम को आगे भी करने की प्रेरणा देते हैं। उनके चेहरे पर आई मुस्कान को मैं पहले ‘ऑपरेशन मुस्कान’ नाम से सोशल मीडिया पर डालता था। बाद में यही नाम शासन तक गया। अब यह ‘ऑपरेशन मुस्कान’ एक ब्रांड बन चुका है।

बच्चों के गायब होने की वजह पर उन्होंने बताया, “मेरे अपने अनुभव के मुताबिक बच्चों की गुमशुदगी के कई कारण हैं। कुछ बच्चे किसी बात पर नाराज हो कर घर से निकल जाते हैं। तो कुछ गरीब घरों के बच्चे कमाने आदि के मकसद से घरों से भेजे जाते हैं जिसमें से कुछ वापस नहीं आ पाते। एक बार 2 लड़कियाँ मुंबई में हीरोइन बनने चली गई थीं। तब उनकी जानकारी मैंने फेसबुक पर फ्लैश करवाई। वो फेसबुक पोस्ट उन लड़कियों के डिब्बे में बैठे कुछ लोगों ने पढ़ी और उन दोनों लड़कियों को इटारसी स्टेशन पर सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया गया। इन दोनों लड़कियों को मुंबई से किसी ने फोन कर के TV सीरियल में काम दिलाने का वादा किया था। उस केस में 2 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। बहलाने-फुसलाने के अन्य भी कई मामले आए थे।”

सुनील दत्त ने बताया, “ये सच है कि कई ऐसे रैकेट हैं जो बच्चों का अपहरण भीख मँगाने और उनसे काम (मजदूरी) करवाने के उद्देश्य से करते हैं। मैंने मुंबई में एक बच्चा बरामद किया था, जिसे होटल में 6 साल से जबरदस्ती काम करवाया जा रहा था। उसे बहला-फुसला कर लाया गया था। यद्यपि इस तरह के रैकेट बहुत ज्यादा नहीं हैं। अब बच्चों की शिकायतों के लिए थाने आदि बन चुके हैं इस से ऐसी घटनाओं पर काफी अंकुश लग गया है।”

सुनील दत्त दुबे के मुताबिक, “गुमशुदा बच्चों को खोजने के लिए अभी पुलिस को और अधिक दक्ष होना होगा। इसके लिए ऐसे सेल का भी गठन एक विकल्प हो सकता है जिसमें इस काम में एक्सपर्ट पुलिसकर्मी हों। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वैसे-वैसे बच्चे को खोजना और मुश्किल होता चला जाता है। निठारी कांड के बाद गुमशुदा बच्चों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नई दिशानिर्देश आई हैं। ऐसे में पुलिसकर्मियों को यह समझना होगा कि गुमशुदगी की जानकारी आते ही सबसे पहले कौन से कदम उठाने हैं।”

साभार- https://hindi.opindia.com/से