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त्रिपुरा में भाजपा की जीत से राजनीतिक पंडित हैरान

बीजेपी ने शनिवार को त्रिपुरा में लेफ्ट के किले को तबाह कर दिया। मतगणना के बाद जब नतीजे आए तो भगवा पार्टी ने एक झटके में 25 साल पुराने वाम शासन को उखाड़ फेंका था। ये हालात तब है, जब पिछले चुनाव में बीजेपी का खाता तक नहीं खुल सका था। यह जीत बीजेपी के लिए कितना मायने रखती है, यह बात पीएम नरेंद्र मोदी के एक ट्वीट से पता चलती है। मोदी ने लिखा, ‘यह यात्रा शून्य से शिखर की है।’ माना जा रहा है कि बीजेपी ने बंगाली और आदिवासी वोटों को साधकर यह जीत हासिल की। लेफ्ट भले ही बीजेपी पर धन-बल से चुनाव जीतने का आरोप लगाया हो, लेकिन बीजेपी के पक्ष में त्रिपुरा के इन आंकड़ों से हर राजनीतिक पंडित हैरान है। राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए यह किसी केस स्टडी से कम नहीं। इस चुनाव में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिसने सभी को हैरान होने पर मजबूर कर दिया है। ये बातें क्या हैं, आइए समझने की कोशिश करते हैं

1.यहां गठबंधन के जरिए मैदान में उतरी बीजेपी ने दो तिहाई बहुमत हासिल किया है। सहयोगी पार्टियों की जीती सीटों को हटा भी दें तो भी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम है। एक ऐसी पार्टी, जिसे पिछले चुनाव में करीब 1.5 फीसदी वोट मिले थे, उसके लिए ये प्रदर्शन किसी चमत्मकार से कम नहीं। पिछले चुनाव में तो बीजेपी के करीब-करीब सभी प्रत्याशियों ने अपनी जमानत गंवा दी थी। पिछली बार जिस पार्टी का 60 सदस्यों वाली विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, आज उसके गठबंधन ने 43 सीट हासिल किए हैं। बीजेपी को अकेले 35 सीटें मिली हैं। बीजेपी और आईपीएफटी के गठबंधन को 50 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल हुआ है। यह भी गौरतलब है कि भाजपा का पूरे त्रिपुरा में एक पार्षद भी नहीं था।

2. त्रिपुरा के अलावा नागालैंड में भी बीजेपी सरकार बनाने की स्थिति में है। अगर ऐसा हुआ तो तो बीजेपी और उसके सहयोगियों द्वारा शासित राज्यों की संख्या 21 हो जाएगी। त्रिपुरा और नागालैंड को मिला दें तो इन राज्यों में देश की 70 फीसदी आबादी बसती है। आखिरी बार किसी राजनीति पार्टी का ऐसा दबदबा करीब ढाई दशक पहले नजर आया था। 1993 में 26 राज्यों में से 16 में कांग्रेस का शासन था। एक राज्य में गठबंधन जबकि बाकी में अपने दम पर कांग्रेस की सरकार थी। बीजेपी ने अब इससे भी ज्यादा मजबूत स्थिति कायम कर ली है। कहना गलत नहीं होगा कि ऐसा राजनीतिक दबदबा इससे पहले शायद ही किसी पार्टी को नसीब हुई हो। पीएम नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता पर काबिज होने के बाद बीजेपी के ऐसे उत्थान ने सभी को चौंकने पर मजबूर कर दिया है।

3. कांग्रेस के लिए यह हार किसी बड़े सदमे से कम नहीं। त्रिपुरा में कांग्रेस इस बार 2 पर्सेंट से नीचे वोट पर सिमट गई है। नगालैंड में भी कांग्रेस के वोट 25 पर्सेंट से घटकर 2 पर्सेंट रह गया। इन आंकड़ों से कांग्रेस के उन उम्मीदों को तगड़ा झटका लगेगा, जो गुजरात विधानसभा चुनाव में आए नतीजों की वजह से मजबूत हो चले थे। और तो और, अगर सब कुछ बीजेपी की उम्मीदों के मुताबिक हुआ तो कांग्रेस का शासन महज 3 राज्यों तक सिमट कर रह जाएगा। देश की राजनीति में सबसे पुरानी पार्टी का यह हश्र भी राजनीतिक जानकारों को कम हैरान नहीं कर रही। वहीं, इस हार की वजह से बीजेपी के खिलाफ विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे कम्युनिस्टों की दलीलें अगले लोकसभा चुनाव से ऐन पहले बेहद कमजोर पड़ने वाली हैं। कहना गलत नहीं होगा कि इन नतीजों ने कांग्रेस और सीपीएम, दोनों को ही तगड़ा झटका दिया है। ये पार्टियां गठबंधन के जरिए 2019 आम चुनाव में मोदी के सामने चुनौती रखने वाली थीं।

4. राजनीतिक पंडित सबसे ज्यादा हैरान इस बात को लेकर हैं कि त्रिपुरा में बीजेपी ने इस करिश्मे को आखिर कैसे अंजाम दिया? हर कोई इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहा है। त्रिपुरा में बीजेपी की जीत की इबारत लिखने वालों में सबसे प्रमुखता से नाम महाराष्ट्र के आरएसएस प्रहरी सुनील देवधर का आ रहा है। उन्होंने वाराणसी में पीएम मोदी के प्रचार की भी जिम्मेदारी संभाली थी। हालांकि, यह जीत काफी लंबे वक्त की तैयारी का नतीजा है। लोकसभा चुनाव के खत्म होते ही देवधर को त्रिपुरा भेज दिया दिया गया था ताकि वह 2018 विधानसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार कर सकें। ठीक तीन साल और तीन महीने पहले वह त्रिपुरा में एक मिशन के साथ पहुंचे थे। मिशन था, 25 साल पुराने लाल दुर्ग को ढहाना। 52 साल के देवधर ने द टेलिग्राफ से बातचीत में कहा, ‘नॉर्थ ईस्ट से मेरा जुड़ाव 1991 से बतौर आरएसएस प्रचारक शुरू हुआ। मेरा संगठन माई होम इंडिया देश भर में रह रहे नॉर्थ ईस्ट के लोगों के लिए काम करता है। जैसे ही मुझे नॉर्थ ईस्ट की जिम्मेदारी मिली, मैंने वहां एक घर किराए पर लिया और राज्य में दो साल बिताए। इस दौरान मैंने लोगों से मेलजोल बढ़ाया।’ राजनीतिक जानकार इस जीत में बीजेपी की रणनीति को तीन हिस्सों में बांटते हैं- स्थानीय स्तर पर जुड़ाव, सरकार विरोधी लहर को हवा देना और हिंदू बहुल राज्य में सीएम माणिक सरकार को सांस्कृतिक तौर पर चुनौती देना।

साभार- https://www.jansatta.com से



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