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सियासत की अपनी अलग एक ज़ुबाँ है ….

इस समय पूरे विश्व में उदारवाद बनाम रूढ़िवाद के मध्य द्वन्द की स्थिति देखी जा रही है। विश्व के अधिकांश देश इस प्रकार के वैचारिक द्वन्द का शिकार हैं। ज़ाहिर है भारतवर्ष भी इससे अछूता नहीं है। परन्तु अन्य देशों के नेताओं में जहाँ काफ़ी हद तक वैचारिक प्रतिबद्धता नज़र आती है वहीं हमारे देश के नेताओं में प्रायः वैचारिक प्रतिबद्धता नाम की कोई चीज़ दिखाई नहीं देती। कौन सा नेता सुबह किस पार्टी का सदस्य है और शाम को वह किस दल में शामिल हो जाएगा,कुछ कहा नहीं जा सकता । व्यक्ति विशेष तक ही नहीं बल्कि सामूहिक रूप से दलीय स्तर पर भी इस तरह का वैचारिक ढुलमुलपन देखा जा सकता है। अर्थात कौन सा दल आज किस विचारधारा के गठबंधन का हिस्सा है और वही दल कल किस विचारधारा के गठबंधन का हिस्सा बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। आम तौर पर इस तरह की स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब विचारधारा के सामने सत्ता का सवाल आ खड़ा हो जाए।

पिछले दिनों भारतीय राजनीति में महाराष्ट्र इस तरह के प्रयोग का एक और उदाहरण नज़र आया। कल तक कट्टर हिंदूवादी विचारधारा का अनुसरण व समर्थन करने वाला क्षेत्रीय दल शिव सेना जो दो दशकों से भी लम्बे समय से समान विचारधारा रखने वाली भारतीय पार्टी का लगभग स्थाई सहयोगी दल था,उसने महज़ महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने के लिए अपने वैचारिक सहयोगी संगठन से नाता तोड़ लिया। और अपनी धुर वैचारिक विरोधी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से हाथ मिला कर सत्ता में आ गया। निश्चित रूप से अपने हाथों से राज्य की सत्ता फिसल जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी में काफ़ी बेचैनी व छटपटाहट दिखाई दी। भाजपा के नेताओं की तरफ़ से शिवसेना के नेताओं को अवसरवादी तथा राज्य की जनता के साथ छल करने वाला बताया गया। नैतिकता के लिहाज़ से भी देखा जाए तो यह इसलिए मुनासिब नहीं था क्योंकि भाजपा व शिवसेना एक साथ मिलकर चुनाव पूर्व गठबंधन सहयोगी के रूप में चुनाव लड़े थे। इसलिए सरकार का गठन करना इन्हीं दोनों दलों का नैतिक दायित्व था। परन्तु राज्य की सत्ता के शीर्ष पर बैठने के दोनों ही दलों के उतावलेपन ने राज्य के सभी राजनैतिक समीकरण बदल कर रख दिए।

महाराष्ट्र के इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा ने भी सत्ता पर क़ब्ज़ा करने की ख़ातिर शिवसेना से भी पहले एक बड़ा राजनैतिक पाप यह कर डाला कि एक तो उसने राजभवन का दुरूपयोग किया दूसरे यह कि उसने जल्दबाज़ी में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के उस नेता पर विश्वास जताया जिसके विरुद्ध पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा करोड़ों रूपये के घोटाले व भ्रष्टाचार का आरोप लगाती रही है। यही वजह है कि जहाँ देश की जागरूक जनता जो शिवसेना+एन सी पी+कांग्रेस गठबंधन जिसे ‘महा विकास अघाड़ी ‘का नाम दिया गया है, के इस नए नवेले अवसरवादी गठबंधन को पचा नहीं पा रही है। वहीँ वह भाजपा द्वारा किये गए ‘सत्ता हरण’ के प्रयास को भी असंवैधानिक,सत्ता का दुरूपयोग तथा अनैतिकता की पराकाष्ठा के रूप में देख रही है। रहा सवाल शिवसेना व कांग्रेस के साथ आने का तो,शिवसेना का कांग्रेस प्रेम या उसका उदारवादी दलों से समझौता करना भी कोई नई बात नहीं है। 1975 में जब इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी उस समय शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने आपातकाल का समर्थन क्या था। इतना ही नहीं बल्कि आपातकाल के बाद हुए 1977 के लोकसभा तथा इसके बाद 1980 में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनावों में भी शिवसेना ने कांग्रेस पार्टी को समर्थन दिया था। आज शिवसेना को कांग्रेस या राष्ट्रवादी कांग्रेस से मिलकर सरकार बनाने पर हैरानी जताने वाले शायद भूल गए कि 1989 में शिवसेना इंडियन मुस्लिम लीग के साथ भी समझौता कर चुकी है तथा तत्कालीन मुस्लिम लीग नेता जी एम बनातवाला के साथ सेना प्रमुख बल ठाकरे मंच भी सांझा कर चुके हैं।

इन परस्पर अंतर्विरोधों के बीच एक सवाल यह भी उठता है कि क्या भाजपा को भी यह कहने का अधिकार है कि शिवसेना ने हिंदूवादी राजनीति की राह छोड़ उदारवादी दलों से समझौता क्यों कर लिया ? हरगिज़ नहीं। वर्तमान में बिहार में चल रही भाजपा व जे डी यू की संयुक्त सरकार इस समय का सबसे बड़ा उदाहरण है। सर्वविदित है कि गत वर्ष कांग्रेस+जे डी यू+आर जे डी के महागठबंधन को बड़ी ही चतुराई से धराशाई कर भाजपा ने कथित सेक्युलर पार्टी जे डी यू से समझौता कर उसे समर्थन देकर अपनी संयुक्त सरकार बनाई। स्वयं को हिंदूवादी व धर्मनिरपेक्ष बताने वाले भाजपा व जे डी यू पहले भी बिहार से लेकर केंद्र तक गठबंधन का हिस्सा रह चुकी है। इससे भी बड़ा उदाहरण पूर्व जम्मू कश्मीर का रहा है जहाँ भाजपा ने केवल सत्ता के लिए उस पी डी पी के साथ मिलकर राज्य में सरकार का गठन किया जिसे वह हमेशा ही कश्मीर का अलगाववादी दल कहा करती थी। फ़ारूक़ अब्दुल्ला व उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला को भी भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली केंद्र की गठबंधन सरकार में मंत्री बनाया था। कल तक भाजपा की नज़रों में यही नेता व यही राजनैतिक दल जो राष्ट्रवादी नज़र आते थे आज कश्मीर के हालात बदलने पर यही दल व इनके यही नेता राष्ट्रविरोधी,पाकिस्तान परस्त व अलगाववादी दिखाई दे रहे हैं।

इन राजनैतिक व वैचारिक द्वंदपूर्ण परिस्थितियों में आख़िर देश की आम जनता व मतदाता स्वयं को कहाँ खड़ा हुआ महसूस करता है?निश्चित रूप से वैचारिक सोच या विचारधारा किसी एक नेता या दल अथवा किसी संगठन विशेष से जुड़ी विषयवस्तु नहीं है न ही इसपर किसी का एकाधिकार हो सकता है। देश का प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी विचार व सोच रखता है। परन्तु वही व्यक्ति जब किसी अवसरवादी या ढुलमुल सोच रखने वाले नेता,पार्टी या समूह से जुड़ जाता है तो वह भी इसी वैचारिक द्वन्द में उलझ जाता है। गोया कल तक जो हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस में सब भाई भाई का नारा लगाया करता था उसी केमाथे पर या तो इस्लाम ख़तरे में है जैसी अनर्गल चिंताओं की लकीरें उभरती दिखाई देती हैं या उसके मुंह से “जो हिन्दू हितों की बात करेगा:वही देश पर राज करेगा ” जैसे समाज में साम्प्रदायिकता फैलाने वाले नारे सुनाई देते हैं। यानी जनता में आने वाले इस कथित वैचारिक बदलाव की वजह वह अवसरवादी नेता या दल बनते हैं जो सत्ता की ख़ातिर अपने विचारों की ही नहीं बल्कि अपने ज़मीर तक का सौदा कर बैठते हैं।

यह हालात इस नतीजे तक पहुँचने के लिए काफ़ी हैं कि प्रायः देश के किसी भी दल में वैचारिक प्रतिबद्धता नाम की कोई चीज़ बाक़ी नहीं रह गयी है। सत्ता पर नियंत्रण हासिल करना ही इनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। लिहाज़ा आम लोगों को इनकी वैचारिक ग़ुलामी से बचने की ज़रुरत है। जनता को स्वयं यह महसूस करना चाहिए और चुनाव में वोट मांगते समय इनसे यह ज़रूर पूछना चाहिए की आख़िर ये लोग समय समय पर अपने ‘वैचारिक केचुल ‘बदल कर जनता को क्यों गुमराह करते रहते हैं ? बेशक,ऐसी सियासत तो यही सोचने पर मजबूर करती है कि-“सियासत की अपनी अलग एक जुबां है-जो लिखा हो इक़रार,इंकार पढ़ना “।

Tanveer Jafri ( columnist),
098962-19228
0171-2535628

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