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ज़िंदगी भर कांग्रेस के मुंशी ही रहे प्रणव मुखर्जी

यह जो लिखा गया है इसे न तो कभी लिखा गया न किसी ने लिखने का सोचा ही होगा, लेकिन इस देश में हरिशंकर व्यास जैसे पत्रकार हैं जिन्होंने मीडिया की इस मंडी में अपनी लेखनी से, अपने तेवर से और अपनी धारदार हिंदी से हिंदी पत्रकारिता को वो तेवर दिया है, जिसके बारे में सत्ता और औद्योगिक घरानों के गुलाम पत्रकार सोच भी नहीं सकते। हरिशंकर व्यास ऐसे तो हर बार जो लिखते हैं और जैसा लिखते हैं उनके एक-एक शब्द में असली भारत की वो व्यथा सामने आती है जो मीडिया और सत्ता की मंडी में नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है, लेकिन उनकी लेखनी ने प्रणव मुखर्जी जैसी शख्सियत को जिस तेवर और सच्चाई से पेश किया है, वही वो पत्रकारिता है जिसमें से पत्रकारिता की सुगंध आती है।

प्रस्तुत है नया इंडिया में उनका संपादकीय

भारत के हम लोग दिमागी तौर पर जितने अपंग हैं दुनिया में शायद ही दूसरी कौम हो! न तो हमें सही-गलत समझना सोचना, बूझना आता है और न इतनी हिम्मत है कि दूध और पानी के बेसिक को भी अलग-अलग कर सकें। यह भारत के तंत्र की, हम हिंदूओं के डीएनए की पहचान है कि हम उसे भी भगवान मानते हैं जो पत्थर होता है। मेरा यह सब सोचना आज प्रणब मुखर्जी के बहाने है। अच्छा हुआ, देश को मुक्ति मिली जो प्रणब मुखर्जी सार्वजनिक जीवन से रिटायर हुए। उनकी रिटायरी पर सोचने की जरूरत इसलिए है क्योंकि वे भारत के अकेले ऐसे राष्ट्रपति है जिन्होने दशकों सत्ता भोग कर राष्ट्रपति की कुर्सी का जुगाड़ कराया। प्रणब मुखर्जी मेरे पत्रकारिता में आने से भी पहले दिल्ली दरबार, भारत के तंत्र का हिस्सा थे। मैंने प्रणब मुखर्जी के नाम के साथ हमेशा यह जाना कि सत्ता के लिए तिकड़में कैसे होती है और भारत में राजनीति व क्रोनी पूंजीवाद कैसे साथ-साथ चलते हैं।

उस नाते प्रणब मुखर्जी वह चेहरा है जिन्होंने इंदिरा-राजीव-सोनिया परिवार और भारत के तंत्र के दोयमपने को अपनी औसत मुंशी बुद्धि से ऐसा साधा, ऐसे मथा कि देश को दसियों तरह से भटकाया। प्रधानमंत्री पद को छोड़ कर प्रणब मुखर्जी ने वित्त, रक्षा, विदेश, वाणिज्य, योजना आयोग की सभी कुर्सियों को जमकर भोगा लेकिन इतने लंबे कार्यकाल के बाद भी उनके खाते का एक ऐसा काम नहीं है जिससे भारत को छटांग, दस छटांग नई पहचान मिली हो। कोई माने या न माने अपना मानना है कि राष्ट्रपति भवन में डा कलाम व्यवहार, विचार, सादगी, नैतिक मूल्यों के आदर्श राष्ट्रपति थे तो लगभग प्रणब की ही तरह के लंबे सार्वजनिक जीवन में देश को बदलने का प्रतिमान पीवी नरसिंहराव ने बनाया। वही बतौर अर्थशास्त्री डा मनमोहनसिंह ने भारत के लोगों, उसके तंत्र को जो दिया है उसके आगे, इन सबके आगे छटांग भी योगदान प्रणब मुखर्जी का नहीं बनता है। इसलिए कि अफसरी, मुंशीपने की मेधा में नेतृत्व की छाप नहीं छुटा करती। सो प्रणब मुखर्जी का सियासी-सार्वजनिक जीवन कुल मिला कर किसी आईएएस अफसर या कैबिनेट सचिव का जीवन हुआ।

हां, यही बंगाल के ब्राह्मण परिवार में जन्मे प्रणब मुखर्जी के लंबे सार्वजनिक जीवन का निचोड़ है! तभी कई मायनों में आजादी बाद के तमाम चेहरों के साथ प्रणब मुखर्जी का चेहरा भी भारत के सड़े तंत्र के फोड़ो का पर्याय है। तंत्र से भारत को कैसे लूटा जा सकता है, कैसे एंपायर खड़े किए जा सकते हैं, क्रोनी पूंजीवाद के कैसे प्रतिमान बन सकते है ये सब प्रणब मुखर्जी के सफर में मील के पत्थर है। यों धीरूभाई अंबानी को दिल्ली दरबार से पहला लाइसेंस कॉमर्स के उपमंत्री मोहम्मद शफी कुरैसी के यहां लॉबिग से मिला था मगर अंबानी के औद्योगिक साम्राज्य की नीव प्रणब मुखर्जी के औद्योगिक विकास के उपमंत्री बनने के साथ पड़ी थी। कोई माने या न माने 1974 से ले कर 2017 में अभी रिटायरी तक राष्ट्रपति और अंबानी का रिलायंस एंपायर सवा सौ करोड़ लोगों की कई हकीकत दर्शाता है। हकीकत है कि भारत का सिस्टम क्रोनीवाद, लूट और जनता को मूर्ख बनाने का ताना-बाना लिए है। राज कोई भी हो, भारत में सत्ता से ही खरबपति बना जाता है। भारत में दोयम दर्जे के औसत लोग सत्ता भोगते है तो खरबपति भी बनते है। और ये सब सिर्फ भारत में दायरे में ही संभव है। न दुनिया प्रणब को अमृत्य सेन जैसा मानेगी और न अंबानी फोर्ड या बिल गेट वाला सम्मान पा सकते है। फिर भारत में भले ये अपने को ज्ञानी- पंडित-महान अर्थशास्त्री, लेखक, रणनीतिकार, खरबपति चाहे जो कहलवा ले।

इस बात को गांठ बांध लेना चाहिए कि आजाद भारत के 70 सालों में विकास का मुख्य प्रतिमान क्रोंनी पूंजीवाद है। इसकी नंबर एक मिसाल धीरूभाई- बाला सुब्रहमण्यम के जुगाड़ों से बना रिलायंस एपांयर है। इसे समझेंगे तो भारत में उद्योग- कारोबार की कुंजी जानेंगे। ऐसे ही सार्वजनिक नेतृत्व का मसला है। उसमें प्रतिमान प्रणब मुखर्जी इसलिए है कि कैसे कोई वक्त के साथ रंग बदलता है, वक्त को बूझ कर राजनीति करता है इसका पिछले पचास वर्षों का प्रतीक चेहरा प्रणब मुखर्जी है। उनसे पता पड़ता है कि भारत का तंत्र कुल मिला कर मुंशीगिरी में बंधा है। भारत का अफसर हो, केबिनेट सचिव हो या मंत्री, उसके अस्तित्व, उसकी सफलता का सत्व-तत्व मुंशीगिरी है। आपको ड्राफ्टिंग अच्छी आनी चाहिए। अंग्रेजी बोलनी आनी चाहिए। यदि यह है तो समाजवाद का वक्त हो तो समाजवाद की बात करें, सुधारों का समय हो तो सुधारक बन जाए। इंदिरा गांधी को खुश करना हो तो उनके हो जाएं, नरेंद्र मोदी का वक्त हो तो उन्हें खुश कर देंगे।

वैसे एक वक्त प्रणब मुखर्जी को गलतफहमी थी कि वे बंगाल के जन नेता है। राजीव गांधी ने जब उनके पर कतरे तो उन्होंने अपनी अलग पार्टी भी बनाई। बुरी तरह फेल हुए। भला हो नरसिंहराव का जो उन्होने दरबार में लौटाया। वापसी के बाद जैसे-तैसे अहमद पटेल के यहां चक्कर लगा कर सोनिया गांधी के यहां मुंशीगिरी के अपने गुणों से भरोसा बनवाया। बावजूद इसके नियति ने उन्हें उन डा मनमोहनसिंह का मंत्री बनने को मजबूर किया जिसके कभी वे दरबार में बॉस थे। सो उनका आगे का वक्त इस कुंठा के साथ था कि मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री है और चिंदबरम बहुत भाव पा रहे है।

तभी 2004 से ले कर 2012 तक प्रणब मुखर्जी ने आर्थिकी को भटकाने वाले, समाजवाद के दिनों को लौटाने वाले, पिछली तारीखों से टैक्स लगवा कर थोपने से ले कर अपनी खास अफसर ओमिता पॉल से वित्त मंत्रालय चलवाने जैसे ऐसे-ऐसे काम किए कि सफल वित्त मंत्री रहे डा मनमोहनसिंह बतौर प्रधानमंत्री भी अपनी कमान में चमत्कारिक सुधार नहीं करा पाए। आज आर्थिकी के जितने संकट है उनमें बैंको के दिवालिया होने, उद्योगों के एनपीए में फंसने का सोर्स प्रणब मुखर्जी के वक्त वित्त मंत्रालय में बने ढर्रे व क्रोनीवाद से है। प्रणब मुखर्जी ने वह किया जिससे दुनिया के निवेशकों ने भारत से तौबा की। बैंकों ने कर्ज बांटने में बंदरबांट की तो बाबा रामदेव से बातचीत लीक करने से ले कर लोकपाल के बवाल को बेकाबू बनवाने, तेलंगाना-आंध्र जैसी तमाम सियासी गलतियां उस कुंठित मुंशीपने की मनोदशा की बदौलत थी जो अपने को मनमोहनसिंह, चिंदबरम से ज्यादा काबिल समझती थी।

सचमुच प्रणब मुखर्जी की दास्तां में दरबार राजनीति के ऐसे-ऐसे पहलू है जिसका कुल निचोड़ है कि भारत में कैसे-कैसे क्या-क्या बन जाते है। भारत के सार्वजनिक जीवन की शुचिता, चरित्र के अनुभव में प्रणब मुखर्जी के यहां एक महिला अफसर ओमिता पॉल ने 2004 से ले कर 2017 तक जो वैभव, जो मनमाना पाया वह भी सोचने को मजबूर करता है कि क्या मतलब है इस देश का! किसी सभ्य, लोकतांत्रिक, चारित्रिक देश में इस तरह का सिस्टम क्या हो सकता है कि चाहे जो हो लेकिन न मीडिया में चर्चा हो और न कोई सोचें!

सोचें भी कैसे? आखिर मानसिक अपंगता में अपने तंतुओं को लकवा जो मारा हुआ है। गुलाम मनोदशा में जो हम जीते है।

बहरहाल, प्रणब मुखर्जी के इस अनहोने कृतित्व को सलाम जिसमें उन्होंने मुंशीगिरी से पचास साल सार्वजनिक जीवन को प्रणब दा के अंदाज में जीया तो क्रोनी पूंजीवाद के अंबानी-रिलायंस के वैश्विक प्रतिमान के साथ देश के वित्त में ऐसा कबाड़ा किया कि उछलती आर्थिकी के वक्त भी विदेशी निवेशक भारत से तौबा कर गए!

इसलिए जैसे कृष्ण मेनन के हम बतौर रक्षा मंत्री गीत गाते है वैसे वित्तशास्त्री के नाते प्रणब के भी गाए!

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साभार- http://www.nayaindia.com/ से

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