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दुआ कीजिये इस घटिया राजनीति का अंत हो

यह तो शुक्र है कि उद्धव ठाकरे के सत्ता लोभ में भाजपा और शिवसेना में सियासी तलाक हो गया और इस समय दिल्ली दरबार में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार काबिज़ है जिसने अभिनेत्री कंगना रानौत को वाय श्रेणी की सुरक्षा दे दी और वह ताल ठोकती मुंबई भी पहुँच गई। महाराष्ट्र की कुर्सी के चक्कर में ख़ुदा न खास्ता दोनों दलों के बीच 25 साल पुरानी मतलबी शादी कायम होती तो यक़ीन मानिए कंगना का दफ़्तर नहीं सर टूटा होता। उसे हरामखोर कहने वाले शिवसैनिक उसका राम नाम सत्य करवा चुके होते। या तो अभिनेत्री बॉलीवुड के बाक़ी सुपर स्टार्स और सुंदरियों की तरह मुँह में दही जमाए रहती, बाहर जाकर बकती तो फिर मुंबई न आती और आ जाती तो मार दी जाती।

सुरक्षा घेरे में पहुँची तो शिवसैनिक काले झंडे दिखाकर भड़ास निकाल पाए, ये घेरा न होता तो अब तक कंगना के मुँह पर कालिख़ पोत चुके होते। मुमकिन है तेज़ाब फेंका जाता या तालिबान की तर्ज़ पर पत्थर मार-मार जान निकाल ली जाती। उसकी लाश भी नहीं मिलती और मिलती तो इस हाल में कि हुलिया समझ नहीं आता। तब मुंबई पुलिस फ़ाइल बन्द कर देती और उसके पक्ष में एक आवाज़ न उठती। यदि उठती तो वह भी दबा दी जाती। आज जो बॉलीवुड अभिनेत्री का दफ़्तर टूटने और उसे महाराष्ट्र से बेदख़ल करने की सरेआम धमकियों के बीच घरों में दुबका हुआ है, क्या उसके दुनिया से बेदख़ल किए जाने पर बोल पाता। कतई नहीं, क्योंकि सबको अपने घर-दफ़्तर की परवाह है, अपनी जान प्यारी है, अपने परिवार की फ़िक्र है।

इससे आप महाराष्ट्र और ख़ासकर मुंबई में शिवसेना की ताक़त, तरीक़े, तेवर और तालिबानी खौफ़ का अंदाज़ लगा सकते हैं। शुक्र है उद्धव की सत्ता पिपासा में भाजपा से गठबंधन टूट गया और कंगना का सौभाग्य है कि केंद्र में उस भाजपा की सरकार है जो कंगना के कंधे पर बंदूक रख शिवसेना पर सियासी निशाना साध रही है। कम से कम लड़की ज़िंदा तो है। दफ़्तर ही मलबा हुआ, सर तो सलामत है!

ऐसा इसलिए कि अपने 55 साल के इतिहास में मुंबई में जो भी शिवसेना की बेलगाम गुंडा फौज़ की राह में रोड़ा बना या जिसने भी खिलाफ एक शब्द बोला, वह नहीं बख़्शा गया। नेता से अभिनेता तक, कारोबारी से कामगार तक, प्रेस से कानून तक, औरत से आदमी तक, हिन्दू से मुसलमान तक, आम से ख़ास तक पिटे, प्रताड़ित हुए और मार तक डाले गए। सिवाय मुंबई को तीन दिन बंधक बनाकर खून की होली खेलने वाली क़साब गैंग के, जिसने मौत का नंगा नाच किया मगर शिवसेना के ‘टाइगर्स’ कुत्तों की तरह दड़बों, चालों और बंगलों में दुबके रहे। शायद यह सोचकर कि कसाब ने शिवसेना का तो नाम ही नहीं लिया, फ़िर हम क्यों ज़हमत उठाए? जैसे दाऊद इब्राहिम के लिए बाल ठाकरे ने कहा था, वह सेना को दान देता है, इसलिए शिवसैनिक हैं।

साफ़ है शिवसेना को न माफ़िया से परहेज़ हैं न क़साब से गुरेज़ हैं। दाऊद ने मुंबई दहलाई तो ठीक, क़साबों ने मौत बरसाई तो भी ठीक। मुंबई, मराठी और महाराष्ट्र मरे कि जले, सेना अपनी सरहद में रहेगी। वह हद तभी तोड़ती है जब कोई उसके विरुद्ध मुँह खोलता है या उसके मतलब, मंसूबों या माल के आड़े आता हैं। तब ज़रूरत पड़े तो मार भी दिया जाता है।

ये शिक्षा भी सेना के संस्थापक बाल ठाकरे ही अपने मगरूर कपूतों और गुंडे सैनिकों को स्वयं देकर गए हैं। बाल ठाकरे ने कम्युनिस्टों पर प्रहार से ही अपनी सियासी सीढ़ियां चढ़ना शुरू की थी। यह मुंबई में मिल मालिकों और मजदूरों के बीच उस संघर्ष का दौर था जिसकी कहानियां हम हिंदी फिल्मों में देखते आए हैं। पूंजीपतियों में पैठ बनाने के लिए ठाकरे ने अपनी एंटी-कम्युनिस्ट नीति बनाई।

एक ट्रेन हादसे का जिक्र कर उनके बारे में कहा कि ये लोग ट्रेन हादसे में जख्मी औरतों के गहने भी लूटकर भाग जाते हैं। कम्युनिस्ट फैक्ट्रियों में हड़ताल करते थे और ‘गरीबों के पेट पर लात मारते हैं।’ स्वाभाविक था टाटा-अम्बानी जैसे लोगों के लिए शिवसेना का साथ मजबूरी और जरूरी था। सो, माल भी आया और राजनीति भी चमकी। चरित्र इतना गिरा कि देसाई की हत्या करवा दी गई। सात शिवसैनिक पकड़े गए थे और बाल ठाकरे पर आरोप लगा था। जिन्हें बचाने का ठेका राम जेठमलानी ने लिया और बचा लाए। मारे जाने के वक्त देसाई परेल से विधायक थे। उपचुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ने उनकी पत्नी सरोजनी देसाई को टिकट दिया मगर जीता शिवसेना वामनराव महाडिक। यही शिवसेना की पहली राजनीतिक विजय थी।

इस हत्याकांड के ठीक एक माह पहले ठाकरे ने भिवंडी में शिव जयंती के नाम पर यात्रा निकाली थी और रास्ते के मामूली विवाद में भिवंडी, कल्याण, मलाड से लेकर जलगांव तक को दंगों की आग में झोंक दिया था।

ठाकरे जानते थे कि दंगों से ही धाक जमेगी इसलिए वे जानबूझकर विवादित मुद्दे उठाते रहे। इतिहास प्रमाण है मराठी बनाम मद्रासी विवाद के बीच साल 1969 में उन्होंने किस तरह महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद को हवा दी थी और उनकी गिरफ्तारी पर शिवसैनिकों के बवाल में 70 बेकसूर मारे गए थे और 250 से ज्यादा घायल हुए थे।

बाल ठाकरे का एक डायलॉग बड़ा मशहूर हुआ कि ‘यदि बाबरी मस्ज़िद मेरे लोगों ने गिराई है तो मुझे उन पर गर्व है!’ यह उतना ही बकवास था जितना सेना का यह दावा कि वह मराठियों के हित की लड़ाई करती है। बाबरी ढांचे के ध्वंस के बाद इससे मुंबई दंगों की आग में जरूर झुलसी मगर यह दावा उतना ही फुस्स निकला जितना शिवसेना का चरित्र। इसलिए कि बाबरी ढांचे की कारसेवा में एक भी शिवसैनिक मौजूद नहीं था। सारा दायित्व संघ ने निर्वहन किया था। अवसरवादी ठाकरे डायलॉग पेल कर सुर्खियां जरूर बटोर गए थे। नतीजे में मुंबई में प्रचंड दंगा हुआ और सैकड़ों लाशें गिरी। हिंदुओं की, मुसलमानों की, मराठियों की मगर सब निर्दोष थे। हाँ, इस डायलॉग से ‘हिन्दू ह्रदय सम्राट’ जरूर मान लिए गए। सियासी फल यह मिला कि मुंबई दंगे के दो साल बाद भाजपा के सहयोग से सरकार बनी और मनोहर जोशी शिवसेना के पहले मुख्यमंत्री।

कौन नहीं जानता जब पुणे के एक थियेटर में मुंबई निवासी रमेश किनी नाम का एक शख़्स मरा मिला था। रमेश राज ठाकरे के बालसखा लक्ष्मीकांत शाह के मकान में किराएदार था और राज पर उसकी हत्या का आरोप लगा था। बात इतनी बढ़ी कि सीबीआई जांच तक हुई लेकिन राज का बाल भी बांका न हुआ। सूबे में शिवसेना की सरकार थी, इसलिए पुलिस ने रमेश की हत्या को आत्महत्या मानकर केस फ़ाइल कर दिया। तब राज अपने चाचा बाल ठाकरे के लाड़ले थे और राजनीति में उनके भावी उत्तराधिकारी माने जाते थे।

साल 2005 का कोहिनूर मिल विवाद किससे छुपा है जिसमें शिवसेना मुख्यालय के ठीक पास की पाँच एकड़ ज़मीन राज और मनोहर जोशी के बेटे उन्मेष जोशी ने 421 करोड़ रुपये में मिलकर खरीदी थी। जिस सौदे के लिए 40 कम्पनियों ने बोली लगाई उनमें से केवल तीन को ही सिस्टम ने मान्य किया था और तीनों में राज या शिवसेना के लोग थे। तब भी सवाल उठे थे जिनके जवाब महाराष्ट्र को आज तक न मिले कि राज और उन्मेष 421 करोड़ लाए कहाँ से? तब जबकि मनोहर जोशी जन्मजात एक बेहद ग़रीब परिवार से आते थे! जवाब यही कि शिवसेना और उसके सैनिक केवल मतलब साधकर माल बना रहे थे, दादागिरी कर रहे थे। हत्या करने तक में हिचक न थी!

बाल ठाकरे के संस्कार इतने दमदार थे कि साल 2005 में सेना से किनारा कर राज ने जब अपनी पार्टी बनाई तो तेवर और तरीके चाचाजी के ही फॉलो किए। साल 2008 में अपनी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की ताकत दिखाने के लिए राज के गुंडों ने मुंबई में करोड़ों की संपत्ति आग कब हवाले कर दी थी। राज को गिरफ्तार किया गया मगर मात्र 15 हजार का जुर्माना लगा। सियासी बवाल था, नीचे से ऊपर तक मैनेज जो हो गया!

मेरी न शिवसेना से शत्रुता है और न कंगना से हमदर्दी। शिवसेना तो जानती है उसे क्या करना है मगर कंगना शायद ही समझे कि अपने मुखर या बड़बोलेपन में वह राजनीति के किस चंगुल में उलझ चुकी है। इन सबके बीच मुद्दा है शिवसेना जैसे उन क्षेत्रीय दलों का जो मूलतः देश के लोकतंत्र की राह में स्वार्थ, हिंसा तथा अमर्यादा का दलदल गढ़ते हैं और आम आदमी के साथ देश की छाती में भी छुरा भोंकते हैं। डर जिनका औजार है और गालियाँ ही जिनकी अलंकार है।

अपने दिल पर हाथ धरकर पूछिए, क्या उद्धव या राज जैसे लोग और शिवसेना देश/प्रदेश का भला कर सकती हैं? कभी नहीं! ये कलंक मिटने चाहिए! शिवसेना या उसके टाइप के अन्य दल राष्ट्र और महाराष्ट्र सबकी छाती पर बोझ हैं। ये राजनीति के कोरोना हैं। दुआ कीजिए, कोरोना की तरह इनका भी अंत हों!

vivekchaurasiya
(लेखक अध्यात्मिक व समसामयिक विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं)

https://www.facebook.com/drvivekchaurasiya से साभार

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