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विश्व मैत्री मंच पर आज प्रस्तुत है मंच के साथी जीतेश राज नक्श की गज़ले

विश्व मैत्री मंच पर आज प्रस्तुत है मंच के साथी जीतेश राज नक्श की गज़ले । जिंदगी के फलसफे से जुड़ी ये गज़लें दिलो दिमाग पर छा जाती हैं और अपने लफ़्ज़ों ,कहन और शिल्प से पाठक को बांधे चलती हैं। यकीनन उम्दा ग़ज़लें, विषय प्रवर्तन है संतोष श्रीवास्तव का। इस सत्र की संचालक हैं, रुपेंद्र राज तिवारी (शिक्षा-एम ए : एल एल एम. साहित्य रुचि – कविता /कथा/ संस्मरण / आलेख। पता- रायपुर/ छत्तीसगढ़)

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ग़ज़ल
1
इस क़दर मुख़्तसर ख़ुशी क्यों है,
उम्र बस इसकी दो घड़ी क्यों है।

जानता हूँ कि वो दग़ा देगा,
फिर मेरी उससे दोस्ती क्यों है।

कल ये पूछा था मैंने दरिया से,
तेरे होंठो पे तिश्नगी क्यों है।

मौत जब चाहे इसको ले जाए,
इतनी बेबस ये ज़िन्दगी क्यों है।

मेरे अश्कों को पोछने वाले,
तेरे होठों पे ये हंसी क्यों है।

‘नक़्श’ रोकर गया है क्या कोई,
इस अँधेरे में रौशनी क्यों है।

2
आतिशे लफ़्ज़ से वो दिल को जला देता है,
जब भी मिलता है कोई ज़ख़्म नया देता है।

नाम लिखता है कोई लिखता है अपनी सांसे,
कोई तहरीर कोई खुद को मिटा देता है।

ज़ख़्म भरता भी है और दर्द भी बढ़ जाता है,
चारागर तू ये मुझे कैसी दवा देता है।

रास्ता देखते रहने की भी हद हो कोई,
कौन से मोड़ पे आके तू सदा देता है।

हमने देखा ही नहीं उसको कभी उठते हुए,
जब किसी को कोई नज़रों से गिरा देता है।

मालो ज़र, लालो गौहर और चमकते हीरे,
तुझसे हमदर्दियां माँगी थीं ये क्या देता है ।

ग़ैर के पास तो मौक़ा ही नहीं है अये ‘नक़्श’
वक़्त पढ़ने पे तो अपना ही दग़ा देता है।

3
जाने कब दे के तू दग़ा जाए,
ज़िन्दगी तुझको क्या कहा जाए ।

कोई मंज़िल नहीं है चलना है,
अब जहाँ तक ये रास्ता जाए।

अपनी नज़रें न मैं झुकाउंगा,
सर जो जाता है सर चला जाए।

फूस के घर में कैसी दीवाली,
इन दियों को बुझा दिया जाए।

ज़ुल्म पे ज़ुल्म सह के बेटे के,
माँ के लब से कहाँ दुआ जाए।

एक लमहा तो वक्त दे ऐसा,
‘नक़्श’ मुझसे मुझे मिला जाये।

4
सदा मज़लूम की ज़ालिम की ताक़त रोक लेती है,
सज़ा से ऐसे लोगों को वकालत रोक लेती है।

गले मिलने को जब भी बढ़ते हैं भाई से भाई तो,
हमारे मुल्क की उनको सियासत रोक लेती है।

करें खिदमत हमेशा ही बुज़ुर्गों बेसहारों की,
कोई मुश्किल जो आती हो इबादत रोक लेती है।

जिहालत को तुम्हारी कब तलक ये मुल्क ढोएगा,
अगर क़ाबिल हुक़ूमत हो बग़ावत रोक लेती है।

तुम्हारी बदसुलूकी का मैं बदला ले तो लूँ लेकिन,
शराफत तो शराफत है शराफत रोक लेती है।

तेरी महफ़िल का हिस्सा बनने की ख्वाहिश तो है दिल में,
मगर तेरी निगाहों की हिक़ारत रोक लेती है।

तुझे अये ‘नक़्श’ क्या उम्मीद हो इंसाफ की इससे,
हुक़ूमत बेबसों की हर शिकायत रोक लेती है।

काव्य कोश में जावेद अख्तर चित्र सज्जा कस्तूरी मणिकांत

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सर्वप्रथम तो जीतेश राज ‘नक्श’ जी को हार्दिक बधाई।
आज मंच पर जीतेश जी की पुरसकूं ग़ज़लों को शाया किया है संतोष दी ने। साथियों जीतेश जी की ग़ज़लें ग़ज़ल होने का खूबसूरत एहसास है।बड़े नर्म अल्फ़ाज़ो में कोई तल्ख़ सी बात कहने में महारत है जीतेश जी को।आप खुद पढ़ें अंदाज़ हो जाएगा।
मै इंतज़ार में हूँ आप सबकी आमद के इन्हें पढ़िए और उभरते ग़ज़लगो की रहनुमाई और हौसला आफ़ज़ाई कीजिए

संचालक रुपेन्द्र राज़ तिवारी

मै इंतज़ार में हूँ आप सबकी आमद के इन्हें पढ़िए और उभरते ग़ज़लगो की रहनुमाई और हौसला आफ़ज़ाई कीजिए।
विजय राठौर
तुम्हारी बदसलूकी का मैं बदला ले तो लूँ लेकिन
शराफत तो शराफत है शराफत रोक लेती है।
विशुद्ध मानवीय चरित्रों की वकालत करती जीतेश जी की गजलें उम्दा गजलें हैं। हर शेर में कोई न कोई ऐसी बात है कि वो पाठक के जेहन में देर तक रह जाये। नयी पीढ़ी के अच्छे गज़लगो हैं जीतेश जी। उनकी गज़लें दुष्यंत की परंपरा की गजलें हैं जो समाज और सियासत की कमजोर नसों पर चोट करती हैं।

मैं उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।
रुपेन्द्र जी को उनकी आज की तस्वीर के लिए बधाई।

जितेश नक्श जी की गज़लें, क्या कहने।
ज़िन्दगी बेबस क्यों है, अश्कों के मालिक तेरे लब पे हँसी क्यों है, आंसुओं से अँधेरे को रोशन करने का कथन वाह।

आतिशे लफ्ज़ का ज़ख्म, नज़रों से गिराना और उठाना, अपनों का दगा देना।

इंसाफ की नाउम्मीदी,

लग रहा है ज्यों सुबह की बेदाग धूप, हलकी ठण्डी हवा से मिलकर जहाँ को ठंडी गर्मी का अहसास करा रही हों।
पलकों के दरवाजे से सीधे दिल में पहुँचने वाली रचनाएँ।
ईरा पंत

रात सर पर है और सफ़र बाक़ी
हमको चलना ज़रा सवेरे था।
जावेद जी का एक सीधा सा शेर कितने गहरे अर्थ लिए हुए है।यूँ तो हम अक्सर ही अपने तय मुकाम पर वक़्त पर न पहुँच पाने पर यह जुम्ला कह ही देते हैं।लेकिन जब ज़िन्दगी के सफ़र में मुक़ाम हासिल होने मे देर हो और ज़िन्दगी हाथों से फिसलती दिखे तो इन अल्फ़ाज़ों के मानी और भी गहरे हो जाया करते हैं।

कस्तूरी ने गुलमुहर के शाख़ से टूटे फूल का जो रंग बदला है वह बदलती ज़िन्दगी का रंग है।बहुत संजीदा तस्वीर को कस्तूरी जी ने अख़्तर जी के अशआर को जामा पहनाया ।बधाई कस्तूरी जी।
शुभाशीष
सरस दरबारी
वाह नक़्श साहब….!
हर हर्फ़ में इक दर्द तड़पा है
हर लफ्ज़ में शीशा दरका है
चंद शेरों का ये हुजूम नहीं
यहाँ सैलाबे दर्द बरपा है…!!!
आपकी पहली और दूसरी ग़ज़ल/ नज़्म बेसाख़्ता दिल में उतर गयी। बहुत खूब नक़्श जी।

मधु सक्सेना

सबसे पहले तो कस्तूरी की महक से मंच सुवासित … बधाई ..

जोतेश जी की ग़ज़लें विचलित करती हैं तो सुकून भी थमा जाती है … एक जागृत रचनाकार के सामने प्रश्न तो उगते ही रहते है …पहली ग़ज़ल प्रश्न करती है ..खुद से कभी ज़माने से ..

जख्मों की बात करती दूसरी ग़ज़ल दर्द को उकेरती है .. दर्द ही है जो ग़ज़ल की राह पकड़ कर चल देते हैं …

‘ अपनी नज़रें न मैं झुकाउंगा
सर जो जाता है चला जाए ‘
स्वाभिमान की बात करती है ।

ग़ज़ल जीवन के रोजमर्रा की तहकीकात करती है और मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने का काम करती है ।ग़ज़लो के विधान के बारे में नही जानती ,, भावपूर्ण ग़ज़लो के लिए शायर को बधाई ।
महेश दुबे

बात मेयार की, पाये की न पूछो साहब !
बात जो नक्श ने की है वो सलीके की है ! !
तकनीकी तौर पर क्या खूबी खामी है वह तो गज़लगोई के उस्ताद बताएँगे लेकिन नक्श साहब की बातें सीधी सच्ची और दिल को छूने वाली हैं । हार्दिक अभिनंदन !
रूपेन्द्र

जी मधु जी विधा की आवश्यकता ग़ज़लगो को अपनी बात कम मे अधिक और क़ायदे से कहने के लिए होती है। पर पढ़ने वालों को इस क़ायदे की क़तई दरकार नहीं।यह तो एक दिल से दुजे को राह की बात है जब कोई बात दिल को छू जाए तो समझिए ग़ज़ल खुद को बयां करने में कामयाब हुई और आपने उसे कह दिया कि यह कामयाब है।तो इस पर बधाई जाती है नक़्श जी को और तफ़सील से इन पर कहने के लिए शुक्रिया आपको।
अनीता मंडा

अद्भुत, निःशब्द करती आज की प्रस्तुति। क्या गजब का कहन है, क्या रवानी है, एक एक अश्आर वाह वाह निकलवा लेता है खुद ही। बहुत मेहनत की है गजलों पर।

इस क़दर मुख़्तसर ख़ुशी क्यों है,
उम्र बस इसकी दो घड़ी क्यों है।
बहुत खूब!!

कल ये पूछा था मैंने दरिया से,
तेरे होंठो पे तिश्नगी क्यों है।
वाह !!

ज़ख़्म भरता भी है और दर्द भी बढ़ जाता है,
चारागर तू ये मुझे कैसी दवा देता है।

रास्ता देखते रहने की भी हद हो कोई,
कौन से मोड़ पे आके तू सदा देता है।

– भावनाओं की अतिशय गहनता इन अशआरों को बहुत देर तक ज़ेह्न में रखने को मजबूर कर देती है।

मालो ज़र, लालो गौहर और चमकते हीरे,
तुझसे हमदर्दियां माँगी थीं ये क्या देता है ।

– अपने समय की बेचैनियों को दर्ज़ करवाती उम्दा शायरी।

फूस के घर में कैसी दीवाली,
इन दियों को बुझा दिया जाए।
— सामाजिक विद्रूपता ने आक्रोश भी दिया है, इस शेर में वही रंग उभरा है।

अपनी नज़रें न मैं झुकाउंगा,
सर जो जाता है सर चला जाए।
— वाह !!

गले मिलने को जब भी बढ़ते हैं भाई से भाई तो,
हमारे मुल्क की उनको सियासत रोक लेती है।

रवायत और ज़दीदियत का अनोखा संगम है शायर के पास, गज़ल में जो ख़ुश्बू होनी चाहिए वो बरकरार है, बावजूद इसके कि वर्तमान हालात की व्यवस्था की ख़ामियों को भी निशाना बनाया है।
कहन में गहराई है । एकदम साँचे में ढली हुई गज़ल।
मेरी तरफ से नक़्श साहब को बहुत-बहुत मुबारक़ शानदार पोस्ट के लिए।

लता अग्रवाल

जीतेश जी गजलें जीवन के फलसफे कहतीं दरिया होकर भी तिश्नगी लिए बहुत उम्दा गजलें है
नक्श रोकर गया …..रौशनी क्यों है।
मिटती इंसानियत का गम बयान करती , अपनों से दगा, जुल्म सहकर माँ की दुआ, गंभीर बात कही।
हमने देखा ही नहीं……नजरों से गिरा देता है।
करे खिदमत हमेशा ही बेसहारों की कोई मुश्किल जो आती हो इबादत रोक लेती है।
गले मिलने को….सियासत रोक लेती है। सभी शेर बहुत उम्दा बन पड़े हैं । जीवन से जुडी गजलों के लिए जीतेश जी को बधाई ।
सुरभि पाँडे

जीतेंद्र जी के लफ्ज़, ज़रा ढंग से समझने होंगे, बात भी हो, मीटर भी हो और तऱीके का अदब भी हो, तो उसके साथ लापरवाही नहीं की जा सकती।
हमेशा की तरह से कस्तूरी की संयोजना, धन्यवाद कस्तूरी नियम से सर्व करने के लिए
धन्यवाद मोहतरमा और रूपेंद्र राज
आज आपको पूरे दिन औरों के बहाने सुनने का मौक़ा मिलेगा
ज्योति प्रसाद, ग्वालियर

मगर तेरी निगाहों की हिकारत रोक लेती है। ये पढ़ते ही ऐसे अनेकानेक क्षण याद आ गये जिन के कारण न जाने कितनी महफिलें छूट गयी सचमुच जीवंत ‘जीवन के निकटतम गज़ल। आपको ऐसे सुरभित काव्य लेखनी के लिए अनेकानेक आशीर्वाद और बधाई।

सतीशकुमार सिंह
जीतेश राज नक्श की गज़लगोई जिंदगी के तल्ख अहसासों से लबरेज हैं । इन गजलों में गहरी प्रश्नाकूलता के साथ साथ अपने सामायिक परिस्थितियों को उधेड़ने का माद्दा भी है –

गले मिलने को जब बढ़ते हैं भाई से भाई तो
हमारे मुल्क की उनको सियासत रोक लेती है ।

यह बहुत खूबसूरत शेर है । इस गज़ल के सभी मिसरे उम्दा हैं ।

एक लमहा तो वक्त दे ऐसा
नक्श मुझसे मुझे मिला जाए ।

बहुत खूबसूरत मक्ता है । यहाँ नीरज जी याद आते हैं-

अबके सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई
उम्र भर तो हुई गुफ्तगू गैरों से मगर
आज तक न हमसे हमारी मुलाकात हुई ।

जीतेश जी की सभी गजलें सरल सहज रूप में गज़ल की शास्त्रीयता के करीब हैं । अंदाजे बयां भी बेहद चुटीलापन लिए हुए है । बधाई जीतेश जी इन शानदार गजलों को रचने के लिए । इसी तरह डूबकर लिखते रहें यही शुभकामना है ।

वन्या जोशी
नक़्श जी की गज़ल1 सबसे अच्छी लगी !उसका हर शेर उम्दा ! वाह वाह !हुकूमत बेबसों की हर शिकायत रोक लेती है ! या शराफत तो शराफत है ….रोक लेती है ! शरीफ लोग शराफत की गिरफ्त में फंस के रह जाते है और हुकूमती इसका फायदा उठाते हैं !

रूपेन्द्र जी को संचालन की बधाई। आदरणीय सन्तोष जी का बेहद आभारी हूँ कि आज पटल पर मुझ नाचीज़ की तुकबंदियों को स्थान मिला है साथ ही क्षमाप्रार्थी भी हूँ कि व्यस्तताओं के चलते समूह में समय नहीं दे पा रहा हूँ। आदरणीय रूपेन्द्र जी के कुशल संचालन के लिये भी ह्रदय से आभारी हूँ। इस वक़्त सफ़र में हूँ शाम को पुनः समूह में उपस्थित होऊँगा। आप सभी सम्मानित सुधीजनों का ह्र्दयतल से आभार।

जीतेश राज

जीतेश राज जी की गज़लों ने जीवन के सत्यों का पर्दाफाश किया है, प्रेमिका प्रेमी की बातों को परे रख समाज के कुछ ज्वलंत यथार्थ हमारे समक्ष रखें हैं
फूस के घर में कैसी दीवाली
इन दियों को बुझा दिया जाये
आज उनकी गज़लों से पटल रोशन है
गज़ल की मासूमियत और साथ तीखापन दिल पर जरूर असर करता है, शेर बढ़िया लगे खासकर
गले मिलने को जब भी बढ़ते हैं भाई से भाई तो,
हमारे मुल्क की उनको सियासत रोक लेती है,
बहुत बधाई जीतेश जी

ज्योति गजभिये

जीतेश जी क्या खूब लिखा है-
मौत जब चाहे इसे ले जाए,
इतनी बेबस यह जिंदगी क्यों है।
सभी शेर बहुत सुन्दरऔर गहरे अर्थ को व्यक्त कर रहे हैं। दिल से निकले शब्द सीधे दिल में दस्तक दे रहे हैं।
संतोष जी धन्यवाद।
गले मिलने को जब भी बढ़ते हैं भाई से भाई तो,
तो हमारे मुल्क की उनको सियासत रोक लेती है।
फूस के घर में दीवाली कैसी
इन दीयों को बुझा दिया जाए।
वाह!
सामाजिक परिस्थितियों की क्या सही अभिव्यक्ति की है।👌
बधाई एवं शुभकामनाएं आपको।
गीता भट्टाचार्य
जीतेश राज जी की गज़लें
जीतेश जी की गज़लें बेहद उम्दा एवम् नजाकत लिए हुए है ।साथ ही समसामयिक मुद्दो पर देश,समाज और काल पर अपने फन के माध्यम से उन्होंने करारा व्यंग किया है जो काबिले तारीफ है।खुदा उनके फन मे और निखार लाये ।खूब तरक्की करें ।
गीता भट्टाचार्य

आज हम मंच पर आदरणीय जीतेश राज जी की गजलो का आंनद ले रहे हैं। आपकी पहली गज़ल जिन्दगी से रूबरू होती है और स्वयं से प्रश्न करती हुई तो कभी जमाने से… जीवन की कशमश को ब्या करती फिर भी थाह नही मिलती जीवन में… बहुत ही सुंदर जीवन में खुशी को तलाशती हुई
आनंदबाला शर्मा

फूस के घर में कैसी दिवाली,
इन दियों को बुझा दिया जाए।

बहुत खूब जीतेश जी
काव्य कोश
संचालन अप्रतिम
आशा सिंह गौर
जीतेश राज के सीधे सरल शेरों में बहुत गहराई है “जानता हूँ कि वो दग़ा देगा, फिर मेरी उससे दोस्ती क्यों है।” बहुत सुंदर शेर। “हमने देखा ही नहीं …. नज़रों से गिरा देता है।” वाह क्या बात है और कितना बड़ा सच। टूटा भरोसा फिर जीतना बहुत मुश्किल होता है। दिल को छू जाने वाली गज़लें जिनमें प्रेम भी है, धोखा भी है और ज़िंदगी की कई कड़वी सच्चाई भी हैं।
विनीता पंचभाई
जितेश जी की गज़लें पढ़ने का अवसर मिला वीएम एम् का बहुत बहुत आभार,उन्होंने जीवन की सच्चाई को बड़े ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया अपनी बातों को सहज व् सरल ढंग से व्यंगके साथ कैसे अपनी बात कह सकते है गजलो में बखूबी दिखाई देता है ,शायर जी
रत्ना पाँडे
जीतेश राज जी बहुत बहुत खूब

उम्दा शेर बेहतरीन गज़ल
सब के दिल में हुई हलचल

क्या कहूँ कितनी तारीफ़ करूं

जुबां से कुछ कहिए न कहिए
निगाहें बहुत कुछ बयां करती हैं
वाली हालत हो गई मेरी इतनी
बेहतरीन अन्दाज उससे बेहतर अल्फाज बहुत साफगोई के साथ लिखे गए और उतनी ही साफ़गोई के साथ हमारे दिलों के पेबस्त भी हो गए

बहुत बधाई जीतेश जी को
संतोष जी को भी फिर से रत्न तलाशने के लिए
कस्तूरी जी का सुंदर पोस्टर



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