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विश्वास की रक्षा ही रक्षाबंधन

भारतीय परम्परा में विश्वास का बंधन ही मूल है। रक्षाबंधन इसी विश्वास का बंधन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बांधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता, वरन प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बांधने का भी वचन देता है। पहले आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। सूत्र अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र भी व्यक्ति से, समाज से और अपने कर्तव्यों से जोड़ता है।

रक्षाबंधन पर्व पर जहां बहनों को भाइयों की कलाई में रक्षा का धागा बांधने का बेसब्री से इंतजार है, वहीं दूर-दराज बसे भाइयों को भी इस बात का इंतजार है कि उनकी बहना उन्हें राखी भेजे। उन भाइयों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जिनकी अपनी सगी बहन नहीं है क्योंकि मुंहबोली बहनों से राखी बंधवाने की परम्परा भी काफी पुरानी है।

असल में रक्षाबंधन की परम्परा ही उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं। भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो लेकिन उसी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है। इतिहास के पन्नों को देखंे तो इस त्योहार की शुरुआत की उत्पत्ति लगभग छह हजार साल पहले बतायी गई है। कई साक्ष्य भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। रक्षाबंधन का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ है। वह भी तब जब आर्य समाज में सभ्यता की रचना की शुरुआत मात्र हुई थी।

रक्षाबंधन के त्योहार के साथ कुछ ऐतिहासिक प्रसंग भी जुड़े हैं। मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चित्तौड़ के राजा की विधवा थी। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूं को राखी भेजी थी। तब हुमायूं ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था।

इतिहास का एक अन्य उदाहरण श्रीकृष्ण व द्रौपदी को माना जाता है। श्रीकृष्ण भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण के बायें हाथ की अंगुली से खून बह रहा था। इसे देखकर द्रौपदी बेहद दुखी हुई और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर श्रीकृष्ण की अंगुली में बांधा जिससे खून बहना बंद हो गया। तभी श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रौपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में उनका चीरहरण हो रहा था तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई थी।

जैन धर्म में यह पर्व साधना में लीन सात सौ मुनिराजों की रक्षा के साथ जुड़ा है। इसकी कथा भी वामन अवतार की तरह ही है। इसमें मुनिराज विष्णु कुमार वामन का रूप धारण कर राजा बलि से मुनियों की रक्षा करते हैं। इस कथा के अनुसार, अकंपनाचार्य का सात सौ मुनियों का संघ विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुंचा। जिस स्थान पर मुनि साधना कर रहे थे, उसके चारों तरफ रजा बलि ने आग लगवा दी। धुएं से मुनियों के गला अवरुद्ध हो गए, आंखें सूज गई और तेज गर्मी से उन्हें कष्ट होने लगा, लेकिन मुनियों ने धैर्य नहीं छोड़ा। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक यह कष्ट दूर नहीं होगा, तब तक अन्न-जल का त्याग करेंगे। वह श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का ही दिन था। उस दिन मुनियों के संकट दूर करने के लिए मुनिराज विष्णुकुमार ने वामन का भेष धारा किया और बलि से भिक्षा में तीन पैर धरती मांगी। विष्णुकुमार ने अपने शरीर को बहुत अधिक बढ़ा लिया। उन्होंने अपना एक पैर सुमेरू पर्वत पर रखा तो दूसरा पैर मानुषोत्तर पर्वत पर और तीसरा पैर रखने की जगह ही न थी। सर्वत्र हाहाकार मच गया। बलि ने जब क्षमा याचना की, तब जाकर वे पूर्ववत हुए। इस तरह सात सौ मुनियों की रक्षा हुई। सभी ने परस्पर रक्षा करने के लिए बंधन बांधा।

बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है, प्यार के दो तार से संसार बांधा है… सुमन कल्याणपुर द्वारा गाया गाना रक्षाबंधन का बेहद चर्चित गाना है। भले ही ये गाना बहुत पुराना न हो पर भाई की कलाई पर राखी बांधने का सिलसिला बेहद प्राचीन है।

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इन्द्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बांध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। महाभारतकाल में द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण को तथा कुंती द्वारा अभिमन्यु को राखी बांधने के भी वृतांत मिलते हैं।

मुम्बई के कई समुद्री इलाकों में इसे नारियल-पूर्णिमा या कोकोनट-फुलमून के नाम से भी जाना जाता है। श्रावण की पूर्णिमा को समुद्र में तूफान कम उठते हैं और नारियल इसीलिए समुद्र-देव (वरुण) को चढ़ाया जाता है कि वे व्यापारी जहाजों को सुरक्षा दे सकें।

रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। उत्तर भारत में आमतौर पर इसे भाई-बहन के स्नेह व उनके आपसी कर्तव्यों के लिए जाना जाता है। भाई द्वारा बहन की रक्षा और इसके लिए बहन द्वारा भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र या राखी बांधने का रिवाज ही रक्षाबंधन पर्व कहा जाता है। किन्तु यह प्राचीन भारतीय संस्कृति में देश और राष्ट्र की रक्षा, जीवों की रक्षा, समाज व परिवार की रक्षा और भाषा व संस्कृति की रक्षा से भी जुड़ा हुआ है। वर्तमान में रक्षाबंधन के संकल्प को पर्यावरण की रक्षा के साथ भी जोड़कर देखा जा रहा है। कई लोग वृक्षों को राखी बांधकर पर्यावरण के प्रति जागरूकता ला रहे हैं।

रक्षा का संकल्प व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास लाता है। रक्षा करने का भाव ही व्यक्ति को ऊर्जस्वित बना देता है और वह इस ऊर्जा के वशीभूत बड़े से बड़े काम कर जाता है। रक्षा का संकल्प लेने वाला व्यक्ति भले ही शारीरिक रूपरेखा में कमजोर हो, लेकिन वह अंतस की ऊर्जा से ओतप्रोत हो जाता है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले रक्षाबंधन से संबंधित अनेक कहानियां हैं, जो रक्षा करने के भाव से जुड़ी हुई हैं।
प्रेषकः

(बरुण कुमार सिंह)
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ई-मेल: barun@live.in

लेखक परिचयः

विभिन्न सम्प्रदायवाद एवं राष्ट्रवाद पर शोध’: काशी प्रसाद जयसवाल शोध संस्थान, पटना
स्नातकोत्तर (इतिहास): बी. आर. अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर
पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा: महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
स्वतंत्र पत्रकार एवं वेब लेखक, विभिन्न पत्र-पत्रिका व वेबपोर्टल के लिए लेखन।

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