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राजभाषा विभाग द्वारा द्वारा जन शिकायतों पर कार्यवाही न करने के विरुद्ध लोक परिवाद

सेवा में,

श्रीमान् अमित शाह,

माननीय गृहमंत्री, भारत सरकार,

नई दिल्ली

महोदय,

भारत सरकार में राजभाषा की स्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है और यह बात आप भी जानते हैं। उसका मुख्य कारण यह है कि अधिकांश प्रशासनिक अधिकारी राजभाषा हिन्दी के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं। दूसरा कारण है कि राजभाषा विभाग अपने दायित्वों का पालन करने के प्रति सजग नहीं है और न ही विभाग के अधिकारियों में हिन्दी के प्रति उत्साह है। राजभाषा विभाग राजभाषा के नाम पर करदाताओं के धन पर केवल बोझ बन कर रह गया है, देशभर में राजभाषा सम्मेलन व हिंदी सलाहकार समिति की बैठकें केवल और केवल औपचारिकता की पूर्ति करने व बजट को खर्च करने के लिए आयोजित की जाती हैं, इन सम्मेलनों या बैठकों से राजभाषा के कार्यान्वयन में 0.01 वृद्धि भी कभी नहीं हुई है। इसीलिए दक्षिण भारतीय राज्यों की जनता बार-2 राजभाषा के विकास पर खर्च होने वाली इस अरबों रुपयों की राशि पर प्रश्न उठाती है।

राजभाषा के नाम पर करदाताओं के करोड़ों रुपये फूँके जा रहे हैं इसलिए यह शिकायत कर रहा हूँ-

1. राजभाषा विभाग नागरिक चार्टर के अनुसार निर्धारित समय में ईमेल से प्राप्त शिकायतों पर 6-6 महीनों तक कार्यवाही नहीं करता है। अनेक नागरिकों को उनकी ईमेल शिकायतों के उत्तर नहीं दिए जा रहे हैं।

2. राजभाषा विभाग ईमेल शिकायतों का कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखता है जबकि 2012-13 तक इसका पूरा रिकार्ड रखा जाता था और उसे विभाग की वेबसाइट पर प्रकाशित भी किया जाता था। यह व्यवस्था बहाल की जाए।

3. राजभाषा के प्रगामी प्रयोग की तिमाही रिपोर्ट के प्ररूप में से धारा 3 (3) के 14 दस्तावेजों के अलग-2 नामों की सारणी को केवल इसीलिए हटाया गया ताकि विभिन्न विभाग और मंत्रालय झूठे आँकड़े भरते रहें और जनता कभी शिकायत करे भी तो उसे भ्रमित किया जा सके। राजभाषा के प्रगामी प्रयोग की तिमाही रिपोर्ट के प्ररूप में धारा 3 (3) के 14 दस्तावेजों के अलग-2 नामों की सारणी को पुनः शामिल किया जाए ताकि विभिन्न मंत्रालयों व विभागों को हरेक दस्तावेज की अलग-2 संख्या भरने के लिए विवश होना पड़े और निरीक्षण में उस संख्या की भौतिक जाँच का प्रावधान किया जाए।

4. राजभाषा वार्षिक कार्यक्रम पिछले 20 वर्षों से जस का तस है उसमें बदलते समय के हिसाब से कोई सुधार नहीं किया है जिससे यह सिद्ध होता है कि उसमें दिए गए लक्ष्य पूरे किए ही नहीं जा रहे हैं इसलिए उसे और अधिक व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है।

5. राजभाषा के प्रगामी प्रयोग की तिमाही रिपोर्ट के प्ररूप में हिन्दी में प्राप्त ईमेल, लोक शिकायत पोर्टल पर हिन्दी में प्राप्त शिकायतों, हिन्दी में प्राप्त ऑनलाइन आरटीआई के कालम भी जोड़े जाने चाहिए पर राजभाषा विभाग ऐसा करना नहीं चाहता है क्योंकि इनके उत्तर नियम 5 का उल्लंघन करते हुए अंग्रेजी में दिए जाते हैं पर तिमाही रिपोर्ट में इनका कोई उल्लेख नहीं होता है।

6. ई-निविदा लागू होने के बाद कोई भी विभाग या मंत्रालय हिन्दी में निविदाएँ जारी नहीं कर रहा है पर राजभाषा के प्रगामी प्रयोग की तिमाही रिपोर्ट में लिखा जा रहा है कि धारा 3(3) का शत प्रतिशत पालन किया जा रहा है पर राजभाषा विभाग ने इस पर कभी भी आपत्ति नहीं की और न ही इस बात की जाँच की है।

7. राजभाषा के प्रगामी प्रयोग की तिमाही रिपोर्ट के आंकड़ों की सत्यता जाँचने के लिए राजभाषा विभाग को आदेश दिया जाए कि वह नियमित अवधि पर विभिन्न विभागों-मंत्रालयों में उपलब्ध दस्तावेजों का निरीक्षण करे। यह सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि राजभाषा के प्रगामी प्रयोग की तिमाही रिपोर्ट में 70% से लेकर 100% तक फर्जी आँकड़े दिए जाते हैं.

8. राजभाषा विभाग को निर्देश दें कि वह डाक विभाग और रेलवे की भाँति ट्विटर पर जन शिकायतों का निपटान करे।

9. राजभाषा विभाग को निर्देश दें कि वह हर 6 माह में अपने हर अधिकारी के कर्तव्यों व कार्य निष्पादन की जानकारी अपनी वेबसाइट पर अपलोड करे।

10. वस्तु एवं सेवा कर (वसेकर) लागू हुए 5 वर्ष बीत गए पर उसकी निम्नलिखित वेबसाइटें पूरी तरह से अंग्रेजी में बनाई गई हैं

पंजीकरण व ऑनलाइन फाइलिंग वेबसाइट www.gst.gov.in

वस्तु एवं सेवा कर (वसेकर) नेटवर्क वेबसाइट www.gstn.org

राजभाषा विभाग ने एक बार भी इसे केंद्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति में वित्त मंत्रालय के साथ नहीं उठाया है क्योंकि ये लोग जनता का भला चाहते ही नहीं हैं.

11. केंद्रीय हिन्दी समिति की 2011 से 2022 के बीच केवल 2 ही बैठकें हुई हैं, हर वर्ष आयोजित होने वाली इस बैठक को करवाने में राजभाषा विभाग कोई रुचि नहीं लेता है। यह बहुत गंभीर चूक है।

आशा है आप राजभाषा विभाग की कार्य प्रणाली में सुधार के लिए व्यापक कदम उठाएँगे ताकि भारत की हम जैसी गाँवों में रहने वाली जनता पर भारत सरकार के विभाग व मंत्रालय अंग्रेजी न थोप सकें और इससे राजभाषा के नाम पर सरकारी खजाने की लूट पर भी रोक लग सकेगी।

धन्यवाद सहित,

अभिषेक कुमार

ग्राम सुल्तानगंज

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