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आज की राजनीति के ‘बटेर बाबू’

अगर किसी से पूछा जाए की राजनीति क्या है? तो वह राजनीति विज्ञान में पढ़ी हुई कोई ना कोई परिभाषा सुना कर बता देगा कि राजनीति क्या है। परंतु बटेर बाबू का काम ऐसा नहीं है। उनसे अगर कोई बात पूछी जाए तो वे प्रैक्टिकली समझाना अधिक पसंद करते हैं। वैसे उनका तकिया कलाम है- सब राजनीति है भिया! प्रत्येक घटना-दुर्घटना पर लंबी-चौड़ी बहस करने के बाद आप कितना भी नतीजा निकाल लें,बटेर बाबू आखिर में “सब राजनीति है भिया!” कह कर अपना ठप्पा लगा ही देंगे!!

बटेर बाबू का असली नाम क्या है,यह तो उनका आधार कार्ड जाने या राशन कार्ड! शहर के लोग तो उन्हें बटेर बाबू के नाम से ही जानते हैं। किसी के यहां शुभ-अशुभ कोई भी कार्य हो,बटेर बाबू अगर उसे किसी भी एंगल से जानते हैं तो बगैर बुलाए हाजिर हो जाएंगे और सिर्फ हाजिर ही नहीं,पूरे मनोयोग से कार्य में हाथ भी बटाएंगे,आप कहे या ना कहे वे काम में ऐसे जुट जाएंगे जैसे सारी जवाबदारी आपने उन्हें ही सौंप रखी हो! इसीलिए शहर के लोग उन्हें उस वक्त बड़ी शिद्दत से याद करते हैं जब वे किसी कार्यक्रम में दिखाई ना दें। शहर में कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम हो बटेर बाबू उस कार्यक्रम में ना हो ऐसा हो नहीं सकता उनकी वेशभूषा, एक अदद् कुर्ता पाजामा,गले में गमछा और पैरों में चप्पल। ठंड का मौसम हो तो जैकेट और शाल भी जोड़ लें। आर्थिक रूप से ठीक-ठाक बाप दादा की छोड़ी हुई दौलत और 20 25 किराएदारों वाली बड़ी सी चाल से आने वाला किराया भरण पोषण के लिए पर्याप्त है।

शादी उन्होंने की नहीं, घर में तीन भाई और उनके बच्चे हैं। बटेर बाबू कब सोते हैं कब जागते हैं यह एक पहेली से कम नहीं, देर रात तक चलने वाले कवि सम्मेलन में भी वे दिखाई देंगे और अगली सुबह तरोताजा किसी प्रभात फेरी में भी उन्हें देखा जा सकता है! हंसमुख सदाबहार हर विषय में पारंगत बटेर बाबू जैसी शख्सियत दुर्लभ है! शहर के बड़े से बड़े रईस के बंगले से लेकर झोपड़पट्टी तक एक समान पकड़ रखने वाले अजूबा हैं वे! प्रवचन के पंडाल में भी वे दिखाई देंगे तो देर रात किसी बार में मदिरापान करते हुए भी!! किसी दंगे किसी पंगे से वैसे तो वे दूर ही रहते हैं लेकिन किसी भी विषय पर बहस के दौरान उनका तकिया कलाम “सब राजनीति है भिया!” इसका कोई जवाब नहीं बटेर बाबू के पास एक,दो पहिया वाहन भी है जिसे उन्हें चलाते किसी ने नहीं देखा,जब भी देखा ,उस वाहन पर पीछे बैठे ही देखा है।

गाड़ी हमेशा उनके एक किराएदार का लड़का जिसे वे “बारिक” कह के पुकारते हैं चलाता है।देखा जाए तो अधिकांश जगहों पर वे और बारीक साथ साथ ही दिखाई देते हैं। एक दिन किसी बहस के दौरान जैसे ही बटेर बाबू ने अपना तकिया कलाम “सब राजनीति है भिया!” दोहराया तो बारिक पूछ बैठा “भैया यह राजनीति क्या है?” सिर्फ पूछा होता तो कोई बात नहीं होती,पर… बारिक पता नहीं किस तरंग में था वह तो पीछे ही पड़ गया- “बताओ ना भिया! ये राजनीति क्या है? ” बटेर बाबू ठहरे प्रैक्टिकल इंसान,उन्होंने भी तैश में आकर कह दिया “कल तुझे बताऊंगा कि राजनीति क्या है” इसके फौरन बाद पत्रकार वार्ता बुलाकर बटेर बाबू ने शहर के मध्य से कलाली हटाओ के मुद्दे पर एक दिन के अनशन की घोषणा कर दी।अगले दिन दोपहर तक कलाली के सामने बकायदा तंबू तान कर बटेर बाबू और बारीक एक दिन के अनशन पर बैठ गए। बटेर बाबू की लोकप्रियता कोई कम न थी, पाँच- पचास फूल मालाएँ उनके गले में प्रशंसकों ने पहना दी और जोरदार तकरीरे भी हो गई, शाम ढलते-ढलते कुछ फुरसतिये,बटेर बाबू और बारीक ही तंबू में बचे थे। उतरते नवंबर का महीना था रात के ग्यारह बजते बजते फुरसतिये भी धीरे-धीरे खिसकने लगे थे। बारह बजते-बजते तंबू में बस बटेर बाबू और बारीक रह गये थे। रजाई इत्यादि का इंतजाम पहले से किया हुआ था,बटेर बाबू ने बारीक से कहा- “टेंट की लाइट बंद कर दे और आगे से कनात लगा दे।” बारीक भी भूख से निढाल थक चुका था। उसने फौरन हुक्म की तामील की और रजाई ओढ़ कर सोने की कोशिश करने लगा। पर पेट में तो चूहे गुलामडण्डा खेल रहे थे! नींद कहां से आती, बटेर बाबू ने धीरे से कहा “क्यों रे बारीक भूख लग रही है?”बारीक बोला “हां भैया” बटेर बाबू बोले “जा मेरी गाड़ी की डिक्की में से झोला ले आ।” बारीक बोला.. ” झोला?” … “हाँ झोला,…जितना कहता हूं उतना कर”…बटेर बाबू थोड़ा तैश में आकर बोले।

गाड़ी टेंट के ही एक कोने में रखी थी,बारीक गया और झोला लेकर आ गया झोले में पैक किए हुए आलू के पराठे रखे थे और और एक अदद् अंग्रेजी शराब का पाव रखा था। बटेर बाबू ने अधलेटी अवस्था में रजाई औढ़े हुए ही पाव का ढक्कन खोला और गट-गट तीन-चार घूँठ हलक के नीचे उतार कर पाव बारीक की ओर बढ़ा दिया। बारीक ने भी आव देखा न ताव फटाफट तीन-चार घूँठ पी लिये। फिर बटेर बाबू ने आलू के पराठों से आवरण हठाया और बारीक को खाने का इशारा कर अधलेटी अवस्था में ही खाने लगे। बारीक भी चुपचाप पराठे चबाने में जुट गया। पराठे खाने के दौरान दोनो ने बारी-बारी से बचा हुआ पाव भी उदरस्थ कर दिया था। बटेर बाबू ने झोला और खाली पाव वापस गाड़ी की डिक्की में रखने का इशारा किया। बारीक चुपचाप उठा और यह काम कर आया। नशे का सुरूर दोनो पर हावी हो चुका था,अपनी-अपनी रजाई दोनो गर्दन तक तानकर एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराये, लगभग डेढ़ बजने को थी बटेर बाबू बोले- “क्यो रे अब समझ में आया कि राजनीति किसे कहते हैं या और समझाऊँ? ”

बारीक खिलखिलाकर हँसने लगा और बोला- “अरे नहीं भिया! …अब तो अच्छी तरह से समझ में आ गया कि राजनीति किसे कहते हैं!!”
दोनो जोर-जोर से हँसने लगे और हँसते-हँसते करवट बदलकर सो गये।

(लेखक कवि व्यंग्यकार हैं व समसामयिक साहित्यिक व राजनीतिक विषयों पर नियमित रुप से लिखते रहते हैं)



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