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गुणवत्ता एक अंतहीन प्रक्रिया और उत्कृष्टता आदत का एक अहम हिस्सा है – डॉ. चन्द्रकुमार जैन

राजनांदगांव। शिक्षाविद, सतत सृजनरत प्रखर वक्ता और दिग्विजय कालेज के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ.चंद्रकुमार जैन ने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर केंद्रित सेमीनार में प्रभावी भागीदारी की। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मसला इन दिनों कुछ ज्यादा चर्चा में है। गुणवत्ता में सुधार के लिए दबाव के चलते संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा का माहौल है। उधर सरकारी विश्व विद्यालयों और कॉलेजों में ग्रेडिंग को लेकर जद्दोजहद का जोरदार दौर चल रहा है। मूल्यांकन में खरा उतरने के लिए संस्थाओं में बहुआयामी आयोजनों का सिलसिला चल पड़ा है।

डॉ. जैन ने वेब सेमीनार में चुनिंदा शिक्षाविदों के साथ रायशुमारी करते हुए कहा कि गुणवत्ता और उत्कृष्टता कोई घटना नहीं बल्कि सतत चलने वाली प्रक्रिया का दूसरा नाम है। गुणवत्ता तो आदत में शुमार होती है। वह आपकी गतिविधि का अभिन्न हिस्सा होती है। आपके कार्यों में आपकी प्रतिभा, योग्यता और प्रभाव से ही गुणवत्ता का निर्धारण होता है। संसाधनों से उसे सहारा मिलता है।

डॉ. चंद्रकुमार जैन ने सुझाव दिया कि उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षक अपने ज्ञान को अपडेट करते रहें तभी पढ़ाई का स्तर ऊपर उठ सकता है। कई कोर्स परम्परागत ढांचे के हैं, जिनमें आज की पीढ़ी की दिलचस्पी कम होती है। विज्ञान विषयों के अलावा अन्य कला एवं वाणिज्य विषयों के पाठ्यक्रम समय-समय पर नवीनीकृत न होने के कारण महत्त्व खो देते हैं। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि एक ही पाठ्यक्रम लगातार 5-10 वर्षो तक और कभी-कभी उससे भी ज्यादा दुहराया जाता है जिसका दुष्प्रभाव यह होता है कि न तो शिक्षकों की रूचि उसमें बनी रहती है और न ही छात्रों का मन उनकी ओर आकर्षित होता है।

लिहाज़ा, डॉ. जैन ने कहा कि पाठ्यक्रम को सैद्धान्तिक की अपेक्षा व्यावहारिक अधिक बनाया जाना चाहिए। जिससे नीरसता का अन्त हो एवं छात्र महाविद्यालयों मे आकर कुछ नया सीख सकें। इसके साथ ही छात्रों का साक्षात्कार भी समय-समय पर हो जिससे उनकी क्षमता एवं समस्याओं का ज्ञान हो सकें एवं उनमें आत्मविश्वास का विकास हो।

डॉ. जैन ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति की अर्न्तनिहित शक्तियों का सर्वांगीण विकास करना है। उसे अपनी आजीविका अर्जित करने में सक्षम बनाना है। गुणवत्ता का फलसफा अगर इस मोर्चे पर सफल होता है तो सचमुच बड़ी बात होगी। आज उसे तकनीक के नए आयामों के साथ आगे बढ़ना है तो दूसरी तरफ शिक्षा के बुनियादी मूल्यों की गरिमा बनाये रखने की चुनौती भी मुंह बाए खड़ी है।

गुणवत्ता कोई मंज़िल नहीं, एक जरूरी जिम्मेदारी ही है। हम याद रखें कि विद्यार्थी तो गुणवत्ता के उपभोक्ता है, गुणवत्ता नहीं होगी तो उसके उपभोक्ता भी नदारद रहेंगे और जहां वह है, वहां ये आज भी बरामद है।