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अपने बचपन का स्कूल बचाने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी

सरकारी नौकरी का मोह किसे नहीं होता, और एक आम मध्यमवर्गीय परिवार के लिए तो सरकारी नौकरी किसी वरदान से कम नहीं। लेकिन कोई व्यक्ति अपनी सरकारी नौकरी को इसलिए छोड़ देता है कि जिस स्कूल में वह बचपन में पढ़ा है और जिस स्कूल की वजह से उसे सरकारी नौकरी मिली है, तो उस स्कूल में मिले संस्कारों और उस स्कूल के प्रति उस आस्था का अंदाजा आप सहज ही लगा सकते हैं।

मुंबई से मात्र 200 किलोमीटर दूर मुंबई के सबसे कुपोषित जिले पालघर के वनवासी क्षेत्र में स्थित मानगाँव में पार्वतीबाई जसुमल ठाकर वनवासी विद्यालय के प्राचार्य श्री यशंवत राघौ वाटस के इसी लगाव की वजह से आज इस विद्यालय में 600 आदिवासी बच्चे पढ़ भी रहे हैं और यहाँ छात्रावास में उनके रहने की भी व्यवस्था है। इस स्कूल के आसपास के 50-60 किलोमीटर के क्षेत्र में आदिवासी बच्चों के लिए ऐसा कोई स्कूल नहीं था जहां गरीब आदिवासी अपने बच्चों को पढ़ने भेज सकें। आज प्राचार्य वाटे की वजह से इस स्कूल में दसवीं तक की पढ़ाई होती है और स्कूल से निकले छात्र कई जगह नौकरी कर रहे हैं। श्री वाटस खुद इस स्कूल में 1972 में एक छात्र के रूप में पढ़ने आए थे और पढ़ाई के बाद उन्हें पास ही सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी भी मिल गई थी। लेकिन इसी बीच उनका ये स्कूल संकट में आ गया। ढंग से पढ़ाई न होने और देखरेख न होने की वजह से स्कूल में नाममात्र के बच्चे रह गए। इस पर स्कूल के ट्रस्टियों ने वाटे जी से अनुरोध किया कि वे जैसे भी हो इस स्कूल को बचाएँ, क्योंकि इस स्कूल से आसपास के 50-60 किलोमीटर क्षेत्र में फैले गरीब आदिवासी बच्चों का भविष्य जुड़ा था।

वाटस साहब ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और सरकारी नौकरी छोड़कर इस स्कूल में अपनी सेवाएँ देने लगे। उनको इस स्कूल में पढ़ाते हुए 35 साल हो गए हैं और आज वे इस स्कूल के प्राचार्य हैं। उनके साथ 26 शिक्षकों व कर्मचारियों का स्टाफ है जो दिन-रात इस स्कूल और बच्चों को सँवारने में लगा रहता है। ये श्री वाटे की कोशिशों की ही फल है कि 20 एकड़ क्षेत्र में फैला ये स्कूल चारों ओर से हरा भरा है और स्कूल के छात्रावास में 411 बच्चों के रहने की सुविधा है।

ये वाटस साहब की सेवाओं का ही परिणाम है कि इस स्कूल को कुल 11 पुरस्कार मिल चुके हैं और राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

इस स्कूल को मुंबई के श्री भागवत परिवार ने गोद लिया है और श्री भागवत परिवार के मार्गदर्शक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक के सान्निध्य में समय समय पर इस स्कूल में आकर स्कूल की समस्याओं का निराकरण करते हैं। पूज्य भाई श्री रमेश भाई ओझा की पहल पर उनके एक भक्त ने पानी की सुविधा उपलब्ध कराई है। रोटरी क्लब ने शौचालय व स्नानगृह की सुविधा उपलब्ध कराई है।

ये श्री वाटस साहब का ही पुरुषार्थ है कि वे इस स्कूल में पढ़ रहे आदिवासी बच्चों को किसी तरह की असुविधा व हीन भावना ना हो इसके लिए हर तरह की सुविधाएँ उपलब्ध करवाते हैं। लेकिन स्कूल में आज भी गरीब आदिवासी बच्चियों को नीचे चटाई बिछाकर सोना पड़ता है। बच्चियों के सोने के लिए गादियाँ तक नहीं है। अपने घरों में अभावों में रहने वाले इन गरीब आदिवासियों बच्चों के लिए स्कूल की छत ही किसी वरदान से कम नहीं।

कोरोना की वडह से हुए लॉकडाउन में स्कूल में बच्चे नहीं आ पाए, लेकिन स्कूल के समर्पित शिक्षकों ने तय किया कि वे गाँव गाँव जाकर इन बच्चों को पढ़ाएँगे और उनका साल बर्बाद नहीं होने देंगे। आज जब स्कूल बंद है और सभी शिक्षक शिक्षिकाएँ आसपास के गाँवों में जाकर इन छात्र-छात्राओं को पढ़ा रहे हैं।

श्री भागवत परिवार के मार्गदर्शक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक जी के प्रयास से विगतपाँच वर्षों से इस स्कूल के बच्चों को दिवाली की छुट्टियों के पहले मिठाई दी जाती है। इस बार स्कूल में बच्चों के नहीं होने के बावजूद श्री वीरेन्द्र याज्ञिक व श्री सुभाष चौधरी 600 बच्चों को लिए मिठाई लेकर स्कूल गए और वहाँ आए बच्चों व उनके माता-पिता को मिठाई प्रदान की। जो बच्चे नहीं आ पाए थे उनको मिठाई भिजवाने की जिम्मेदारी स्कूल के शिक्षक शिक्षिकाओँ व कर्मचारियों ने ली।

हर बार जब बच्चे दिवाली की छु्ट्टियों में अपने घर जाते हैं त इस स्कूल का माहौल आपकी संवेदना और भावनाओँ को झकझोर देता है। स्कूल में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चों के पास न जूते होते हैं न चप्पल। 50 से 60 किलोमीटर दूर से पैदल आने वाले उनके माता-पिता या भाई बहन में भी अधिकांश नंगे पैर ही आते हैं। लेकिन इतने अभावों व मुश्किलों के बावजूद इन बच्चों और इनके माता-पिताओं के चेहरे पर जो सुकुन, आश्वस्ति और कृतज्ञता का भाव रहता है वो आप किसी शहरी व्यक्ति को सोने से भी तौल दें तो नहीं आ सकता।

बच्चों में अनुशासन इतना कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। 600 बच्चों को मिठाई और उपहार बाँटे जाते हैं, लेकिन अपने शिक्षक की एक आवाज पर सभी बच्चे पंक्तिबध्द होकर किसी मौन साधक की तरह बैठ जाते हैं। आखरी पंक्ति में खड़ा छोटा बच्चा भी पूरे अनुशासन और अहोभाव के साथ अपनी बारी का इंतज़ार करता है। मिठाई का एक छोटा सा डिब्बा और छोटा सा उपहार पाकर ये बच्चे अपने आपको दुनिया का सबसे खुशकिस्मत बच्चा समझकर जिस भाव से अपने चेहरे से प्रसन्नता और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं वो देखकर ऐसा लगता है मानो उन्हें कोई बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो।

श्री वाटस की हार्दिक इच्छा है कि गाँवों के प्रतिभावान बच्चों के लिए कौशल विकास व आधुनिक सुविधाओँ से युक्त एक और स्कूल की सुविधा दी जाए ताकि बच्चों को दूर दूर से पैदल चलकर स्कूल ना आना पड़े। श्री भागवत परिवार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उनका ये संकल्प भी शीघ्र ही पूरा करेंगे।

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