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रेल इंजीनियरों ने किया कमालः 40 दिन गहरे पानी में जाकर अंग्रेजों के जमाने के पुल की मरम्मत की

बिलासपुर। रेलवे अधिकारियों की सतर्कता से अंग्रेजों के शासनकाल में बना हसदेव रेल पुल गिरने से बच गया। पानी के तेज बहाव से पुल के कई पिलर खोखले हो गए थे। इससे बड़ा हादसा हो सकता था। सिविल इंजीनियर एक्सपर्ट टीम ने छह मीटर गहरे पानी के अंदर जाकर क्षतिग्रस्त पुल को 40 दिन में सुधारकर रिकॉर्ड कायम किया है।

हावड़ा-मुंबई रेलखंड में हसदेव नदी पर 1890 में अंग्रेजों ने रेल पुल का निर्माण किया था। 125 वर्ष से भी पुराना हसदेव रेल पुल में आज भी रेल यातायात जारी है। रेलवे में पानी के अंदर रेल पुल की स्थिति का नियमित निरीक्षण किया जाता है।

अप्रैल में इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों ने हसदेव नदी पर बने तीनों रेल पुल के पिलर का निरीक्षण किया। इसमें अधिकारियों ने पाया कि पानी के बहाव बदलने से डाउन लाइन के पुल के पिलर के नीचे की मिट्टी बहने के साथ इसके कांक्रीट भी बह गई थी। पिलर खोखले होकर कमजोर हो गए थे।

यह स्थिति पानी के अंदर डूबे सभी पिलर में थी। लोड गाड़ी के दबाव से पुल कभी भी ध्वस्त हो सकता था। इस पुल में हावड़ा की ओर जाने वाले यातायात के दबाव को देखते हुए निरीक्षण टीम ने उच्च अधिकारियों को इसकी सूचना देकर इस पुल को यात्री गाड़ी चलाने पर रोक लगाने रिपोर्ट दी।

इसके बाद अधिकारियों ने हसदेव डाउन लाइन पुल को यात्री गाड़ी व लोड मालगाड़ी चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस पुल से सिर्फ खाली मालगाड़ी को 10 किलो मीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलाने की अनुमति दी गई। साथ ही सुधार कार्य प्रारंभ किया गया।

सिविल इंजीनियरिंग विभाग के पानी के अंदर जाकर काम करने वाली विशेष टीम को लगाया गया। इनके गोताखोर छह मीटर गहरे पानी के अंदर जाकर 40 दिन से भी कम समय में क्षतिग्रस्त सभी पिलर को सुधार का काम पूरा कर नया रिकॉर्ड कायम किया है।

आसान नहीं था काम

पानी के अंदर क्षतिग्रस्त हुए पिलर को सुधारना आसान नहीं था। बरसात से पहले इसे पूरा करना था। सुधार के लिए बाहर के फर्म को काम दिया गया था। गहरा अधिक होने से गोताखोरों की टीम ऑक्सीजन मॉस्क लगाकर पानी के अंदर जाते थे। सबसे पहले बोल्डर डालकर पानी के बहाव का रास्ता बदला गया। इसके बाद खोखले हुए पिलरों में कांक्रीट किया गया।

इस पूरे कार्य के दौरान इंजीनियर पानी के अंदर कैमरा लेकर उतरते थे। कैमरे से अंदर की तस्वीर बाहर लगी स्क्रीन में भेजा जाता था। कार्य के दौरान समय समय पर जोन के महाप्रबंधक सुनील सिंह सोइन, डीआरएम आर राजगोपाल एवं इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारी लगातार मॉनिटरिंग कर रहे थे। आठ जून तक इस कार्य को पूरा करना था लेकिन अधिकारियों ने दो दिन पहले ही काम पूरा कर पुल को यातायात के लिए खोल दिया।

बोर्ड को रोज भेजी जा रही थी रिपोर्ट

काम के दौरान रेलवे बोर्ड को कार्य प्रगति की जानकारी, फोटोग्राफ भेजी जा रही थी। इसके अलावा जोन के अधिकारी पल-पल की निगरानी रखे हुए थे। अधिकारी पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद पुल में गाड़ियों को पूरी गति से चलाने की अनुमति दी है। इससे पूर्व डाउन लाइन में जाने वाली गाड़ियों को नैला के बाद मध्य लाइन से चलाई जा रही थी। नैला में लाइन बदले जाने के कारण परिचालन भी आंशिक रूप से प्रभावित हो रही थी।

जोन का पहला सबसे बड़ा काम

बिलासपुर रेल मंडल के चांपा-कोरबा के बीच एक रेल पुल क्षतिग्रस्त हुआ था। इसके अलावा कोरबा-गेवरारोड के बीच हसदेव में रेल पुल टूटने की घटना हुई। दोनों ही मामले में क्षतिग्रस्त पुल को सुधारने का कार्य लगभग डेढ़ माह में पूरा किया गया था।

इस मामले में अधिकारियों ने समय से पहले ही पुल के कमजोर होने की जानकारी लगाई व तत्काल काम प्रारंभ कर तय समय से पहले काम पूरा किया गया। जोन का यह पहला बड़ा काम है, जिसमें गहरे पानी के अंदर जाकर क्षतिग्रस्त पुल के पिलरों को सुधारा गया है।

नैला-चांपा के बीच हसदेव नदी की डाउन लाइन पुल के पिलर पानी के बहाव की दिशा बदलने से क्षतिग्रस्त हो गए थे। एक नहीं कई पिलर कमजोर हो गए थे। पानी के अंदर निरीक्षण करने वाली टीम ने जांच के दौरान खराबी का पता लगाया। इसके बाद इसे सुधार लिया गया। – डॉ.पीसी त्रिपाठी, डीजीएम व सीपीआरओ दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे

साभार- https://naidunia.jagran.com से



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