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मुंबई रेलः मुंबई की धड़कनों को सुनने और समझने की ज़रुरत

सुचेता दलाल पत्रकारिता के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है जिनके नाम की वजह से देश की पत्रकारिता को गौरव और सम्मान की नज़रों से देखा जाता है। आज जहाँ खबरिय़ा चैनल को गला पाड़ू और कान फोड़ू एंकर रिपोर्टर किसी मदारी और बंदर के तमाशे का लाईव शो करते दिखाई देते हैं, वहीं सुचेता दलाल आज भी अपनी धारदार लेखनी से करोड़ो-अरबों का घोटाला करने वालों कॉर्पोरेट हाउसों, मंत्रियों, नेताओं और सत्ता के दलालों के गोरखधंधों की पोल खोलती रहती है, मुकदमेबाजी का सामना करना रहती है मगर अपनी कलम की धार कम नहीं होने देती। हर्षद मेहता द्वारा किए गए देश के सबसे बड़े शेअर घोटाले को उजागर करने का श्रेय भी सुचेता दलाल को ही जाता है।

 
सुचेता दलाल द्वारा स्थापित मनी लाईफ फाउंडेशन http://foundation.moneylife.in/ विगत कई वर्षों से मुंबई में ऐसे कार्यक्रमो का आयोजन कर रहा है जिसके माध्यम से सरकारी तंत्र से लेकर बैंकों, इंश्युरेंस कंपनियों की लूट खसोट के शिकार आम लोगों को जागरुक कर उन्हें उनके अधिकार हासिल करने के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है।  http://foundation.moneylife.in/ के आयोजन में शामिल होने वाले लोगों में बैंकिंग की दुनिया से लेकर कॉर्पोरेट की दुनिया के दिग्गज तो होते ही हैं राजनीतिक क्षेत्र के दिग्गज लोग भी इस मंच पर आकर अपनी बात कहने में गर्व महसूस करते हैं। http://foundation.moneylife.in/ की सफलता के ऐसे सैकड़ों किस्से हैं, http://foundation.moneylife.in/moneylife-impact/ जो कॉर्पोरेटी लूट-खसोट के शिकार लोगों के लिए राहत लेकर आए हैं। आज अगर मुंबई में होने वाले किसी भी आयोजन में भागीदारी करने वाले श्रोताओं के बौध्दिक स्तर के हिसाब से तुलना की जाए तो मनी लाईफ को कार्यक्रम में सेवा निवृत्त उच्च अधिकारियों लसे लेकर आरटीआई के विशेषज्ञ, समाज में बरसों से जनहित के लड़ रहे लोग और अपने-अपने क्षेत्र के ऐसे दिग्गज शामिल होते हैं जो कुर्सी पर बैठे मूढ़ अधिकारियों, मंत्रियों और नेताओं से लाख गुना बेहतर सोच, समझ और दूरदृष्टि रखते हैं।
 
 
मुंबई की धड़कन मुंबई की लोकल रेल से जुड़ी समस्याओं और इसमें सुधार की संभावना को लेकर इस बार आयोजित कार्यक्रम में मुख्य वक्ता थे, मुंबई मिरर के पत्रकार और भारतीय रेल के इतिहास पर किताब हाल्ट स्टेशन्स इंडिया लिखने वाले राजेंद्र अकलेकर। दो घंटे चले इस कार्यक्रम में वक्ता और श्रोताओं का संवाद भारतीय रेल के सुनहरे अतीत से लेकर इसके राजनीतिकरण और आज के दौर की बदहाली पर रोचक संवाद हुआ।
 
संवाद का विषय थाः “रोमांस ऑप दे रेल्वेज़ः द चैंजिंग फेस ऑफ रेल्वे ऐंड अवर रिच रेल्वे हिस्ट्री” –इस विषय पर जब श्री राजेंद्र अकलेकर ने कहा, भारतीय रेल्वे आज अपनी गौरवशाली यात्रा के 162 वर्षों में ऐसे कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, जो कल्पना के भी बाहर की बात है। आज, हमारे पास हम मेट्रो, मोनोरेल जैसे साधन भले ही हो गए हैं, लेकिन रेल्वे हमेशा की तरह हर मामले में आगे ही रहेगी, क्योंकि आम आदमी के लिए ये यात्रा का सबसे सस्ता साधन बनी रहेगी।
 
 
मुंबई की चर्चा करते हुए श्री अकलेकर ने कहा, मुंबई रेल का पूरा ढाँचा अपनी क्षमता के बाहर जा चुका है। मुंबई के लिए उपनगरीय रेल की ज़रुरतें देश के अन्य शहरों से एकदम अलग है। हालाँकि यहाँ दो रेल्वे डिविज़न हैं, पश्चिम और मध्य रेल्वे, लेकिन हर छोटी से छोटी बात के लिए दोनों को दिल्ली से मंजूरी लेना पड़ती है। ये पूरी व्यवस्था बदलने की ज़रुरत है और मुंबई को एक संपूर्ण, व्यवस्थित स्थानीय स्त पर काम करने वाले रेल कॉर्पोरेशन की ज़रुरत है। कार्यक्रम में मौजूद सभी सुधी श्रोताओं ने इस सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि ये माँग केंद्रीय रेल मंत्री के सामने रखी जानी चाहिए।
 
 
आज मुंबई लोकल ट्रैन से प्रतिदिन 75 लाख लोग यात्रा करते हैं। हर कोई जल्दी में होता है और उसे इस बात का एहसास ही नहीं होता है कि वह देश की सबसे पुरानी रेल लाईन पर यात्रा कर रहा है। मुंबई भारतीय रेल का ग्राउंड ज़ीरो है, और इसी जगह से भारतीय रेल्वे का ऐतिहासिक किस्सा शुरु हुआ है। श्री अकलेकर ने कहा, मैने अपनी किताब 'हाल्ट स्टेशन्स इंडिया' में रेल्वे से जुड़े कई रोमांचक किस्सों को समेटा है कि कैसे रेल्वे के मूल नेटवर्क का विस्तार होता गया, देश की पहली रेल कैसे अस्तित्व में आई, फिर इसके बाद रेल कैसे इलेक्ट्रिक लाईन के आने के साथ मुंबई की लोकल रेल का चेहरा बदल गया।
 
 
श्री अकलेकर को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने मुंबई मिरर में पत्रकारिता करने के साथ ही भारतीय रेल के ऐतिहासिक तथ्यों, घटनाओं और चित्रों और दस्तावेजों के साथ मुंबई में रेल्वे गैलरी स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।  इसके साथ ही उन्होंने मुंबई के ऐतिहासिक अतीत से जुडी प्रतिष्ठित परियोजनाओं और शहर की प्राचीन इमारतों को बचाने में भी अपना योगदान दिया है।
 
 
अपनी चर्चा की शुरुआत में श्री अकलेकर ने रेल्वे से जुड़े एक से एक रोमांचक और मजेदार तथ्यों के साथ श्रोताओं को रोमांचित कर दिया। उन्होंने बताया कि आज का मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जो अब तक विक्टोरिया टर्मिनस के रूप में जाना जाता रहा है, 200 साल पहले ये जगह फाँसी तालाब के नाम से जानी जाती थी। जिस जगह पर आतंकवादी अज़मल कसाब और इस्माईल खान गोलियाँ चला रहे थे उस जगह पर 200 साल पहले मौजूद तालाब में अपराधियों और हत्यारों को सार्वजनिक रूप से प्रताडित कर उन्हें फाँसी दी जाती थी। इस जगह  पर कई ऐसी मशीनें थी, जिनकी मदद से गाय का गोबर अपराधियों के मुँह पर फेंका जाता था। एक ऐसा घूमने वाला पिंजरा भी होता था जिसमें अपराधियों को बंद कर दिया जाता था। इस जगह को तब फाँसी तालाब के नाम से जाना जाता था, लेकिन 1860 में बाँबे के गवर्नर ने फाँसी की जगह को डोंगरी स्थानांतरित कर दिया।
 
 
रेल्वे के विकास की चर्चा करते हुए श्री अकलेकर ने कहा, तब बाँबे में रेल्वे लाईन कोलाबा से बेलार्ड पीअर तक और चेंबूर से अंधेरी रेल्वे लाईन और ट्राम सेवाएँ थी जो कुर्ला, कलिना से गुजरते हुए बाँबे के पूर्व और पश्चिम दोनो को जोड़ती थी। लेकिन जैसे जैसे विकास के लिए ज्यादा जमीन की ज़रुरत पड़ने लगी ये सुविधाएँ खत्म कर दी गई।“
 
 
श्री अकलेकर ने बताया कि कोलाबा स्टेशन 1873 में शुरु किया गया था और 1930 में इसे बॉंबे रिक्लेमेशन परियोजना के लिए बंद कर दिया गया। बेलार्ड पीअर स्टेशन से पंजाब मेल छूटता था जो कराची तक जाता था। लेकिन 1940 में इसे बंद कर दिया गया क्योंकि भारतीय नौसेना को इस जमीन की ज़रुरत थी।
 
 
उन्होंने बताया कि मुंबई के यातायात के एक और बेहद लोकप्रिय माध्यम ट्राम सेवाओं के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। ट्राम सेवा शुरु करने का पहला प्रस्ताव 1865 में आया था और इसे बॉंबे हॉर्स रेल्वे कंपनी नाम दिया गया था। लेकिन अमरीकी गृहयुध्द शुरु हो जाने की वजह से ये योजना अस्तित्व में नहीं आई। ट्राम सेवाओं की शुरुआत 1874 में कोलाबा और पायधुनी के बीच हुई थी। इसके बाद 1926 में  बाँबे में पहली बार बस आई। 1952 में हुए एक सर्वे में ये बात सामने आई कि बस सेवाओं का विस्तार हो रहा है और इसके लिए ट्राम अड़चन पैदा करती है। 31 मार्च 1964 को यानी आज से 90 साल पहले बोरी बंदर और दादर के बीच आखरी ट्राम चली थी।”
 
 
 
अगर उस समय हमने ट्राम जैसी सेवाओं में समय के हिसाब से सुधार किया होता तो मुंबई आज एक अलग शहर होता। आज मुंबई में 15 लाख वाहन हैं, और प्रतिदिन 500 नए वाहन सड़क पर आ जाते हैं। जबकि आज भी मुंबईके पश्चिमी और पूर्वी भाग में जाना दुष्कर है।“

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