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रेल्वे को नई रफ्तार देंगे मालवाहक डिब्बे

रेलवे का कायापलट करने के दौरान नए डिजाइन और तकनीक वाले मालढुलाई वाले डिब्बे पर भी जोर दिया जाना चाहिए। इसकी अहमियत विस्तार से बता रहे हैं विनायक चटर्जी

भारतीय रेल से सफर करने वाले यात्रियों को अब पहले से अधिक सुविधाएं मिल रही हैं। ट्रेनों के डिब्बों का डिजाइन बेहतर हुआ है, रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाली सुविधाएं भी बढ़ी हैं और ट्रेनों की रफ्तार भी बढ़ गई है। बुलेट ट्रेन चलाने की घोषणा ने तो उम्मीदों को उड़ान देने का काम किया है। स्पेन में बने टेल्गो कोच के परीक्षण का भी जोर-शोर से प्रचार किया गया। इंटीग्रल कोच फैक्टरी में बने रेल कोच की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित एवं बेहतर लिंक-हॉफमैन-बुश (एलएचबी) कोच का इस्तेमाल होने से रेल यात्रा का अनुभव भी बेहतर होता नजर आ रहा है।

लेकिन खिड़कियों के पास बैठने वाले यात्रियों को अब भी बगल की पटरियों पर दौड़ती मालगाड़ी का पुराना रूप ही देखने को मिलता है। इन मालगाडिय़ों में लगे वैगन ऊपर से खुले या बंद होते हैं और सबसे आखिर में गॉर्ड की वैन होती है। इन्हें देखने पर यही लगता है कि दशकों से मालगाड़ी का रूप और अंदाज ही नहीं बदला है। खुले वैगन में कोयला ढोने से वायु प्रदूषण होने को लेकर गोवा में हुए प्रदर्शन ने इन मालढुलाई वैगनों के डिजाइन को आधुनिक रूप देने की जरूरत को फिर से रेखांकित किया है।

क्या आधुनिक और महत्त्वाकांक्षी भारतीय रेलवे को अपने मालढुलाई बेड़े को नया कलेवर देने पर ध्यान नहीं देना चाहिए? रेलवे को सड़क के रास्ते होने वाली माल ढुलाई से तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। रेलवे के लिए पटरियों के विशाल नेटवर्क को दुरुस्त करने के बाद इंजन एवं वैगन को नया रूप देना दूसरा सबसे अहम ढांचागत अवयव है। रेलवे के राजस्व में मालढुलाई से प्राप्त शुल्क का योगदान भी सबसे अधिक है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष विवेक देवरॉय ने अपने एक लेख में कहा था कि ‘ढुलाई वैगनों की निगरानी का इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम होने के बावजूद उनकी सटीक संख्या के बारे में नहीं बताया जा सकता है।’ तमाम अनुमानों के आधार पर देवरॉय का मानना है कि रेलवे के ढुलाई वैगनों की संख्या करीब 220,000 है। इनके अलावा करीब 20,000 वैगन कंटेनर ट्रेन ऑपरेटरों के पास हैं जिनमें से आधे वैगन रेलवे की सहायक कंपनी कॉनकॉर के हैं। वहीं अमेरिका के पास 15 लाख, रूस के पास 12 लाख, यूरोप के पास सात लाख और चीन के पास सात लाख से भी अधिक वैगन हैं। अगर वैगनों की संख्या और मालढुलाई की दरों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि अमेरिका, यूरोप और चीन की तुलना में भारत घाटे की स्थिति में है।

कई वर्षों से भारतीय रेलवे को वित्तीय संसाधनों के मामले में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रेलवे नए वैगनों की खरीद भी नहीं कर पा रहा है। रेलवे ने अपने विजन 2020 के तहत हरेक साल 25,000-30,000 वैगनों की खरीद का लक्ष्य रखा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वह मुश्किल से 12,00-15,000 नए वैगन ही खरीद पा रहा है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान रेलवे ने ढुलाई में इस्तेमाल होने वाले वैगनों की संख्या बढ़ाने के लिए चुनिंदा ढुलाई श्रेणियों में निजी क्षेत्र को भी शामिल किया है। रेलवे ने यह काम स्पेशल फ्रेट ट्रेन ऑपरेटर स्कीम, वैगन लीजिंग स्कीम, लिबरलाइज्ड वैगन इन्वेस्टमेंट स्कीम और ऑटोमोबाइल फ्रेट ट्रेन ऑपरेटर स्कीम जैसी विभिन्न योजनाओं के तहत किया है। लेकिन इनमें से अधिकांश योजनाओं की कामयाबी सीमित या नगण्य ही रही है।

पश्चिमी एवं पूर्वी मालढुलाई गलियारों का परिचालन अगले कुछ वर्षों में शुरू हो जाने के बाद यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण होगा कि रेलवे को बेहतर डिजाइन और तकनीक वाले वैगन पर्याप्त संख्या में मिलें। वैश्विक रुझानों से पता चलता है कि पिछले दो-तीन दशकों में रेलसेवा प्रदाताओं ने अपना ध्यान मुख्य रूप से पटरियों के ढांचे पर निवेश करने में लगाया हुआ है जबकि वैगनों का स्वामित्व निजी कंपनियों के हाथों में जा रहा है। इनमें जहाजरानी कंपनियां, ऑपरेटर, पट्टïे पर वैगन देने वाली कंपनियां और वित्तीय संस्थान शामिल हैं। अमेरिका में वर्ष 2014 के दौरान केवल 22 फीसदी वैगन ही रेल कंपनियों के थे। इसके उलट भारत में केवल आठ फीसदी वैगन ही निजी कंपनियों के पास हैं जिनमें से आधे तो अकेले कॉनकॉर के हैं। रेलवे अफसरों का एक तबका यह मानता है कि वैगनों का निजी स्वामित्व बढऩे से रेलवे के ग्राहक आधार में गिरावट आने का खतरा पैदा होने लगेगा जो पहले से ही बेहाल उसकी आर्थिक स्थिति को और प्रभावित करेगी। रेल अधिकारियों की इस चिंता का कोई ठोस आधार नहीं है। इन अधिकारियों का यह भी कहना है कि रेल पटरियों की सीमित क्षमता होने से वैगनों का स्वामित्व निजी हाथों में सौंपना ठीक नहीं होगा। हालांकि यह दावा भी रेल पटरियों की हालत दुरुस्त करने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने की अहमियत बयां करता है।

बहरहाल वैगनों की संख्या और उनके स्वामित्व से भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वैगनों के डिजाइन और उनके परिचालन में बड़े बदलाव किए जाने चाहिए। दुनिया भर में वैगनों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे उद्योग जगत की जरूरतों के मुताबिक हों और उनसे भंडारण का काम भी आसानी से किया जा सके। अब सीमेंट जैसे उत्पादों के परिवहन के लिए खास वैगन बन चुके हैं और संपीडित हवा के जरिये उस सीमेंट पाउडर को अनलोड भी किया जा सकता है। इसी तरह मवेशियों को ले जाने, खुलने वाली छत के वैगन और रेफ्रिजरेटेज वैगन भी बनाए गए हैं। वर्ष 2011 में अमूल ने केवल दूध की आपूर्ति करने वाली खास ट्रेन मेहसाणा और दिल्ली के बीच चलाई थी।

समय आ गया है कि निजी क्षेत्र को वैगनों का स्वामित्व सौंपा जाए जिससे देश को ही कई तरह से फायदा होगा। इससे रेलवे के पास रेल ढांचा बेहतर करने के लिए अधिक निवेश कोष उपलब्ध होगा क्योंकि उसे वैगनों की खरीद या उसे पट्टïे पर लेने में अधिक रकम नहीं लगानी पड़ेगी। निजी वैगनों के मालिक यही चाहेंगे कि उनके वैगन हमेशा काम पर लगे रहें और इससे रेलवे को मिलने वाला राजस्व ही बढ़ेगा। निजी स्वामित्व वाले वैगनों की संख्या बढऩे का मतलब होगा कि रेलवे के पास अधिक वैगन उपलब्ध होंगे और वह सड़क के रास्ते ढुलाई की राह अपनाने वाले ग्राहकों को भी आकर्षित कर सकेगा। निजी स्वामित्व वाले वैगनों की बेहतर तरीके से निगरानी हो पाएगी और ग्राहक भी उन पर नजर रख सकेंगे। ऐसा होने से बड़े पैमाने पर मालढुलाई करने वाली कोयला, ऊर्जा, सीमेंट और ऑटो कंपनियों की ढुलाई लागत में भी कमी आएगी जो भारतीय उद्योग को अधिक प्रतिस्पद्र्धी भी बनाएगा। वैगन का निर्माण करने वाली कंपनियों के पास भी नए ऑर्डर आने लगेंगे जिससे उन्हें नई जिंदगी मिलेगी। यह मेक इन इंडिया अभियान में भी जान फूूंकने का काम करेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था और रेलवे दोनों को मालढुलाई करने वाले वैगनों को नजरअंदाज करने की कीमत चुकानी पड़ रही है। अब इसके बदलाव का वक्त आ चुका है और उसमें निजी क्षेत्र की भूमिका काफी अहम होने जा रही है।

(लेखक ढांचागत तकनीक सेवा कंपनी फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)

साभार- http://hindi.business-standard.com से

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