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मुंबई में दादू निर्वाण दिवस पर हुई भक्तिमय भजनों और प्रवचनों की रस वर्षा

मुंबई ऐसे लोगों का शहर है जहाँ हर किसी के दिल में अपनी परंपराओं, मूल्य और जीवन दर्शन के प्रति गजब की आस्था रहती है। हिन्दी के भक्तिकाल में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख सन्त कवि दादू दयाल की पुण्य तिथि पर मुंबई के खेतान स्कूल में दादू दयाल निर्वाण समिति द्वारा आयोजित 415 वीं पुण्य तिथि कार्यक्रम में दादू पंथ के प्रमुख संत दादू पीठाधीश्वर जगतगुरु श्री श्री 1008 श्री गोपाल दास जी महाराज, संस्कृत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य एवं महंत श्री बजरंग दास जी महाराज ने जहाँ दादू के अध्यात्मिक, सामाजिक और धार्मिक अवदान को एक नई दृष्टि के साथ सामने रखा तो गायक श्री प्रकाश दास जी महाराज ने शुध्द शास्त्रीय रागों के साथ दादू के भजन प्रस्तुत कर एक अलौकिक वातावरण निर्मित कर दिया। प्रकाश दासजी दो साल तक अज्ञातवास में साधना करने के बाद हाल ही में पावस लौटे हैं।

इस अवसर पर श्री गोपाल दास जी महाराज ने कहा, सत्संग का लाभ गुरू कृपा से ही मिलता है। दादू जिस काल में हुए उस समय शस्त्रों का बोलबाला था, लेकिन उन्होंने संदेश दिया कि शस्त्रों से लड़ना है तो शास्त्र से लड़ो। भक्ति काल में संत दादू के 152 शिष्य हुए, जिनमें 52 प्रमुख थे और उनमें से भी 43 ज्ञान को उपलब्ध हुए। उन्होंने गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना जैसे शिष्य दिए और देश में एक ऐसी महान संत परंपरा की धारा बहाई जो आज भी मनुष्य समाज का मार्गदर्शन कर रही है।

दादू ने बहुत सरल शब्दों में जीवन की गहराईयों और जीवन के संघर्ष के सच को लोगों के सामने रखा। कबीर दास को जन-ज

न तक पहुँचाने में दादूपंथी संतों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन श्वास के साथ शुरु होता है। लेकिन हमें श्वास को सम्हाल कर नहीं रखना पड़ता है। श्वास को हम कम या ज्यादा करके इकठ्ठी नहीं रख सकते। दादू ने मनुष्य के अंतर्मन की हर गहराई का चिंतन किया। दादू ने मनुष्य जीवन के अंत की तुलना उस बारात से की है जो दुल्हे को अकेला श्मशान में छोड़कर खाली हाथ लौट आती है। उन्होंने कहा कि हमारे भय का कारण किसी चीज का होना ही है। है में ही भय समाया है।

दादू कहते हैं- दादू है को भय घणा, ना ही को कुछ नाय

श्री गोपाल दास जी महाराज से दादू के भक्ति पदों की व्याख्या और उनका मर्म जानना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव था।

श्रीगोपाल दास जी महाराज ने बताया कि उनके संस्थान द्वारा जयपुर और अजमेर के बीच एक भव्य अस्पताल का निर्माण करवाया जा रहा है ताकि दोनोंं क्षेत्रो के ग्रामीण अंचल गे लोगों को समय पर उचित ईलाज मिल सके।

इस अवसर पर मुंबई के श्री भागवत परिवार के समन्वयक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने कहा कि हमारे देश की संत और ऋषि परंपरा ने हमें ये सिखाया कि प्रकृति के साथ सांमजस्य कर जीवन कैसे जीना चाहिए, लेकिन हम जो जीवन जी रहे हैं वह प्रकृति के सौंदर्य को असंतुलित कर रहा है। उन्होंने कहा कि दादू जैसे संतो ने साधना, सेवा, समर्पण और संकल्प के साथ अपने जीवन को धन्य करते हुए पूरी मनुष्यता को जीवन जीने के संस्कार दिए। हमारा शरीर जिन पाँच तत्वों से अग्नि, पृथ्वी, आकाश, जल, आकाश और वायु से बना है उन पाँचों तत्वों को हमने इतना प्रदूषित कर दिया है कि कभी तूफान का खतरा हमारे सामने खड़ा हो जाता है तो कभी सुनामी का। हमने जीवन देने वाली वायु, अग्नि, पृथ्वी, आकाश और जल को इतना प्रदूषित कर दिया है कि हमारा जीवन ही संकट में पड़ गया है।

याज्ञिकजी ने कहा कि 16वीं शताब्दी में ऐसी स्थिति

थी कि हमारा धर्म, हमारे मूल्य और हमारी परंपराओं पर खतरा मंडरा रहा था ऐसी स्थिति में दादू जैसे संत हुए जिन्होंने सेवा, साधना और सुमिरन के तत्तव ज्ञान से लोगों की चेतना को झकझोरा और भारतीय संस्कृति पर हो रहे हमलों के प्रति लोगों को सतर्क किया।

कार्यक्रम के आयोजन में श्री दादू दयाल निर्वाण समिति के श्री प्रेमचंद चौधरी और उनका परिवार, डॉ. श्याम अग्रवाल, उद्योगपति एवँ विश्व हिन्दू परिषद कोंकण प्रांत के अध्यक्ष श्री देवकीनंदनजी जिंदल, श्री संतोष अग्रवाल, उद्योग पति श्री श्रीधर गुप्ता, श्री डालचंद गुप्ता आदि की प्रमुख भूमिका रही। कार्यक्रम में मुंबई के कोने कोने से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

कौन थे दादू दयाल

दादू दयाल (1544-1603 ई.) थे। इनके 52 पट्टशिष्य थे, जिनमें गरीबदास, सुंदरदास, रज्जब और बखना मुख्य हैं। दादू के नाम से ‘दादू पंथ’ चल पडा। ये अत्यधिक दयालु थे और अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु परोपकार के लिए तुरंत दे देने के स्वाभाव के कारण उनका नाम ‘दादू दयाल’ पड़ गया। दादू हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी आदि कई भाषाओं के ज्ञाता थे। इन्होंने शबद और साखी लिखीं। सन्त दादूदयाल जी महाराज का अवतार संवत् 1601 वि. में भारतवर्ष के गुजरात राज्य के अहमदाबाद नगर में हुआ था।

मात्र 12 वर्ष की अवस्था में दादूजी गृह त्याग कर सत्संग के लिए निकल पड़े, केवल प्रभु चिंतन में ही लीन हो गए। अहमदाबाद से प्रस्थान कर भ्रमण करते हुए राजस्थान की आबू पर्वतमाला, तीर्थराज पुष्कर से होते हुए करडाला धाम (जिला जयपुर) पधारे और पूरे 6 वर्षों तक लगातार प्रभु की साधना की। संत दादू जी विक्रम सं. 1625 में सांभर पधारे यहाँ उन्होंने मानव-मानव के भेद को दूर करने वाले, सच्चे मार्ग का उपदेश दिया। तत्पश्चात दादू जी महाराज आमेर पधारे तो वहां की सारी प्रजा और राजा उनके भक्त हो गए।

उसके बाद वे फतेहपुर सीकरी भी गए जहाँ पर बादशाह अकबर ने पूर्ण भक्ति व भावना से दादू जी के दर्शन कर उनके सत्संग व उपदेश ग्रहण करने के इच्छा प्रकट की तथा लगातार 40 दिनों तक दादूजी से सत्संग करते हुए उपदेश ग्रहण किया। दादूजी के सत्संग प्रभावित होकर अकबर ने अपने समस्त साम्राज्य में गौ हत्या बंदी का फरमान लागू कर दिया।

उसके बाद दादूजी महाराज नरेना (जिला जयपुर) पधारे और उन्होंने इस नगर को साधना, विश्राम तथा धाम के लिए चुना और यहाँ एक खेजडे के वृक्ष के नीचे विराजमान होकर लम्बे समय तक तपस्या की। यहीं पर उन्होंने ब्रह्मधाम “दादूद्वारा” की स्थापना की जिसके दर्शन मात्र से आज भी सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है। श्री दादू दयाल जी महाराज के द्वारा स्थापित “दादू पंथ” व “दादू पीठ” आज भी मानव मात्र की सेवा में निर्विघ्न लीन है। वर्तमान में दादूधाम के पीठाधीश्वर के रूप में आचार्य महंत श्री गोपालदास जी महाराज विराजमान हैं।

वर्तमान में भी प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल अष्टमी पर नरेना धाम में भव्य मेले का आयोजन होता है तथा इस अवसर पर एक माह के लिए भारत सरकार के आदेश अनुसार वहां से गुजरने वाली प्रत्येक रेलगाड़ी का नरेना स्टेशन पर ठहराव रहता है।

उनके उपदेशों को उनके शिष्य रज्जब जी ने “दादू अनुभव वाणी” के रूप में समाहित किया, जिसमे लगभग 5000 दोहे शामिल हैं। संतप्रवर श्री दादू दयालजी महाराज को निर्गुण संतो जैसे की कबीर व गुरु नानक के समकक्ष माना जाता है तथा उनके उपदेश व दोहे आज भी समाज को सही राह दिखाते आ रहे हैं।

दादू जी के श्रीमुख से ऐसे तो हजारों भक्ति गीतों की गंगा प्रवाहमान हुई है लेकिन पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत है भक्ति गीत की कुछ पंक्तियाँ

दादू दीया है भला, दिया करो सब कोय।
घर में धरा न पाइए, जो कर दिया न होय।

दादू इस संसार मैं, ये द्वै रतन अमोल।
इक साईं इक संतजन, इनका मोल न तोल॥

हिन्दू लागे देहुरा, मूसलमान मसीति।
हम लागे एक अलख सौं, सदा निरंतर प्रीति॥

मेरा बैरी ‘मैं मुवा, मुझे न मारै कोई।
मैं ही मुझकौं मारता, मैं मरजीवा होई॥

तिल-तिल का अपराधी तेरा, रती-रती का चोर।
पल-पल का मैं गुनही तेरा, बकसहु ऑंगुण मोर॥

खुसी तुम्हारी त्यूँ करौ, हम तौ मानी हारि।
भावै बंदा बकसिये, भावै गहि करि मारि॥

सतगुर कीया फेरि करि, मन का औरै रूप।
दादू पंचौं पलटि करि, कैसे भये अनूप॥

बिरह जगावै दरद कौं, दरद जगावै जीव।
जीव जगावै सुरति कौं, तब पंच पुकारै पीव।

दादू आपा जब लगै, तब लग दूजा होई।
जब यहु आपा मरि गया, तब दूजा नहिं कोई॥

सुन्य सरोवर मीन मन, नीर निरंजन देव।
दादू यह रस विलसिये, ऐसा अलख अभेव॥

दादू हरि रस पीवताँ, कबँ अरुचि न होई।
पीवत प्यासा नित नवा, पीवण हारा सोई॥

माया विषै विकार थैं, मेरा मन भागै।
सोई कीजै साइयाँ, तूँ मीठा लागै॥



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