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राजदीप सरदेसाई को राहुल गाँधी पर दया आई, पत्र लिखा

राजदीप सरदेसाई को राहुल गाँधी पर इतनी दया आई कि उन्होंने राहुल गाँधी को पत्र लिखकर सलाह दी है कि वो राजनीति मे क्यों फ्लॉप हो रहे हैं और कैसे हिट हो सकते हैं……
प्रिय राहुल, एक खुला पत्र आपसे मुखातिब होने का शायद सबसे अच्छा तरीका है, क्योंकि हम आम पत्रकारों के लिए 12 तुगलक लेन के दरवाजे बंद हैं बल्कि प्रतिबंधित हैं और ई-मेल, एसएमएस तथा फोन कॉल का आमतौर पर जवाब नहीं मिलता। सत्ता के गलियारों में दबी जुबान कही बातों से संकेत मिलता है कि वरिष्ठ कांग्रेसजनों का भी वहां पहुंचना उतना ही मुश्किल है। जाहिर है मेरे जैसे और भी भले लोग हैं।
 
संसद के बजट सत्र की शुरुआत पर आपके नदारद रहने से जो विवाद खड़ा हुआ उसमें अपना थोड़ा योगदान देने के लिए मैं यह पत्र लिख रहा हूं। वफादार कांग्रेसियों का कहना था कि यह कोई छुट्‌टी नहीं है बल्कि 'आत्म-परीक्षण' की ईमानदार कोशिश और पार्टी के भविष्य के लिए रूप-रेखा खींचने की प्रक्रिया का हिस्सा है। एक इंटरव्यू में जयराम रमेश ने तो यहां तक इशारा दे दिया कि 'अब हमें नए राहुल देखने को मिलेंगे : खुले, अपनी ओर से पहल करने वाले और मिलनसार।' सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि पूरी तरह रूपांतरित राजनेता को कौन नहीं देखना चाहेगा। हम सब खुद का पुन: आविष्कार करने के लिए संघर्षरत रहते हैं। और यदि रमेश के दावे के मुताबिक आपने अपनी गलतियों से सबक सीखा है, तो हमें आपको एक मौका तो देना ही चाहिए। किंतु राजनीतिक पत्रकारिता में 26 साल गुजारने के बाद मेरे लिए संदेह को परे रखना मुश्किल है। कांग्रेस पार्टी के खुद को नए रूप में ढालने या 'नए राहुल' के उभरने की रिपोर्टें पढ़-सुनकर मैं सोचने लगता हूं कि क्या मैंने इसे पहले नहीं सुना है। मुझे याद आता है कि 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी पराजय के बाद यह वादा किया गया था कि अब आप अपनी कर्मभूमि में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में ऊर्जा लगाएंगे। इसकी बजाय आपने खुद को परिवार के गढ़ अमेठी तक सीमित कर लिया।
 
सालभर बाद दिसंबर 2013 में दिल्ली राजस्थान विधानसभा के चुनावों में हार के बाद आपने फिर कांग्रेस को बदलने का वादा किया, 'आपको कांग्रेस कई तरह से बदली हुई नजर आएगी, जिसकी आपने कल्पना नहीं की होगी।' यह आपके शब्द थे। आपके ये शब्द उतने ही प्रभावी थे, जितना एक माह बाद तालकटोरा स्टेडियम में एआईसीसी के अधिवेशन में दिया आपका भाषण। एक्शन के लिए आपकी बुलंद पुकार ने नेताओं कार्यकर्ताओं में उत्साह भर दिया था। हालांकि, उसके बाद चुनाव अभियान में ऐसा कुछ नजर नहीं आया। मोदी के बढ़ते महारथ का सामना करते हुए राजनीतिक चर्चा को खुद तय करने की बजाय आप लगातार उनके मुद्‌दों पर ही बात करते नजर आए। शायद यूपीए के दस साल का बोझ उतार फेंकना मुश्किल था।
 
कांग्रेस की 44 सीटों की तोहमत आप पर लगाना नाइंसाफी होगी। और इसके बावजूद मई बाद के जो राहुल हम देखते हैं उससे जाहिर होता है कि 24 घंटे जोश-ओ-खरोश से बहस-मुबाहिसे वाली राजनीति आपको रोमांचित नहीं करती। पिछले नौ महीनों में हमने आपको कोई मुद्‌दा उठाते देखा-सुना नहीं, जो वाकई विपक्षी दल को आंदोलित कर दे। ऐसा भी नहीं कि मोदी सरकार ने आपको कोई मौका ही नहीं दिया। धर्मनिरपेक्षता की प्रकृति विषय वस्तु पर संघ परिवार द्वारा बार-बार की गई हलकी बातें आपके लिए खतरे का झंडा बुलंद कर राष्ट्रीय बहस शुरू करने के लिए पर्याप्त थीं। आपकी पार्टी प्रधानमंत्री पर चुप रहने का आरोप लगाती है, लेकिन ज्यादातर वक्त आप भी तो चुप ही रहे हैं।
 
अब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश राजनीति का ज्वलंत मुद्‌दा बनता जा रहा है। आप जायज तरीके से मूल विधेयक पर दावा कर सकते हैं, जिसे यूपीए ने आगे बढ़ाया था। भट्‌टा परसौल में 2011 में आंदोलन शायद सड़क पर छेड़े गए किसी आंदोलन में आपकी सबसे साफ नजर आने वाली भागीदारी थी। और इसके बाद भी जब बाएं से लेकर दाएं तक सारे राजनीतिक समूह यह मुद्‌दा उठा रहे हैं, आप फिर यह मौका चूक रहे हैं। कांग्रेस ने जंतर-मंतर पर रैली निकालने का फैसला किया, लेकिन नेता वहां भी नदारद। इससे ऐसा संकेत मिलता है कि या तो पार्टी में महत्वाकांक्षा का अभाव है या इस क्षण आप अप्रासंगिक हैं। आपके इस संकोची रवैये और आम आदमी पार्टी के नेता अब दिल्ल के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के रुख में कितना विरोधाभास है। अापकी तरह केजरीवाल भी लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारे थे, मोदी लहर में बह गए थे। और फिर भी पराजय उन्हें विचलित नहीं कर पाई और उन्होंने तो मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी तक मांग ली।
 
दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में जब आप बंद दरवाजों के पीछे 'आत्म-निरीक्षण' कर रहे थे और भाजपा नेतृत्व न्यूयॉर्क से सिडनी तक दुनिया को रिझाने में लगा था, केजरीवाल दिल्ली के मोहल्ले कॉलोनियों में प्रचार की अलख जगा रहे थे। यह उनके लिए आसान नहीं रहा होगा, लेकिन राजनीति में कोई शॉर्टकट नहीं होता। केजरीवाल के लिए दिल्ली 'करो या मरो' की लड़ाई थी : उन्होंने और जमीन हाथ से जाने देने की बजाय लड़ने का फैसला किया। और मतदाता ने उनके प्रयासों को पुरस्कृत किया। इसके विपरीत जब आपने सांकेतिक रोड शो करने का फैसला लिया, यह एक बार फिर बहुत छोटा, बहुत देर से किया गया प्रयास था। कांग्रेस चौराहे पर है : महत्वाकांक्षी मध्यवर्ग को भाजपा आकर्षित करती है, 'आप' निम्न आय वर्गों को खींच रही है जबकि क्षेत्रीय दल अपने क्षेत्रों में जमे हुए हैं। आपको किसी परिवार या विचारधारा से परंपरागत रूप से नहीं बंधे नई पीढ़ी के मतदाताओं को उत्साहित करने के लिए शक्तिशाली विजन देना होगा। परंतु वह विकल्प देने की बजाय आपका राजनीतिक कॅरिअर तो 'मौका खोने' का कोई अवसर गंवाने की केस स्टडी बन चुका है।
 
2011 में आप भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों तक पहुंच सकते थे पर आपने ऐसा नहीं किया। 2012 में आप दिल्ली की सड़कों पर हुए निर्भया आंदोलन से सार्वजनिक रूप से जुड़ सकते थे। 2013 में आपने पार्टी को नेतृत्व देने की बजाय यह जता दिया कि 'सत्ता जहर है।' और अब 2015 में आपने फिर मिश्रित संकेत दिए हैं। आपकी दादी ही नहीं आपकी मां भी याद दिला सकती हंै कि राजनीति मैराथन धावकों को पुरस्कृत करती है। आइटम नंबर के लिए इसमें ज्यादा धैर्य नहीं है।
 
पुनश्च: पिछले हफ्ते मेरी बेटी की सीबीएसई परीक्षा शुरू हुई है। उसकी कक्षा के सारे विद्यार्थियों की तरह वह भी जानती है कि अत्यधिक स्पर्द्धा वाली दुनिया में सफल होने के लिए उसे बहुत कड़ी मेहनत करनी होगी। भारत में अब युवाओं के पास 'आत्म-निरीक्षण' की लग्ज़री नहीं है। फिर छुट्‌टी की तो बात ही क्या।
 
(साभार: दैनिक भास्कर)

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