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साहित्यकार राजेंद्र यादव नहीं रहे

हिन्दी के प्रख्यात लेखक एवं हंस पत्रिका के संपादक राजेन्द्र यादव का सोमवार रात को निधन हो गया। वह 84 वर्ष के थे। यादव की कल रात अचानक तबीयत खराब हो गई और उन्हें सांस लेने की तकलीफ होने लगी। उन्हें रात लगभग 11 बजे एक निजी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्होंने रास्ते में ही दम तोड दिया। हिन्दी में दलित एवं विमर्श को नई दिशा देने वाले यादव के निधन से साहित्य एवं बौद्धिक जगत में शोक की लहर दौड गई है।

उनके परिवार में लेखिका पत्नी मन्नू भंडारी के अलावा एक बेटी रचना यादव हैं। उनके निधन से मोहन राकेश और कमलेश्वर के बाद नई कहानी आंदोलन का तीसरा एवं अंतिम स्तम्भ ढह गया है। यादव का अंतिम संस्कार दोपहर तीन बजे लोदी रोड स्थित शवदाह गृह में किया जाएगा। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जनसंस्कृति मंच जैसे अनेक संगठनों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है और कहा कि हिन्दी साहित्य के बौद्धिक जगत में वंचितों को मुख्यधारा से जोडने वाला तथा धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील मूल्यों के लिए लडने वाला एक लोकतांत्रिक लेखक चला गया, जिसने युवा पीढी को हमेंशा अपनी पत्रिका हंस के माध्यम से आगे बढ़ाने का काम किया।

यादव के निधन पर शोक व्यक्त करने वालों में सर्व डा. नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडेय, विश्वनाथ त्रिपाठी, निर्मला जैन, रवीन्द्र कालिया जैसे अनेक लोग शामिल हैं।

28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे यादव की गिनती चोटी के लेखकों में होती रही है। वह मुंशी प्रेमचंद की पत्रिका हंस का 1986 से संपादन करते रहे थे जो हिन्दी की सर्वाधिक चर्चित साहित्यिक पत्रिका मानी जाती है और इसके माध्यम से हिन्दी के नए लेखकों की एक नई पीढी भी सामने आई और इस पत्रिका ने दलित विमर्श को भी स्थापित किया।

राजेन्‍द्र यादव के प्रसिद्ध उपन्यास सारा आकाश पर बासु चटर्जी ने एक फिल्म भी बनाई थी। उनकी चर्चित रचनाओं में 'जहां लक्ष्मी कैद है', 'छोटे-छोटे ताजमहल', 'किनारे से किनारे तक', 'टूटना', 'ढोल', 'जैसे कहानी संग्रह' और 'उखडे हुये लोग', 'शह और मात', 'अनदेखे अनजान पुल' तथा 'कुलटा' जैसे उपन्यास भी शामिल है। उन्होंने अपनी पत्नी मन्नू भंडारी के साथ 'एक इंच मुस्कान' नामक उपन्यास भी लिखा है।

यादव ने विश्व प्रसिद्ध लेखक चेखोव तुर्गनेव और अल्वेयर कामो जैसे लेखकों की रचनाओं का भी अनुवाद किया था। यादव ने आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. किया था और वह कोलकता में भी काफी दिनों तक रहे। वह संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रसार भारती के सदस्य भी बनाए गए थे। वह 1913 से दिल्ली में रह रहे थे और राजधानी की बौद्धिक जगत की एक प्रमुख हस्ती माने जाते थे।

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