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राम नाम की महिमा से चमत्कृत थे अंग्रेजी राज में कोलकोता के न्यायमूर्ति जॉन वुड्रॉफ

भारत में ‘राम धुन’ आयोजन लोकप्रिय है। नाम-जप और मंत्र-जाप यहाँ की प्राचीन ज्ञान पंरपरा का अंग है। डाकू रत्नाकर का ‘मरा-मरा’ से ‘राम-राम’ कहते हुए महान ऋषि में बदल जाने की कथा कोई पौराणिक कल्पना नहीं। उस का मर्म ही राम नाम की महिमा है, जिसे कोई जिज्ञासु आज भी प्राप्त कर सकता है। इस के लिए हिन्दू होना जरूरी नहीं। मुसलमान भी इस से वही लाभ उठा सकते हैं।

एक बार कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर जॉन वुड्रॉफ (1865-1936) ने किसी मुकदमे का फैसला देने में हो रही दुविधा से मंत्र-जाप की शक्ति का परिचय पाया। वे निश्चय पर पहुँच नहीं पा रहे थे। तब पता चला कि मुकदमे के दोनों पक्ष मंत्र-जाप में लगे थे, और कभी इस कभी उस पक्ष के मंत्र-जाप के प्रभाव से जज साहब का मस्तिष्क निरंतर दुविधा में झूल रहा था। इस के बाद वुड्रॉफ ने मंत्र शास्त्र का व्यवस्थित अध्ययन शुरू किया। भारतवर्ष और नेपाल तक विभिन्न ज्ञानियों, योगियों से मिल कर उन्होंने तंत्र ज्ञान हासिल किया। इस तरह वे बड़े भारत-विद् बने जिस ने आधुनिक युग में मंत्र शक्ति व हिन्दू चितंन को जानने का प्रयत्न किया। इस पर उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं।

नाम-जप के लाभ वैज्ञानिक भाषा में समझने के लिए स्वामी विवेकानन्द से लेकर श्रीअरविन्द, स्वामी शिवानन्द, योगानन्द और हाल के सत्यानन्द सरस्वती जैसे योगियों की रचनाएं देख सकते हैं। सत्यानन्द ने सरल भाषा में विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए अलग-अलग नाम-जप की विधि, प्रकार, स्तर, उस प्रक्रिया में ध्यान रखने की सावधानियाँ और लाभों के बारे में सविस्तार बताया है। तदनुरूप नाम-जप करने पर उस की प्रमाणिकता स्वतः प्रतीत होती है।

प्राथमिक से होते हुए उच्चतम तक जप-योग के पाँच स्तर हैं। वैखरी, उपांशु, मानसिक, लिखित और अजपा जप। योगियों के अनुसार सब से पहले किसी साधक को वैखरी, अर्थात बोल कर नाम का अभ्यास करना चाहिए। उपांशु एकदम हल्की ध्वनि के साथ जाप है। यह दोनों प्रकार का जप हर कोई कर सकता है। इसकी अवधि मामूली और विधि भी सरल है। शेष तीन के लिए व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र के अनुसार योग्यताओं की अपेक्षा होती है। नाम-जप में गुण, मात्रा से अधिक निरंतर अभ्यास का महत्व है। ईश्वर में विश्वास होने, न होने से इस में अंतर नहीं पड़ता। नास्तिक भी जप के अभ्यास से अपना जीवन सुधार सकता है।

जब और जहाँ श्रद्धा एवं विधि पूर्वक नाम जप होता है, वहाँ का वातावरण भी बदल जाता है। यह स्वयं अनुभव की चीज है। काशी के संकट-मोचन में प्रतिदिन होने वाली राम-धुन में पहुँच कर किसी को भी एक आभामंडल में प्रवेश की अनुभूति होती है। उस के चुंबकीय प्रभावों को वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा मापा जा सकता है। वह अंध-विश्वास नहीं। यद्यपि इसे उन बुद्धिवादियों द्वारा समझना कठिन है, जो केवल तर्क-वितर्क की भाषा जानते हैं।

नाम-जप के लाभों को दैनिक जीवन में भी देखा जा सकता है। यदि आप किसी कार्य या समस्या पर एकाग्र चिंतन में विफल हो रहे हैं, तो घंटे भर वैखरी जप कर ध्यान लगाएं। मानस व्यायाम हेतु भी जप साधन अचूक है। किसी मंत्र का देर तक जाप कर लेने से मस्तिष्क तरो-ताजा हो जाता है। सोचने-समझने की शक्ति बढ़ती है। जैसे व्यायाम से अंगों में स्फूर्ति आती है, वैसे ही नाम जप से मानसिक स्फूर्ति आती है। जिन्हें बुरी लतें हों, वे इस का प्रयोग कर अपने मस्तिष्क को सदाचार प्रवृत्त होने के अनुकूल बना सकते हैं। मानसिक जड़ता तोड़ने में, दृढ़ निश्चय की ओर बढ़ने में मंत्र-जाप मददगार होता है।

जैसे नशीली दवाएं हमारा मस्तिष्क प्रभावित करती हैं, उसी तरह नाम या मंत्र जाप भी करता है। नशा भी किसी को शांत, स्थिर या सुन्न कर देता है। तब शारीरिक क्रियाएं मंद और मस्तिष्क निष्चेष्ट हो जाता है। मंत्र जाप से भी शांति मिलती है। मानसिक उद्वेग कम होता है। अंतर यह कि जहाँ नशे से शरीर व दिमाग शिथिल हो जाता है, वहाँ मंत्र जाप से मानसिक स्फूर्ति बढ़ती है। दूसरा अंतर, कि नशे से निम्न प्रवृत्तियाँ तुष्टि पाती हैं, जबकि नाम जप से उच्च प्रवृत्तियाँ जगती हैं। जिस व्यक्ति में सामान्यतः क्रोध, कामना, ईर्ष्या, चिंता, आदि है, वह जप अभ्यास से निर्मल हो सकता है। वह कोई पहुँचा हुआ महात्मा न भी बने, तब भी उस का मस्तिष्क स्वस्थ और शांत अवश्य बनेगा।

साधारण जनों के लिए उच्चतर योग साधना कठिन है। उस के लिए समय, धन, सांसारिक जिम्मेदारियों से आजादी और आध्यात्मिक सुसंगति भी चाहिए। यह सब को सुलभ नहीं होता। इसीलिए प्राचीन ऋषियों ने सोच-विचार कर जप-योग की खोज की, जिस से साधारण मनुष्य भी आध्यात्मिक साधना व शक्ति पा सकता है। धीरे-धीरे, पर निश्चित रूप से। अतः जप-योग कामचलाऊ नहीं, बल्कि सुनिश्चित मार्ग है जिस से हर कोई मानसिक, भौतिक, आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है। इसे प्रत्येक ज्ञानी, संत और वैज्ञानिक ने निरपवाद रूप से दोहराया है।

नाम या मंत्र के जाप को जब आध्यात्मिक उद्देश्य के लिए निःस्वार्थ किया जाता है, तो इसे भक्ति योग कहते हैं। किन्तु जब सांसारिक उद्देश्य से वह साधा जाता है, तब इसे तंत्र-शास्त्र कहा जाता है। दोनों स्थितियों में जप से संबंधित व्यक्तियों की मानसिक शक्ति में परिवर्तन होता है। साथ ही, विभिन्न नामों या मंत्रों के प्रभाव में भी भिन्नता होती है।

राम-नाम से जुड़े मंत्र जाप में शांति व स्वस्ति का अनुभव होता है। शिव नाम से जुड़े जाप में निःसंगता, निर्लिप्तता की भावना बढ़ती है। दुर्गा या देवी नामों के जाप से अवचेतन के उच्च स्तर जगते हैं, जिस से शक्ति की अनुभूति होती है। इसीलिए, जिस की भावनाएं नियंत्रित न हों, या मानसिक अवस्था संतुलित न हो, उस पर देवी जाप के प्रतिकूल परिणाम भी होते हैं। इसीलिए, मंत्र-जप और तंत्र-साधना, सभी को किसी सच्चे गुरू के निर्देशन से विधि-पूर्वक ही करना चाहिए। अन्यथा लाभ के बदले हानि हो सकती है।

जप योग का प्रभाव शरीर पर प्राणायाम से विपरीत पड़ता है। जप का अभ्यास बढ़ने से शारीरिक, विशेषकर पाचन क्रिया मंद होती है। जबकि प्राणायाम से वह तीव्र होती है। इसीलिए जप योग के अभ्यास में अभ्यास के स्तर और अवधि के अनुसार हल्के भोजन या फलाहार आदि का भी पालन करना चाहिए। जप से शारीरिक क्रियाएं मंद होती हैं, पर मानस शांत होता है और हृदय को आराम मिलता है। यह सब कुल मिलाकर व्यक्ति की चेतना को प्रभावित करता है।

इसीलिए मानसिक उद्वेग और परेशानी से ग्रस्त लोगों के लिए जप-योग गुणकारी है। जब सामूहिक रूप से किया जाए, तो यह उस स्थान और क्षेत्र को दुष्प्रभावों से मुक्त करने में सहायक हो सकता है। अतः जब लोग राम-धुन का आयोजन करते हैं, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। अपने पारंपरिक ज्ञान-भंडार को उपेक्षित कर केवल पश्चिमी शिक्षा पर हमारी निर्भरता ने ही गाँव-गाँव तक असंख्य सामाजिक बुराइयाँ, बीमारियाँ पहुँचा दी हैं। यह सब अज्ञान के ही विविध रूप हैं। अभी समय है कि हम अपनी अनमोल ज्ञान-विरासत पर ध्यान देकर रोग-मुक्त होने का प्रयत्न करें। आगे राम जी की इच्छा!

साभार-http://www.nayaindia.com/से



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