आप यहाँ है :

राममंदिर आरएसएस की नही भारत की आवश्यकता है: संघ प्रचारक जे नंदकुमार

लखनऊ : दैनिक जागरण संवादी के दूसरे दिन की शुरुवात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस ) पर सत्र ‘समय के साथ संघ ‘ में संघ प्रचारक जे नंदकुमार से सद्गुरु शरण अवस्थी ने बातचीत की . प्रचारक नंदकुमार ने कहा कि संघ समय की आवश्यकता थी ,संघ की सही स्थित को जानने के लिए उसके इतिहास को जानना जरूरी है 1925 में संघ के स्थापन सिर्फ 16 लोगों ने की थी और उस समय भारतीय समाज को संगठित करना बहुत जरूरी था क्योंकि राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्ति निर्माण बहुत जरूरी है .

संघ का सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा अयोध्या में राम मंदिर बनाने पर बोलते हुए नंदकुमार ने कहा ‘ राममंदिर आरएसएस की नही भारत की आवश्यकता है ,करोड़ों लोगों की आस्था इसमें जुडी हुई हैं और भारत की राष्ट्रीय धरोहर और संस्कृति को बचाना प्रत्येक भारतीय का धर्म है . राम मंदिर अयोध्या में बनेगा चाहे आरएसएस रहे या न रहे . आगे भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि देश की आजादी की लिए आरएसएस के संस्थापक डॉ हेडगेवार स्वयं लड़े और जेल भी गये . राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों ने देश की आजादी में भाग लिया था ,मगर उन स्वयंसेवकों ने अपनी कोई पहचान दिखाने के लिए किसी टोपी आदि का सहारा नही लिया था जैसे कांग्रेस के लोगों ने किया था .

ऋषि कपूर और तापसी पन्नू अभिनीत फिल्म ‘मुल्क’ के निर्देशक अनुभव सिन्हा ने ‘ अनुभव का अनोखा संसार’ सत्र में मयंक शेखर से अपने सफ़र को साँझा किया. वाराणसी शहर के पृष्टभूमि पर बनी मुल्क फिल्म के बारे में बताते हुए अनुभव सिन्हा ने कहा कि वे वाराणसी जैसे हिन्दू बहुल शहर में पले -बड़े और अलीगढ मुस्लिम बहुल जैसे शहर पढ़े हैं .मुल्क फिल्म को बनाने का इरादा बहुत समय से था मगर जब भी दोस्तों को फिल्म की कहानी सुनाता था तो वो बोलते थे कि ये फिल्म मत बना कोई हीरो नही मिलेगा और ना ही पैसा लगाने.मगर फिर भी दिल में एक कसमकस थी और फिल्म बना ली, पैसा जुटाने में थोडा समय लगा मगर कलाकार आसानी से मिल गये थे. आगे उन्होंने कहा ऋषि कपूर ने कहा की 20 मिनट में कहानी सुनाओ ,और उनका एक ही रिएक्शन था कि इस फिल्म में तो कोई हीरो ही नही है .

‘नए लेखन में कितना दम’ सत्र नए युवा लेखक प्रवीण कुमार, भगवंत अनमोल ,क्षितिज राय ,सिनीवाली शर्मा से मनोज राजन त्रिपाठी ने नई हिंदी और पुरानी हिंदी पर बातचीत की . प्रवीण कुमार ‘ हर पांच – सात साल बाद एक नई तरह की भाषाशैली विकसित होती है वही नई हिंदी है .क्षितिज राय ‘मैं नई हिंदी पुरानी हिंदी में कोई फर्क नही देखता ,हम जिस परिवेश और समय में लिख रहे होते हैं उसी समय और परिवेश की भाषा लेखनी में दिखती है .भगवंत अनमोल ‘ मेने जब लिखना शुरु किया था तब मैं नही जानता था कि कौन सी नई हिंदी है कौन सी पुरानी .मै तो केवल हिंदी को जानता हूँ बस वही लिखता हूँ.सिनीवाली शर्मा ‘दर्द जहाँ होगा मै उसे लिखूंगी ,नई शैली और पुरानी शैली से मेरा कोई नाता नही है .

संपर्क
संतोष कुमार
M -9990937676



Back to Top