आप यहाँ है :

विमोचन एवं परिचर्चाः ‘रंग कितने संग मेरे’

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक मोहनदास नैमिशराय की आत्मकथा (तीसरा भाग) ‘रंग कितने संग मेरे’ का विमोचन एवं परिचर्चा का आयोजन डॉ. प्रेमचन्द ‘महेश’ सभागार वाणी प्रकाशन में दिनांक 27 अप्रैल 2019 को शाम 4:30 बजे आयोजित किया जायेगा। परिचर्चा में भाग लेंगे अध्यक्षता के रूप में वरिष्ठ कवि लीलाधर मंडलोई, विशिष्ट वक्ता- लेखक अजय नावरिया, डॉ. सिद्धार्थ, कौशल पवार, सहभागिता- डॉ. रूपचंद गौतम, सैयद परवेज़, अरूण कुमार, साक्षी गौतम, शेखर।

कार्यक्रम का संचालन हेमलता यादव व धन्यवाद ज्ञापन वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी करेंगे।

‘रंग कितने संग मेरे’ पुस्तक के बारे में…

उत्तरी भारत में दलित साहित्य के सूत्राधारों की अग्रिम पंक्ति के नामचीन लेखक/पत्रकार/नाट्यकार नैमिशराय जी की आत्मकथा के इस तीसरे भाग में गाँव से लेकर शहर और शहर से महानगरों के वे जीवन्त रंगों से सरोबार चित्र मिलेंगे, जिनके आर-पार आज भी दलित जूझते हुए जीवन पथ पर अग्रसर है।

अपने-अपने पिंजरे का तीसरा भाग ‘रंग कितने संग मेरे’ है हर व्यक्ति के जीवन में इन्द्रधनुषी रंग होते हैं। पर उन रंगों में कितने किसके संग होते हैं, यह अलग बात है। आज़ादी के बाद और विशेष रूप से दलितों को रामराज में क्या मिला? गाँव से शहर, नदी से लेकर समन्दर, वेश्यालयों से लेकर संसद और मन्दिरों से आश्रम का जीवन ही प्राप्त हुआ।

नैमिशराय जी की आत्मकथा का तीसरा भाग, पहेलियों जैसा जीवन, उसी जीवन में धूप-छाँव/आशा-निराशा/पहाड़ पर जैसे चढ़ना फिर उतरने जैसा अनुभव समेटे है। यहाँ पिंजरों के खुलने-टूटने की प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया से जूझता दलित है। जिसके लिए नयी शताब्दी की दस्तक उसके लिए नयी आशाओं का संचार करती है। वहीं पुरानी शताब्दी के अन्तिम दशक से गुजरना भी मुश्किल है। जीवन के कड़वे अनुभवों से सिर्फ़ वे ही नहीं जुड़े बल्कि परिवार की खुशियाँ भी उनके द्वारा आन्दोलन में गुम होती गयी। इसलिए आन्दोलन से राजनीति के चित्र भी उनकी इस आत्मकथा ‘रंग कितने संग मेरे’ में उभरते हैं।

यह पुस्तक मेरठ से दिल्ली, दिल्ली से बम्बई, बम्बई से अनगिनत गाँवों/शहरों तथा महानगरों की यात्रा/दुनिया को देखने समझने की गहरी दृष्टि देती है तथा देवदासियों से लेकर वेश्याओं के सवालों से रु-ब-रु कराती है। यहाँ राजनीति का खौफ़नाक जंगल है जिसमें गुम होता प्रजातन्त्र है। उसी प्रजातन्त्र में उनकी रचनाधर्मिता सवाल-दर सवाल उभरते रहे है।

लेखक परिचय

मोहनदास नैमिशराय एक ऐसी शख्सियत हैं, जो बचपन से ही जीवन के यथार्थ से रु-ब-रु हो गये थे। जिन्होंने बचपन में तथागत बुद्ध को याद करते हुए ‘बुद्ध वन्दना’ में शामिल होना शुरू कर दिया था। उनके दर्शन से जुड़े। इसलिए कि डॉ. अम्बेडकर का मेरठ में हुआ भाषण उनकी स्मृति में था। जैसा उन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘‘अपने-अपने पिंजरे’’ में लिखा है- 6 दिसम्बर, 1956 को जब बाबा साहेब का परिनिर्वाण हुआ, जब उनकी बस्ती में कोई चूल्हा नहीं जला था। उदास चूल्हे, उदास घर और उसी उदासी के परिवेश की गिरफ़्त में दलित।

मेरठ से दिल्ली गये तो कांशीराम जी से रु-ब-रु हुए। बहुजन समाज पार्टी के संगठन बामसेफ से जुडे़। लेक्चरार की नौकरी छोड़ी। फिर राहुल सांस्कृत्यायन की तरह दलितों के इतिहास की तलाश में जुट गये। यायावरी बन गाँव/कस्बों/शहरों में खोजबीन करते हुए भटकते रहे। इस बीच लेखन जारी रहा। हिन्दी, अंग्रेजी में लगभग पचास पुस्तकें उन्होंने लिखी। उनके जीवन संघर्ष पर भी चार-पाँच पुस्तकें लिखी गयीं। कुछ डाक्यूमेन्ट्री उन पर बनी। नाटक से लेकर रेडियो सीरियल, टेलीफ़िल्म से लेकर फीचर फ़िल्म तक स्वयं उन्होंने लिखी। दिल्ली में नाटकों में अभिनय के साथ निर्देशन भी किया।

उनकी रचनाधर्मिता तथा जीवन संघर्ष और आन्दोलन में भागीदारी पर लगभग एक-सौ से अधिक एम.फिल. और पीएच.डी. हो चुकी हैं। अभी भी दस से बारह घण्टे नियमित रूप से वे लिखते हैं।

नैमिशराय जी के लेखकीय खाते में दो कविता संग्रह के साथ पाँच कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास से इतर दलित आन्दोलन/पत्राकारिता से इतर अन्य विषयों पर 50 पुस्तकें दर्ज हुई है। उन्होंने अंग्रेज़ी तथा मराठी से अनुवाद भी किये। वे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, (राष्ट्रपति निवास) शिमला में फेलो भी रहे। साथ ही डॉ. अम्बेड़कर प्रतिष्ठान, नयी दिल्ली में मुख्य सम्पादक के रूप में उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी निभायी।

वाणी प्रकाशन के बारे में…

वाणी प्रकाशन 56 वर्षों से 32 साहित्य की नवीनतम विधाओं से भी अधिक में, बेहतरीन हिन्दी साहित्य का प्रकाशन कर रहा है। वाणी प्रकाशन ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और ऑडियो प्रारूप में 6,000 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। वाणी प्रकाशन ने देश के 3,00,000 से भी अधिक गाँव, 2,800 क़स्बे, 54 मुख्य नगर और 12 मुख्य ऑनलाइन बुक स्टोर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है।

वाणी प्रकाशन भारत के प्रमुख पुस्तकालयों, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, ब्रिटेन और मध्य पूर्व, से भी जुड़ा हुआ है। वाणी प्रकाशन की सूची में, साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत 18 पुस्तकें और लेखक, हिन्दी में अनूदित 9 नोबेल पुरस्कार विजेता और 24 अन्य प्रमुख पुरस्कृत लेखक और पुस्तकें शामिल हैं। वाणी प्रकाशन को क्रमानुसार नेशनल लाइब्रेरी, स्वीडन, रशियन सेंटर ऑफ आर्ट एण्ड कल्चर तथा पोलिश सरकार द्वारा इंडो, पोलिश लिटरेरी के साथ सांस्कृतिक सम्बन्ध विकसित करने का गौरव सम्मान प्राप्त है। वाणी प्रकाशन ने 2008 में ‘Federation of Indian Publishers Associations’ द्वारा प्रतिष्ठित ‘Distinguished Publisher Award’ भी प्राप्त किया है। सन् 2013 से 2017 तक केन्द्रीय साहित्य अकादेमी के 68 वर्षों के इतिहास में पहली बार श्री अरुण माहेश्वरी केन्द्रीय परिषद् की जनरल काउन्सिल में देशभर के प्रकाशकों के प्रतिनिधि के रूप में चयनित किये गये।

लन्दन में भारतीय उच्चायुक्त द्वारा 25 मार्च 2017 को ‘वातायन सम्मान’ तथा 28 मार्च 2017 को वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक व वाणी फ़ाउण्डेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी को ऑक्सफोर्ड बिज़नेस कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में ‘एक्सीलेंस इन बिज़नेस’ सम्मान से नवाज़ा गया। प्रकाशन की दुनिया में पहली बार हिन्दी प्रकाशन को इन दो पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। हिन्दी प्रकाशन के इतिहास में यह अभूतपूर्व घटना मानी जा रही है।

3 मई 2017 को नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘64वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार समारोह’ में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के कर-कमलों द्वारा ‘स्वर्ण-कमल-2016’ पुरस्कार प्रकाशक वाणी प्रकाशन को प्रदान किया गया। भारतीय परिदृश्य में प्रकाशन जगत की बदलती हुई ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए वाणी प्रकाशन ने राजधानी के प्रमुख पुस्तक केन्द्र ऑक्सफोर्ड बुकस्टोर के साथ सहयोग कर ‘लेखक से मिलिये’ में कई महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम-शृंखला का आयोजन किया और वर्ष 2014 से ‘हिन्दी महोत्सव’ का आयोजन सम्पन्न करता आ रहा है।

वर्ष 2017 में वाणी फ़ाउण्डेशन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के साथ मिलकर हिन्दी महोत्सव का आयोजन किया। व वर्ष 2018 में वाणी फ़ाउण्डेशन, यू.के. हिन्दी समिति, वातायन और कृति यू. के. के सान्निध्य में हिन्दी महोत्सव ऑक्सफोर्ड, लन्दन और बर्मिंघम में आयोजित किया गया ।

‘किताबों की दुनिया’ में बदलती हुई पाठक वर्ग की भूमिका और दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए वाणी प्रकाशन ने अपनी 51वी वर्षगाँठ पर गैर-लाभकारी उपक्रम वाणी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की। फ़ाउण्डेशन की स्थापना के मूल प्रेरणास्त्रोत सुहृदय साहित्यानुरागी और अध्यापक स्व. डॉ. प्रेमचन्द्र ‘महेश’ हैं। स्व. डॉ. प्रेमचन्द्र‘महेश’ ने वर्ष 1960 में वाणी प्रकाशन की स्थापना की। वाणी फ़ाउण्डेशन का लोगो विख्यात चित्रकार सैयद हैदर रज़ा द्वारा बनाया गया है। मशहूर शायर और फ़िल्मकार गुलज़ार वाणी फ़ाउण्डेशन के प्रेरणास्रोत हैं।

वाणी फ़ाउण्डेशन भारतीय और विदेशी भाषा साहित्य के बीच व्यावहारिक आदान-प्रदान के लिए एक अभिनव मंच के रूप में सेवा करता है। साथ ही वाणी फ़ाउण्डेशन भारतीय कला, साहित्य तथा बाल-साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय शोधवृत्तियाँ प्रदान करता है। वाणी फ़ाउण्डेशन का एक प्रमुख दायित्व है दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली तीसरी बड़ी भाषा हिन्दी को यूनेस्को भाषा सूची में शामिल कराने के लिए विश्व स्तरीय प्रयास करना।

वाणी फ़ाउण्डेशन की ओर से विशिष्ट अनुवादक पुरस्कार दिया जाता है। यह पुरस्कार भारतवर्ष के उन अनुवादकों को दिया जाता है जिन्होंने निरन्तर और कम से कम दो भारतीय भाषाओं के बीच साहित्यिक और भाषाई सम्बन्ध विकसित करने की दिशा में गुणात्मक योगदान दिया है। इस पुरस्कार की आवश्यकता इसलिए विशेष रूप से महसूस की जा रही थी क्योंकि वर्तमान स्थिति में दो भाषाओं के मध्य आदान-प्रदान को बढ़ावा देने वाले की स्थिति बहुत हाशिए पर है। इसका उद्देश्य एक ओर अनुवादकों को भारत के इतिहास के मध्य भाषिक और साहित्यिक सम्बन्धों के आदान-प्रदान की पहचान के लिए प्रेरित करना है, दूसरी ओर, भारत की सशक्त परम्परा को वर्तमान और भविष्य के साथ जोड़ने के लिए प्रेरित करना है।

वाणी फ़ाउण्डेशन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है भारतीय भाषाओं से हिन्दी व अंग्रेज़ी में श्रेष्ठ अनुवाद का कार्यक्रम। इसके साथ ही इस न्यास के द्वारा प्रतिवर्ष डिस्टिंगविश्ड ट्रांसलेटर अवार्ड भी प्रदान किया जाता है जिसमें मानद पत्र और एक लाख रुपये की राशि अर्पित की जाती हैं। वर्ष 2018 के लिए यह सम्मानप्रतिष्ठित अनुवादक, लेखक, पर्यावरण संरक्षक तेजी ग्रोवर को दिया गया है।

***

विस्तृत जानकारी के लिए हमें ई-मेल करें [email protected]

या वाणी प्रकाशन के इस हेल्पलाइन नम्बर पर सम्पर्क करें : +919643331304

Vani Prakashan
4695/21-A,
Daryaganj,
Ansari Road,
New Delhi 110002

t: +91 11 23273167
f: +91 11 23275710

http://www.vanifoundation.org/

https://twitter.com/vani_prakashan

https://www.facebook.com/vanisamachaar

vaniprakashanblog.blogspot.com



Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top