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चौपाल में नवदुर्गा भक्ति की रसधारा ने सबको भिगोया

मुंबई की चौपाल अपने आप में हर तरह से अनूठी है और इसे अनूठा बनाने का पूरा श्रेय जाता है जाने माने कलाकार, पटकथा लेखक, रंगकर्मी श्री अतुल तिवारी, एकल अभिनय से पूरी दुनिया में विवेकानंद से लेकर तुलसीदास के जीवन चरित्र और भारतीय संस्कृति को जीवंत स्वरूप में पेश करने वाले शेखर सेन और श्री अशोक बिंदल जी की तिकड़ी को। इनमें से किसी एक की भी गैरमौजूदगी चौपाल की रौनक फीकी कर देती है। श्रीमती कविता गुप्ता और दिनेश गुप्ता जी भी अपनी ओर से चौपाल को नए-नए स्वादों से परिचित कराते रहते हैं।

इस बार चौपाल नवदुर्गा पर थी और जाहिर है चौपाल में जब किसी विषय पर चर्चा होती है तो वो एक सार्थक, सकारात्मक और शोधपूर्ण ढंग से ही होती है। चौपाल की खासियत यह है कि यहाँ संगीत का जादू भी बरसता है, संगीत में फिल्मी संगीत कम, शास्त्रीय, पारंपरिक और लोक संगीत के स्वर ज्यादा गूँजते हैं। इस बार चौपाल की शुरुआत कौस्तुभ जी के शास्त्रीय गायन से हुई और उन्होंने हे चामुंडे, जय जय भूतनामि कालरात्रि सर्वमयी प्रस्तुत कर देवी स्तुति से श्रोताओं को शास्त्रीयता में भिगो दिया। शेखर जी ने इस प्रस्तुति का परिचय देकर इसका आस्वाद और बढ़ा दिया। ये बंगाल के जाने माने संगीत गुरू ज्ञान प्रकाश घोष की रचना थी जिसे राग अड़ाना में प्रस्तुत किया गया था। शेखरजी ने कहा, इसे राग दरबारी में तार सप्तक में गाया जाता है, और शास्त्रीय संगीत में स्वर का रूप राग नहीं बल्कि स्वर का भाव ही राग हो जाता है। शेखरजी की इस व्याख्या को सुनकर लगा कि श्रोताओं ने कौस्तुभ जी ने जिस भाव से ये रचना प्रस्तुत की, वह अपने आप में बेमिसाल थी।

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शेखरजी ने इस अवसर पर चौपाल के सबसे बुजुर्ग सदस्य और प्रकांड पंचिज स्व. ब्रह्मशंकरजी व्यास को भी याद किया कि वे किस तरह अपने योगदान से चौपाल को समृध्द करते रहते थे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए अतुलजी ने कहा कि हमारी भारतीय परंपरा में वार त्यौहार मात्र उत्सव ही नहीं हैं बल्कि उनका ग्रहों, सितारों से सीधा रिश्ता है। नवरात्रि चाहे वह शारदेय हो या ग्रीष्म की दोनों ही अवसरों पर दिन और रात बराबर होते हैं और ये शुक्ल पक्ष में ही मनाई जाती है। ये हमारे पूर्वजों की अनूठी खोज है कि उन्होंने हमारे त्यौहारों को इतना विराट स्वरूप प्रदान किया।

श्रीमती श्वेता सेन ने बंगाल की नवरात्रि और संगीत को लेकर रोचक और अद्भुत जानकारियाँ दी। उन्होंने बताया कि नवदुर्गा मात्र दैवीय प्रतीक नहीं बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्सा है। उन्होंने रोचक ढंग से बताया कि किस तरह एक माँ अपने बच्चे को स्कूल भेजने से लेकर दिन भर में घर के कामों में व्यस्त रहते हुए नवदुर्गा के विभिन्न रूपों को साकार करती है। सुबह जल्दी जब माँ बच्चे को स्कूल भेजती है तो वह अन्नपूर्णा की तरह उसके लिए नाश्ता तैयार करती है। फिर लक्ष्मी की तरह उसे पैसे देती है ताकि उसे कोई परेशानी न हो। फिर स्कूल से आने पर सरस्वती की तरह उसे पढ़ाने बैठती है। पढ़ाते समय बच्चा गलती करता है तो काली बनकर उसकी मरम्मत भी कर देती है। जब बच्चा खेलने जाता है और उसका किसी से झगड़ा हो जाता है तो वह दुर्गा बनकर अपने बच्चे का पक्ष लेती है।

कोलकोता की नवदुर्गा परंपरा का उल्लेख करते हुए श्वेताजी ने बताया कि 1931 से कोलकोता रेडियो पर महालय का प्रसारण नवरात्रि के पहले दिन सुबह 4 बजे होता है। आज भी ये सिलसिला जारी है। इसका रोचक पहलू ये है कि संगीतकार पंकज मलिक के निर्देशन में बीरेंद्र कृष्णभद्र ने ये चंडीपाठ किया था। बीरेंद्र कृष्णभद्र अपने जमाने के विख्यात प्रसारणकर्ता, नाटककार और कलाकार थे। उनके द्वारा प्रस्तुत महिषासुरमर्दिनी पूरी दुनिया में प्रसिध्द है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें परंपरागत शास्त्रीय वाद्यों के साथ पश्चिमी संगीत भी शामिल किया गया है, लेकिन ये कार्य इतनी कुशलता से किया गया है कि इसे सुनने के बाद ये पता लगाना मुश्किल है कि इसमें पश्चिमी संगीत का भी उपयोग किए गया है।

श्वेता जी ने बताया कि बचपन में किस तरह घर वाले उन्हें ये सुनने के लिए आधी रात बीतते ही तीन साढ़े तीन बजे उठा देते थे और इसको सुनने के लिए रात को ही रेडिओ कोलकोता रेडिओ स्टेशन पर ट्यून करके रख दिया जाता था और हम बिस्तर में रजाई ओढ़कर इसे सुनते थे। और आज भी इसे सुनते हैं तो वही रोमांच महसूस होता है। इसको सुनने के बाद से ही घर में पूजा और शुध्दता का वातावरण बन जाता था। एक प्रयोग के तौर पर जब 1976 में इसे बंगाली फिल्मों के सुपर स्टार उत्तम कुमार की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया तो सुबह होते होते हजारों लोग कोलकोता के आकाशवाणी केंद्र पहुँच गए और उसे घेर लिया। इसके बाद आकाशवाणी द्वारा षष्ठी के दिन इसका पुनः प्रसारण किया गया।

इस अवसर पर जाने माने गायक सुरजो भट्टाचार्य ने राग विभास (जो दक्षिण भारतीय राग है) में 1969 में बनी फिल्म तलाश का गीत माँ का गीत मेरी दुनिया है तेरे आँचल में प्रस्तुत किया। मजरुह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत का संगीत एसडी बर्मन ने दिया था।

इसके बाद उन्होंने 1959 में बनी उजाला फिल्म का गीत मन्नाडे का गाया ये गीत प्रस्तुत किया जिसे शम्मी कपूर पर फिल्माया गया था। शैलेंद्र के लिखे इस गीत को संगीत दिया था शंकर जय किशन ने। ये गीत आज के हालात पर भी एकदम सटीक बैठता है।

अब कहाँ जाएँ हम ये बता ऐ ज़मीं, इस जहाँ में तो कोई हमारा नहीं
अपने साये से भी लोग डरने लगे, अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं
अब कहाँ जाएँ हम…

कार्यक्रम के संचालन को प्रवाहमान बनाते हुए अतुलजी ने बताया कि किस तरह हमारे देश में एक ही वर्व और त्यौहार अलग अलग जगहों पर अलग ढंग से मनाया जाता है। मैसूर में दशहरा की धूम रहती है तो केरल, तमिलनाडु में लक्ष्मी पूजा का माहौल होता है, दक्षिणी राज्यों में नवरात्रि के दौरान ही दिवाली मनाई जाती है। तेलंगाना में नवरात्रि में महिलाएँ फूलों से श्रृंगार करती है जिसे मुथम्मा कहा जाता है। कश्मीर में खीर भवानी देवी के पूजन के लिए लाखों लोग जुटते हैं।

 

 

इसके बाद उन्होंने भारतीय वार-त्यौहारों, परंपराओं व शास्त्रों पर शोध कर रहे श्री उत्कर्ष पटेल को आमंत्रित किया। उत्कर्ष पटेल ने नवरात्रि के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया में हर जगह मातृशक्ति की ही पूजा होती है। सुमरियन सभ्यता से लेकर ग्रीक, बेबिलोन इजिप्ट और इंडस वैली में पुरातत्विदों को जो सबूत मिले हैं उनमें देवी पूजा की ही महत्व सामने आता है। ऋग्वेद में सरस्वती को वाक् कहा गया है। हमारी परंपरा में पृथ्वी को भी गाय का रुप मानकर इसे दैवी.य स्वरूप दिया गया है। उन्होंने बताया कि पृथु ने कृष्ण का अवतार लिया और पृथु ही पृथ्वी को लेकर आए। कृष्ण का गायों के प्रति प्रेम पृथ्वी के प्रति प्रेम है। उन्होंने कहा कि दुर्गा पूजा का सीधा संबंध ससुराल से बेटी के घर आने का है। जैसे बेटी घर में आती है तो उसे उसकी पसंद की हर चीज बनाकर खाने की आजादी होती है, जो उसे ससुराल में शायद न मिले। महिषासुर मर्दिनी का उल्लेख करते हुए कहा कि देवताओं ने राक्षसों के वध के लिए महिषासुर मर्दिनी को इसलिए भेजा क्यों कि हमारी परंपरा में परिवार में जिस समस्या का कोई हल किसी को न दिखाई दे तो घर की गृहिणी ही उसका हल निकालती है।

काली की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि काली का रूप भयंकर इसलिए है कि उन्हें उस रक्तबीज नाम के राक्षस को मारना था जिसका रक्त धरती पर पड़ते ही नया राक्षस पैदा हो जाता, इसलिए उनकी जुबान इतनी लंबी है कि वो राक्षस के शरीर से खून बहते ही उसे पी जाती थी। उत्कर्षजी ने देश के अलग अलग भागों में देवी के विभिन्न स्वरूपों, उनके महत्व और उनके प्रति लोगों की आस्था को लेकर बहुत ही रोचक ढंग से जानकारी दी।

 

इसके बाद जानी मानी शास्त्रीय गायिका और शोभा गुर्टू की पटु शिष्या श्रोबनी चौधरी ने राग पीलू में मोरे सैंया नहीं आए जियरा जलाए, तुम्हारे दरस को अँखियाँ तरसे से शास्त्रीय सुरों का जादू बिखेरा। इसके बाद उन्होंने बेग़म अख़्तर की ग़ज़ल हमारी अटरिया पे आजा रे सावँरिया, नैन बिथ जई हैनज़र लग जई है गाकर एक नए शास्त्रीय रस का आस्वाद कराया।

 


अनंता सिन्हा ने रामायण में महर्षि वाल्मीकि द्वारा सीता की प्रशस्ति में प्रस्तुत नमामि प्रियं पृथ्वी सुता, शील धारिणी, व्याधिनाशिनी ग्लानि हरिणी आद्यशक्ति को सरस संस्कृत में प्रस्तुत कर सीता के दैवीय स्वरूप से श्रोताओँ का परिचय कराया। इस अवसर पर अनंता ने हनुमानजी पर स्वरचित रचना भी प्रस्तुत की जिसमें वे अपने विराट रूप से अपने भक्तों का परिचय कराते हैं।

 

सुप्रिया झुनझुनवाला ने प्रकृति और जंगल की उन देवियों की चर्चा की जिसकी कल्पना भी हम शायद ही कर सकें। उन्होंने बताया कि पशु समाज किस तरह मातृसत्तात्मक परिवार है और वहाँ केवल मादाओं की ही चलती है। उन्होंने बताया कि जब भी कोई प्राकृतिक आपदा होती है पशु-पक्षियों का व्यवहार बदल जाता है, हम उसे नहीं समझ पाते लेकिन जंगलों में रह रहे आदिवासी उनके व्यवहार को समझते हैं।

 

उन्होंने कहा जहाँ कछुए पैदा होते हैं वे उसी जगह अंडे देने आते हैं। ये ऐसा ही है जैसे गर्भवती होने पर कोई स्त्री ससुराल से पीहर आकर अपने बच्चे को जन्म देने आती है। किंग कोबरा सूखे पत्ते में अंडे देती है ताकि उन अंडों को सूरज की गर्मी सही अनुपात में मिलती रहे। चिड़ियों में नर चिड़िया कड़ी मेहनत करता है और बच्चों के लिए खाने की व्यवस्था करता है। नर मोर नाचता है तो मोरनी उसे साईड से देखती है, उसके सामने नहीं आती, क्योंकि वो ये जताना नहीं चाहती कि वह मोर के नाच से प्रभावित हो रही है।

 

इस मौके पर जाने माने थिएटर कलाकार अजय कुमार ने स्व. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की अमर रचना राम की शक्ति पूजा की कुछ पंक्तियों से एक नए वातावरण की सृष्टि की। कहा जाता है कि जव रावण ने देवी अंबा की आराधना कर उन्हें प्रसन्न कर लिया और देवी को अपने रथ के पीछे बिठा लिया तो राम ने देवी के आवाहन के लिए शक्ति पूजा की थी। इस पूजा के लिए देवी ने ये शर्त रखी थी कि राम अगर एक के बाद एक 108 नीलकमल पूजा में चढ़ाएँगे तो वो राम की प्रार्थना स्वीकार कर लेगी। हनुमानजी ने नीलकमल लाने का दायित्व लिया। राम एक नीलकमल देवी को चढ़ाते और हनुमानजी उसी समय दूसरा नीलकमल लेकर आते। लेकिन राम 108 वाँ नीकमल देवी को नहीं चढ़् पाए। ये देख राम विचलित हो गए कि उनकी पूजा निष्फल हो गई है, लेकिन उन्होंने तत्क्षण अपने तीर कमान निकालकर अपना नैत्र निकालकर देवी को चढ़ाना चाहा, क्योंकि राम के नैनो को राजीव नयन कहा जाता था, राजीव का मतलब कमल होता है। राम के इस समर्पण भाव पर देवी प्रसन्न हुई और कहा देवी ने कहा कि मैं शरीर के साथ रावण के साथ हूँ लेकिन भाव से तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर रही हूँ। इस पूरे दृश्य और भाव को अजय कुमार ने जिस जोश और रागात्मकता के साथ प्रस्तुत किया, उससे ऐसा लगा मानो परदे पर इस दृश्य की फिल्म चल रही है।

कार्यक्रम का समापन शेखरजी, सुरजो भट्टाचार्य और श्रोबनी चौधरी ने सामूहिक रूप से भवानी दयानी, महावात वानी, सुरनर मुनि जन जानी, सकल मूरत जानी, महिषासुर मर्दिनी की प्रस्तुति से किया। कार्यक्रम में तबले पर शंकर नंदी की संगत न होती तो सुर और ताल का मजा शायद ही मिलता।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की राम की शक्ति पूजा पढ़ेंगे तो आपको भी इस प्रस्तुति का आनंद आएगा।

राम की शक्ति पूजा

रवि हुआ अस्त
ज्योति के पत्र पर लिखा
अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।
आज का तीक्ष्ण शरविधृतक्षिप्रकर, वेगप्रखर,
शतशेल सम्वरणशील, नील नभगर्जित स्वर,
प्रतिपल परिवर्तित व्यूह
भेद कौशल समूह
राक्षस विरुद्ध प्रत्यूह,
क्रुद्ध कपि विषम हूह,
विच्छुरित वह्नि राजीवनयन हतलक्ष्य बाण,
लोहित लोचन रावण मदमोचन महीयान,
राघव लाघव रावण वारणगत युग्म प्रहर,
उद्धत लंकापति मर्दित कपि दलबल विस्तर,
अनिमेष राम विश्वजिद्दिव्य शरभंग भाव,
विद्धांगबद्ध कोदण्ड मुष्टि खर रुधिर स्राव,
रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दलबल,
मुर्छित सुग्रीवांगद भीषण गवाक्ष गय नल,
वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल रोध,
गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध,
उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुःप्रहर,
जानकी भीरू उर आशा भर, रावण सम्वर।
लौटे युग दल।
राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल,
बिंध महोल्लास से बार बार आकाश विकल।
वानर वाहिनी खिन्न, लख निज पति चरणचिह्न
चल रही शिविर की ओर स्थविरदल ज्यों विभिन्न।

प्रशमित हैं वातावरण, नमित मुख सान्ध्य कमल
लक्ष्मण चिन्तापल पीछे वानर वीर सकल
रघुनायक आगे अवनी पर नवनीतचरण,
श्लध धनुगुण है, कटिबन्ध त्रस्त तूणीरधरण,
दृढ़ जटा मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वृक्ष पर, विपुल
उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार
चमकतीं दूर ताराएं ज्यों हों कहीं पार।

आये सब शिविर
सानु पर पर्वत के, मन्थर
सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर
सेनापति दल विशेष के, अंगद, हनुमान
नल नील गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान
करने के लिए, फेर वानर दल आश्रय स्थल।

बैठे रघुकुलमणि श्वेत शिला पर, निर्मल जल
ले आये कर पद क्षालनार्थ पटु हनुमान
अन्य वीर सर के गये तीर सन्ध्या विधान
वन्दना ईश की करने को लौटे सत्वर,
सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर,
पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण भल्ल्धीर,
सुग्रीव, प्रान्त पर पदपद्य के महावीर,
यथुपति अन्य जो, यथास्थान हो निर्निमेष
देखते राम को जितसरोजमुख श्याम देश।

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार,
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार,
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल,
भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।
स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय
रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय,
जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त,
एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त,
कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार,
असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार।

ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत
देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन
विदेह का, प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन
नयनों का नयनों से गोपन प्रिय सम्भाषण
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान पतन,
काँपते हुए किसलय, झरते पराग समुदय,
गाते खग नवजीवन परिचय, तरू मलय वलय,
ज्योतिः प्रपात स्वर्गीय, ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,
जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

सिहरा तन, क्षण भर भूला मन, लहरा समस्त,
हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,
फूटी स्मिति सीता ध्यानलीन राम के अधर,
फिर विश्व विजय भावना हृदय में आयी भर,
वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत,
फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,
देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,
ताड़का, सुबाहु बिराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर,

फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो
आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को,
ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ बुझ कर हुए क्षीण,
पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन,
लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन,
खिच गये दृगों में सीता के राममय नयन,
फिर सुना हँस रहा अट्टहास रावण खलखल,
भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्तादल।

बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द,
युग ‘अस्ति नास्ति’ के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य,
साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद,
दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद्
पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम,
जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम।
युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल,
देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।
ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,
सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ,
टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल
सन्दिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल
बैठे वे वहीं कमल लोचन, पर सजल नयन,
व्याकुल, व्याकुल कुछ चिर प्रफुल्ल मुख निश्चेतन।
“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार,
उद्वेल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार,
हो श्वसित पवन उनचास पिता पक्ष से तुमुल
एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल,
शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़,
जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़,
तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष
दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष,
शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव,
जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव
वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश
पहुँचा, एकादश रूद क्षुब्ध कर अट्टहास।
रावण महिमा श्यामा विभावरी, अन्धकार,
यह रूद्र राम पूजन प्रताप तेजः प्रसार,
इस ओर शक्ति शिव की दशस्कन्धपूजित,
उस ओर रूद्रवन्दन जो रघुनन्दन कूजित,
करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल,
लख महानाश शिव अचल, हुए क्षण भर चंचल,
श्यामा के पद तल भार धरण हर मन्दस्वर
बोले “सम्वरो, देवि, निज तेज, नहीं वानर
यह, नहीं हुआ श्रृंगार युग्मगत, महावीर।
अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय शरीर,
चिर ब्रह्मचर्यरत ये एकादश रूद्र, धन्य,
मर्यादा पुरूषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य
लीलासहचर, दिव्य्भावधर, इन पर प्रहार
करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार,
विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध,
झुक जायेगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।”
कह हुए मौन शिव, पतन तनय में भर विस्मय
सहसा नभ से अंजनारूप का हुआ उदय।
बोली माता “तुमने रवि को जब लिया निगल
तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल,
यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह रह।
यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह सह।
यह महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल,
पूजते जिन्हें श्रीराम उसे ग्रसने को चल
क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ? सोचो मन में,
क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रधुनन्दन ने?
तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य,
क्या असम्भाव्य हो यह राघव के लिये धार्य?”
कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन,
उतरे धीरे धीरे गह प्रभुपद हुए दीन।

राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण,
“हे सखा” विभीषण बोले “आज प्रसन्न वदन
वह नहीं देखकर जिसे समग्र वीर वानर
भल्लुक विगत-श्रम हो पाते जीवन निर्जर,
रघुवीर, तीर सब वही तूण में है रक्षित,
है वही वक्ष, रणकुशल हस्त, बल वही अमित,
हैं वही सुमित्रानन्दन मेघनादजित् रण,
हैं वही भल्लपति, वानरेन्द्र सुग्रीव प्रमन,
ताराकुमार भी वही महाबल श्वेत धीर,
अप्रतिभट वही एक अर्बुद सम महावीर
हैं वही दक्ष सेनानायक है वही समर,
फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव प्रहर।
रघुकुलगौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
तुम फेर रहे हो पीठ, हो रहा हो जब जय रण।

कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलनसमय,
तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय!
रावण? रावण लम्प्ट, खल कल्म्ष गताचार,
जिसने हित कहते किया मुझे पादप्रहार,
बैठा उपवन में देगा दुख सीता को फिर,
कहता रण की जयकथा पारिषददल से घिर,
सुनता वसन्त में उपवन में कलकूजित्पिक
मैं बना किन्तु लंकापति, धिक राघव, धिक धिक?

सब सभा रही निस्तब्ध
राम के स्तिमित नयन
छोड़ते हुए शीतल प्रकाश देखते विमन,
जैसे ओजस्वी शब्दों का जो था प्रभाव
उससे न इन्हें कुछ चाव, न कोई दुराव,
ज्यों हों वे शब्दमात्र मैत्री की समानुरक्ति,
पर जहाँ गहन भाव के ग्रहण की नहीं शक्ति।

कुछ क्षण तक रहकर मौन सहज निज कोमल स्वर,
बोले रघुमणि “मित्रवर, विजय होगी न, समर
यह नहीं रहा नर वानर का राक्षस से रण,
उतरी पा महाशक्ति रावण से आमन्त्रण,
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति।” कहते छल छल
हो गये नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल,
रुक गया कण्ठ, चमक लक्ष्मण तेजः प्रचण्ड
धँस गया धरा में कपि गह युगपद, मसक दण्ड
स्थिर जाम्बवान, समझते हुए ज्यों सकल भाव,
व्याकुल सुग्रीव, हुआ उर में ज्यों विषम घाव,
निश्चित सा करते हुए विभीषण कार्यक्रम
मौन में रहा यों स्पन्दित वातावरण विषम।
निज सहज रूप में संयत हो जानकीप्राण
बोले “आया न समझ में यह दैवी विधान।
रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर,
यह रहा, शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर!
करता मैं योजित बार बार शरनिकर निशित,
हो सकती जिनसे यह संसृति सम्पूर्ण विजित,
जो तेजः पुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार,
हैं जिनमें निहित पतन घातक संस्कृति अपार।

शत शुद्धिबोध, सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक,
जिनमें है क्षात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक,
जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित,
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित!
देखा है महाशक्ति रावण को लिये अंक,
लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक,
हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार बार,
निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार।
विचलित लख कपिदल क्रुद्ध, युद्ध को मैं ज्यों ज्यों,
झक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यों त्यों,
पश्चात्, देखने लगीं मुझे बँध गये हस्त,
फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बँधा मैं, हुआ त्रस्त!”

कह हुए भानुकुलभूष्ण वहाँ मौन क्षण भर,
बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान, “रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन!
तब तक लक्ष्मण हैं महावाहिनी के नायक,
मध्य माग में अंगद, दक्षिण-श्वेत सहायक।
मैं, भल्ल सैन्य, हैं वाम पार्श्व में हनुमान,
नल, नील और छोटे कपिगण, उनके प्रधान।
सुग्रीव, विभीषण, अन्य यथुपति यथासमय
आयेंगे रक्षा हेतु जहाँ भी होगा भय।”

खिल गयी सभा। “उत्तम निश्चय यह, भल्लनाथ!”
कह दिया ऋक्ष को मान राम ने झुका माथ।
हो गये ध्यान में लीन पुनः करते विचार,
देखते सकल, तन पुलकित होता बार बार।
कुछ समय अनन्तर इन्दीवर निन्दित लोचन
खुल गये, रहा निष्पलक भाव में मज्जित मन,
बोले आवेग रहित स्वर सें विश्वास स्थित
“मातः, दशभुजा, विश्वज्योति; मैं हूँ आश्रित;
हो विद्ध शक्ति से है खल महिषासुर मर्दित;
जनरंजन चरणकमल तल, धन्य सिंह गर्जित!
यह, यह मेरा प्रतीक मातः समझा इंगित,
मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनन्दित।”

कुछ समय तक स्तब्ध हो रहे राम छवि में निमग्न,
फिर खोले पलक कमल ज्योतिर्दल ध्यानलग्न।
हैं देख रहे मन्त्री, सेनापति, वीरासन
बैठे उमड़ते हुए, राघव का स्मित आनन।
बोले भावस्थ चन्द्रमुख निन्दित रामचन्द्र,
प्राणों में पावन कम्पन भर स्वर मेघमन्द,
“देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधर
शिभित शत हरित गुल्म तृण से श्यामल सुन्दर,
पार्वती कल्पना हैं इसकी मकरन्द विन्दु,
गरजता चरण प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु।

दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,
अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि शेखर,
लख महाभाव मंगल पदतल धँस रहा गर्व,
मानव के मन का असुर मन्द हो रहा खर्व।”
फिर मधुर दृष्टि से प्रिय कपि को खींचते हुए
बोले प्रियतर स्वर सें अन्तर सींचते हुए,
“चाहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इन्दीवर,
कम से कम, अधिक और हों, अधिक और सुन्दर,
जाओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर
तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।”
अवगत हो जाम्बवान से पथ, दूरत्व, स्थान,
प्रभुपद रज सिर धर चले हर्ष भर हनुमान।
राघव ने विदा किया सबको जानकर समय,
सब चले सदय राम की सोचते हुए विजय।
निशि हुई विगतः नभ के ललाट पर प्रथमकिरण
फूटी रघुनन्दन के दृग महिमा ज्योति हिरण।

हैं नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कन्ध
वह नहीं सोहता निबिड़ जटा दृढ़ मुकुटबन्ध,
सुन पड़ता सिंहनाद रण कोलाहल अपार,
उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार,
पूजोपरान्त जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,
मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम,
बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण
गहन से गहनतर होने लगा समाराधन।

क्रम क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस,
चक्र से चक्र मन बढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस,
कर जप पूरा कर एक चढाते इन्दीवर,
निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर।
चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित मन,
प्रतिजप से खिंच खिंच होने लगा महाकर्षण,
संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवीपद पर,
जप के स्वर लगा काँपने थर थर थर अम्बर।
दो दिन निःस्पन्द एक आसन पर रहे राम,
अर्पित करते इन्दीवर जपते हुए नाम।
आठवाँ दिवस मन ध्यान्युक्त चढ़ता ऊपर
कर गया अतिक्रम ब्रह्मा हरि शंकर का स्तर,
हो गया विजित ब्रह्माण्ड पूर्ण, देवता स्तब्ध,
हो गये दग्ध जीवन के तप के समारब्ध।
रह गया एक इन्दीवर, मन देखता पार
प्रायः करने हुआ दुर्ग जो सहस्रार,
द्विप्रहर, रात्रि, साकार हुई दुर्गा छिपकर
हँस उठा ले गई पुजा का प्रिय इन्दीवर।

यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल।
कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल,
ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल।
देखा, वहाँ रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय,
आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय,
“धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका।
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय।

बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।
“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन
“कहती थीं माता मुझको सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मात एक नयन।”
कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त लक लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
ले अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन
जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय।

“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।
देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित।
हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वरवन्दन कर।

“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।



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