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इस्लाम में पुनर्जन्म, सत्य या अर्ध्द सत्य?

यदि मुसलमानों के धर्म ग्रन्थ को देखें तो हमें ज्ञात होता है कि मुसलमान लोग पुनर्जन्म को नहीं मानते| इस कारण ही वह अपने किसी भी मृतक व्यक्ति के पार्थिव शरीर को भूमि में गाड़ते हैं, जिसे कब्र कहा जाता है| वह ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि कयामत के दिन अल्लाह न्याय करने आवेगा और सब पार्थिव शरीरों को कब्रों से निकाल कर उनका न्याय करेगा| मैंने पढ़ा तो नहीं किन्तु अपने मुसलमान सहपाठियों से यह सुना अवश्य था कि अल्लाह न्याय करते हुए उत्तम लोगों को तो दूसरी और अर्थात् स्वर्ग में भेज देगा, जहां बहुत सी हूरें उनकी प्रतीक्षा कर रही होंगी| शेष को इधर रख लेगा|

उनकी इस उक्ति से मेरे मन में एक शंका खड़ी होती है| इधर रख लेगा से क्या भाव है| मैं तो यही समझ पाया हूँ कि यह इधर रखने का अभिप्राय संभवतया पुनर्जन्म से ही होना चाहिए क्योंकि जो उधर गए वह तो स्वर्ग में गए अन्य दोजख में अथवा नरक में गए और हमारा मानना है कि नरक किसी विशेष स्थान का नाम नहीं है, अपितु दु:खों का नाम नर्क है और अल्लाह दुष्ट लोगों को यहीं रख लेता है, जिसका भाव मैं पुनर्जन्म से लगाता हूँ, चाहे मुसलमान लोग यह स्वीकार करें अथवा न करें|

आज तो इस प्रकार के बहुत से साक्ष्य मिल रहे हैं, जिनके आधार पर बहुत से मुसलमान विचारकों ने किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है| इसकी पुष्टि करते हुए स्वामी दर्शनानन्द सरस्वति जी ने अपनी पुस्तकों के संग्रह कुलियाते आर्य मुसाफिर के दूसरे भाग के सप्तम अध्याय पृष्ट संख्या १२१ से १७२ ( सम्पादक राजेन्द्र जिज्ञासु) प्रकाशन वर्ष २०१९ में पुनर्जन्म पर इस्लामी विद्वानों की सम्मितियाँ शीर्षक के अंतर्गत लिखा है कि:-
कीसान्या का सम्प्रदाय
यह कीसान हजरत अली का गुलाम था| और कुछ कहते हैं कि वह मुहम्मद बिन हनीफा का शिष्य था| उसके शिष्य कहते हैं कि वह मरने के पश्चात् पुनर्जन्म तथा रूप बदलना और इस लोक में वापिस आना मानता है|(पृष्ट ८३)

हाशमी सम्प्रदाय से
इस सम्पर्दाय के लोग अबी हाशिम बिन मुहम्मद बिन हनीफा को मानते हैं जो अब्दुल्लाह बिन मुआविया बिन अब्दुल्लाह जफ़र बिन अबी तालिब के सम्प्रदाय से था| इनका मत है कि आत्माएं एक शरीर से दूसरे शरीर में परिवर्तित होती रहती हैं| तथा सुख दु:ख मिलना इन शरीरों में होता है| चाहे मनुष्य शरीर में चाहे पशुओं के शरीर में| और कहता है कि खुदा की आत्मा भी उत्तरती है और उसका अवतार होता है| और उन्होंने पुनर्जन्म मानने के कारण क़यामत के सिद्धांत से इन्कार किया है| इस सम्प्रदाय वाले कुरआन की इस आयत से पुनर्जन्म के सिद्धांत की पुष्टि करते हैं कि:-

लैसा अलल्लजीना आमनू अमिलुस्स्वालिहाते जुनाहूँन् तइमू ….(माएदा आयत ९३)
जो लोग ईमान लाए और शुभ कार्य किये उन पर पाप नहीं है जो कुछ खा चुके|
नबानी तथा रजरी सम्प्रदाय के लोग भी पुनर्जन्म को मानते हैं| ( तारीखे फ्लासफा अरबी पृष्ट ८६,८७)
इतना ही नहीं “गलात् के सब सम्प्रदाय पुनर्जन्म और नवीन वेदान्त को मानते हैं| पुनर्जन्म का सिद्धांत उनको मजूस, मराजकिया के अम्तों तरहा भारत से ब्राहमणों व यूनान के फलास्फरों और सबीन से मिला है| उनका विशवास ईश्वर प्रत्येक स्थान पर विद्यमान है| तथा प्रत्येक भाषा बोलता है| वह प्रत्येक मनुष्य के शरीर में प्रगट है| नवीन वेदान्त भी यह ही तो कहता है कि जीव ईश्वर का अंश है| उनका विशवास है कि ईश्वर के अंश से हलुल होता है| जैसे सूर्य प्रकाश झरोका में अथवा बिल्लैर चमकने की भांति ईश्वर प्रगट होता है|| ईश्वर का पूर्ण अवतार ऐसा ही है| जैसा कि फरिश्ता(देवता) का प्रगट होना शरीर में अथवा शैतान का पशु में प्रगट होना है| पुनर्जन्म के चार प्रकार हैं नस्ख, मस्ख, फस्ख, रस्ख| इन सब का विस्तार मजूस के वर्णन में होगा| इनके मत में सब से उच्च पद फ़रिश्ता का नबी होने का है और सबसे नीचा पद शैतान और जिन भूत का| बिना किसी विस्तार के हमने पुनर्जन्म के सम्बन्ध में सिद्धांत लिख दिया|” ( तारीखे फलसफा अरबी) इसी पुस्तक में लिखा है कि कामिल सम्प्रदाय के लोग व्यक्ति से व्यक्ति पुनर्जन्म को मानते हैं| उनका विचार है कि मृत्यु के द्वारा ही पुनर्जन्म होता है|
सबानी सम्प्रदाय तथा गाली भी पुनर्जन्म को मानते हैं| ( वही पृष्ट ७८ से १०१)

काजी अफदूद्दीन जो सुन्नी विद्वान् थे| अपनी पुस्तक मवाकिफ में पुनर्जन्म के विरुद्ध युक्ति लिखकर कहते हैं कि “कोई युक्ति पुर्जन्म को पूर्णत: काट नहीं सकती| ( तहकीकुत्तनासुख अरबी पृष्ट ४८)

इस प्रकार स्वामी जी ने मुसलमानों तथा उनके ग्रंथकारों में से बहुत से उदाहरण प्रकरण सहित दिए हैं जो पुनर्जन्म को मानने के लिए काफी हैं|

इसी प्रकार मुसलमान कवियों ने भी पुनर्जन्म का गुणगान करते हुए लिखते हैं कि :- इसी प्रकार नीरू नाम का कवि हुआ| उसके उपनाम का कारण यह था कि वह पुनर्जन्म के मत को मानता था| और अपने आप को शैख़ निजामी गंजवी समझता था| इस विचार को प्रगट करते हुए वह इस प्रकार से कहता है कि –
दर गंजए फिरोशुदम् पयेदीद, अज यज्द बराम्दम् चुं खुर्शीद|
हर कास कि चूं मेहर बर सर आयद, हरचंद फिरोर्वाद बरायद||

मैं गाज़ा में मरा और यज्द में सूर्य कि भाँति उत्पन्न हुआ हूँ| जो मनुष्य सूर्य की भाँति बाहर आता है, आवश्यक है कि वह अस्त भी होता है और उदय भी| इस प्रकार के विचार और भी बहुत से कवियों और लेखकों ने पुनर्जन्म के सम्बन्ध में दिए हैं|

मुहम्मद बिन मलिक्दाद प्रसिद्ध शैख़ शमसुद्दीन तबरेजी अर्थात् शम्सत्ब्रेज वली जिन्होंने ६में परलोक गमन किया| पुनर्जन्म पर विशवास रखते थे| और ऐसा ही उनके मित्र मौलाना जलालुद्दीन रूमी भी पुनर्जन्म को मानते थे|

दीवाने शमस्तब्रेज में १२६ बिन्दुओं पर प्रकाश डालते हुए पुनर्जन्म को स्वीकार किया गया है| अत: इस प्रकार के उदाहरणों से पंडित लेखराम जी की पुस्तक भरी हुई है, जिस में सब कुछ सप्रमाण दिया गया है| कहा भी है कि –
वास्तविक बात यह है कि साधारण मूर्ख और अज्ञानी मनुष्य चमत्कारों के बिना वश में नहीं आते| और बुद्धिमान् लोग ऐसे हथकंडों से पूर्व ही अपनी ईश्वर प्रदत्त बुद्धि के अनुग्रह और ईश्वरीय प्रकाश की प्रेरणा से छल कपट में नहीं फंसते| ऐसे नबी सदा यही कामना और प्रार्थना करते तथा वजीफा पढ़ते रहते हैं कि –
अक्ल मंदां बमीरन्द जाहिलान जाए एशां बगीरंद|
तू अपने आपको अपनी कबर पर नियत करता है कबर पर नियत करता है जो मर गया और मैं उस पर नियत करता हूँ कि जो संसार की आत्मा है|

मुसलमानों का हठ
वास्तव में आवागमन के चक्र को न मानना मुसलामानों का हठ ही दिखाई देता है क्योंकि मुसलमानों में ही पुनर्जन्म के अनेक उदाहरण मिलते हैं| इसका प्रथम उदाहरण तो हम पंडित लेखराम जी की पुस्तक कुल्लियात आर्य मुसाफिर के प्रथम भाग पृष्ट ३९५ से उद्धृत कर रहे हैं| इस पुस्तक का पुन: सम्पादन प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने किया है तथा परोपकारिणी सभा अजमेर ने इसे २०१९ में प्रकाशित किया है| इस में लिखा है कि सन् १९२९ ईस्वी में आर्य समाजी प्रकाशक धर्मवीर महाशय राजपाल की मतांध मुल्लाओं ने इल्लामुद्दीन नामक मुसलमान् हत्यारे के हाथों हत्या करवा दी| हत्यारा भाग गया किन्तु आर्य वीर उसे पकड़ने में सफल हुए और उसे पुलिस को सौंप दिया| केस चला | पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने उसे बचाने की कोशिश की किन्तु अंत में उसे फांसी पर लटका ही दिया गया| इसके लम्बे समय पश्चात् सन् १९८२ ईस्वी में लाहौर से राय मुहम्मद इकबाल ने “ गाजी इल्मुद्दीन शहीद” नाम से २२५ पृष्ट की जीवनी लिखकर प्रकाशित करवा दी| इस पुस्तक के कुछ रोचक प्रसंग यहाँ दर्शनीय हैं|

१ गाजी इल्ल्मुद्दीन हत्यारा फांसी की कोठरी से सातवें आसमान पर हजरत मुहम्मद के पास पहुँच गया और लौटकर सकुशल फंसी चढ़ने के लिए काल कोठारी पहुँच गया|

२ हत्यारे को फाँसी चढ़ाया गया| उसका फिर लाहौर में ही अपने ही परिवार में पुनर्जन्म हो गया| इस्लाम ने इस कहानी को प्रकाशित प्रचारित करके पुनर्जन्म के अटल सत्य को वैदिक सिद्धांत पर एक बार फिर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी|….यह समाचार पुस्तक रूप में बहुत लम्बे समय तक रुका रहा, यह तो उसके जन्म लेते ही छप जाना चाहिए था| हमें उसी समय पता चल जाता तो हम भी आलमे इस्लाम के सब उलेमा को उसके जन्म पर बधाई देने अवश्य पहुंचते|

मिर्जा गुलाम अहमद के पास कादियान में एक खूनी फ़रिश्ता आया| उसने मिर्जा से पंडित लेखराम जी का अता पता पूछा| अल्लाह के पास पंडित जी का अता पता नहीं होगा| मिर्जा ने ही लिखा है कि उसने मुझ से एक अन्य व्यक्ति का नाम लिया “ और कहा कि बोह कहाँ है|”
दृष्टव्य : बुराहीने अहमदिया लेखक मिर्जा गुलाम अहमद पृष्ट २८४

इसी पृष्ट पर पाद टिपण्णी में उस खुनी फरिश्ते से अपनी भेंट व संवाद के बारे में यह लिखा है “ उस खूनी फ़रिश्ते ने उसका नाम तो लिया मगर मुझे याद न रहा|” जब स्वामी श्रद्धानंद जी का बलिदान हुआ तो कादियानी खलिफा महमूद व लाहौरी पार्टी के मिर्जई प्रमुख गद् गद् होकर लेख प्रकाशित किये कि खूनी फ़रिश्ते ने जिस दूसरे आर्य की मौत के लिए पता पूछा था वोह स्वामी श्रद्धानद ही था| सन् १८९७ से लेकर सन् १९२६ तक मिर्जाइयों ने दूसरे व्यक्ति का नाम कभी लिया ही नहीं| फ़रिश्ता २ अप्रैल १८९३ को कादियान पहुंचा था| गुलाम अहमद अगस्त १९०८ तक जीवित रहा| इन पंद्रह वर्षों में नबी ने भी अल्लाह से पूछकर दूसरे व्यक्ति का नाम, जो भूल गया था, नहीं बताया| सन् १८९७ से सन् १९२६ तक इन २९ वर्षों में वह हत्यारा – खूनी फरिश्ता लाहौर की अंधी गलियों में ही भटकता रहा| न जाने वह कैसे सन् १९२६ में स्वामी जी क पता पाकर दिल्ली पहुँच सका|

पंडित लेखराम जी की ह्त्या करने के पश्चात् वह पकडा न गया| भाग खडा हुआ| फ़रिश्ता जो था परन्तु दिल्ली में ……….फांसी पर चढ़ा दिया| …………… महाशय राज पाल जी के हत्यारे इल्मुद्दीन के जीवनी लेखक ने लिखा है, “ वैसे तो दर्जनों ऐसी घटनाएँ हैं जिन्हें लिखने के लिए एक पृथक पुस्तक की आवश्यकता है, परन्तु कुछ अत्यावश्यक है| मियाँ इल्मुद्दीन की विरह में शोकाकुल उसकी माँ प्राय: व्याकुल रहा करती थी| एक रात प्रशंसित शहीद ने अपनी पड़ोसन चिराग बीबी से सपने में भेंट की और कहा, मेरी माननीया माँ से कह देना वह रोया न करे मैं शीघ्र ही घर आउंगा| उसके दो तीन दिन पश्चात् ही आपके सगे भतीजे शेख रशीद अहमद का जन्म हुआ| इस घटना का उल्लेखनीय पहलु यह है कि जन्म शनिवार के दिन अढाई बजे हुआ| निवास भी वही था जिसमें गाजी ने सपना देखा था| ये सब चिन्ह उस दिन से अनुरूपता रखते हैं जिस दिन राजपाल का वध करके बंदी बनाया गया था|” दृष्टव्य: गाजी इल्मुद्दीन शहीद, पृष्ट ११२ लेखक राय मुहम्मद कमाल …. कर्मफल और आवागमन अथवा पुनर्जन्म एक ही सिक्के के दो पहलु हैं|

इस दिए गए उदाहरण से स्पष्ट होता है कि गाजी इल्मुद्दीन का पुनर्जन्म हुआ और वह भी उसी परिवार में जिससे वह गया था| इस प्रकार के उदाहरणों की हमारे पास भरमार है, जिनसे पता चलता है कि मुसलमान चाहे माने अथवा न माने किन्तु अनेक लोग इनके परिवारों में जन्म ले चुके हैं, जिनसे पुनर्जन्म की कहानी पर प्रकाश पड़ता है और अनेक मुस्लिम लेखकों ने पुनर्जन्म की बात को अपने लेखनों में स्वीकार भी किया है| अत: मुसलामानों में भी पुनर्जन्म एक सत्य है|

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