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राम जन्म भूमि याद है, सीता जन्म भूमि को भूल गए

राम जन्म भूमि के लिए हम दशको से लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसा भी है जो हमारी घोर उपेक्षा का शिकार है।सीताराम, राधेश्याम या गौरीशंकर जब भी इनकी पूजा होती है तो हम मां सीता राधा गौरी देवी का सम्बोधन अवश्य करते है देवीओन का नाम देवताओं से पहले आता है ।फिर क्यों माँ सीता की जनमस्थली सीतामढ़ी को हमने जीर्ण शीर्ण हालात में छोड़ दिया है।भारत में मां दुर्गा के शक्तिपीठो में एक बार दर्शन करना हर हिन्दू का सपना होता है और पूरे भक्तिभाव से हम पहुंचते भी है लेकिन सीता मैय्या की जन्मस्थली,राजऋषि जनक की तपोभूमि उपेक्षा का शिकार रही है।ब्रिटिश साम्राज्यवाद के बाद तथाकथित सेकुलर पार्टियो और भी राजद के अंध राज में भी ये स्थल बुरी तरह उपेक्षित था।शेष देशवासियो के लिए बिहार झुमरी तलैया ही रहा।

पान मखान मछली पोखर जहां सिर्फ संस्कृति का हिस्सा ही नही है बल्कि जीवन मे रच बस चुके है।गर्मियो में जब सारा देश सूखे की चपेट में पानी का रोना रोता है तब मिथिलांचल के लबालब भरे सैकड़ो तालाब पानी से गुलज़ार रहते है।देश के किसी भी ख़ूबसूरत मनोरम क्षेत्र से कम नही है तालाब नदिया पहाड़ लहलहाते खेत सड़के ऐसा क्या नही है जिसकी कल्पना आप केरल या गोआ में करते हैं।ये ऐसा पर्यटन स्थल है जो आपको प्राकृतिक नैसर्कगिकता का आभास करवाता है। चूड़ा दही सत्तू भुगनी,अदौरी,तिलकोर अरकोंच के पत्ते का तिलकोर और सब्जी और तरह तरह के पारंपरिक व्यंजन से दुनिया का शायद ठीक से परिचय ही नही हुआ है।बरसो तक बिहार वासियो को बिहारी या लालू कह कर उनकी सभ्यता संस्कृति का मज़ाक उड़ाया गया जबकि सबसे ज्यादा प्रशाशनिक अधिकारी,सांसद ,मंत्री और पड़े लिखे युवा इस क्षेत्र से आते है लेकिन दशको तक सेकुलरवादी राजनीति इसके विकास पर हावी रही।

आज छठ महापर्व दीवाली या होली से ज्यादा प्रचलित है और देशभर में ही नही विदेशो में भी मनाया जाता है।गर्मियो की छुट्टी में सालभर बचाये पैसो से ज्यादातर लोग या तो चंद रोज़ के लिए पहाड़ो पर जाते है या ऐसी की ठंडी हवा खाते हैलेकिन कभी सोचा है दिल्ली मुम्बई की सुविधासंपन्न ज़िन्दगी को छोड़ लाखो बिहार निवासी ट्रैन में भेड़ो की लटक कर,या कितनी भी ऊंची दर पर टिकट खरीदकर अपने घर क्यो जाता है । सीधा सा उत्तर आपका होगा मातृभूमि से प्रेम या अपनो से मिलना।कुछ हद तक आप ठीक है लेकिन उत्तर इस्से कहीं बढ़ा है वहां अगर बिजली न भी हो लेकिन प्रकृतिक रूप से इतना धनी है कि गर्मी की तपिश में आपको अंतर मालूम होगा जहां तहां आम लीची केले से लदे बागान है लहलहाते खेत सुकून देंगे।त्योहारों का स्वाद शहर भले ही भूल गया हो लेकिन बिहार के गाओं में अब भी बरकरार है ।खैर बात सीता जी की जन्मस्थली की हो रही थी रामजन्म भूमि के लिए आंदोलन तो बहुत हो गया अब सीता मैय्या का भी भव्य मंदिर बनना चाहिए जिसकी जरूरत बहुत पहले से थी लेकिन अब भी देर नही हुई है। यहां चप्पे चप्पे पर रामायण के निशानिया मिल जायेगी चाहै सीता कुंड हो या अहिल्या स्थान हो या स्वयम्बर स्थल हो।कण कण में सीताराम के दर्शन होंगे ।ये पवित्र स्थल हमारी धरोहर है जानकी मंदिर आस्था का केंद्र है।लेकिन उपेक्षा की वजह से भक्तों की नज़रों से दूर रहा।हाल ही मे सीता नवमी थी जो उनके जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है आप मे से कितनो को पता रह ये जरूरी नही लेकिन संभव हो तो एक बार जरूर जाए।
सिद्धार्थ झा

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