ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

प्लास्टिक प्रदूषण-मुक्त भारत का संकल्प

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को स्वच्छ भारत मिशन के तहत प्लास्टिक कचरे से मुक्त करने की अपील करते हुए एक महाभियान का श्रीगणेश गांधी जयंती के अवसर पर करने का संकल्प व्यक्त किया है। उन्होंने लोगों से अपील की कि दो अक्टूबर के दिन वे सारा सिंगल यूज प्लास्टिक इकट्ठा करें। अपने नगर निगम के पास या स्वच्छता कर्मचारी के पास सारा प्लास्टिक जमा कराएं और देश को सिंगल यूज प्लास्टिक से मुक्त करने में सहयोग दें। प्रकृति को पस्त करने, मानव जीवन एवं जीव-जन्तुओं के लिये जानलेवा साबित होने के कारण समूची दुनिया बढ़ते प्लास्टिक के उपयोग एवं उसके कचरे से चिन्तित है। देखने में आ रहा है कि कथित आधुनिक समाज एवं विकास का प्रारूप अपने को कालजयी मानने की गफलत पाले हुए है और उसकी भारी कीमत भी चुका रहा है। लगातार पांव पसार रही तबाही इंसानी गफलत को उजागर तो करती रही है, लेकिन समाधान का कोई रास्ता प्रस्तुत नहीं कर पाई। ऐसे में अगर मोदी सरकार ने कुछ ठानी है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए। क्या कुछ छोटे, खुद कर सकने योग्य कदम नहीं उठाये जा सकते?

प्लास्टिक के कारण देश ही नहीं दुनिया में विभिन्न तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं। इसके सीधे खतरे दो तरह के हैं। एक तो प्लास्टिक में ऐसे बहुत से रसायन होते हैं, जो कैंसर का कारण माने जाते हैं। इसके अलावा शरीर में ऐसी चीज जा रही है, जिसे हजम करने के लिए हमारा शरीर बना ही नहीं है, यह भी कई तरह से सेहत की जटिलताएं पैदा कर रहा है। इसलिए आम लोगों को ही इससे मुक्ति का अभियान छेड़ना होगा, जागृति लानी होगी।

प्लास्टिक हमारे शरीर और पर्यावरण को कितना नुकसान पहंुचा सकता है, इसे हम पिछली सदी का अंत होते-होते अच्छी तरह समझ चुके थे। लेकिन यह भी सच है कि इतने साल बीच जाने के बावजूद न तो हम इसका विकल्प खोज सके और न ही इसका इस्तेमाल बढ़ने की दर ही थाम सके। पिछली सदी में जब प्लास्टिक के विभिन्न रूपों का अविष्कार हुआ, तो उसे विज्ञान और मानव सभ्यता की बहुत बड़ी उपलब्धि माना गया था, अब जब हम न तो इसका विकल्प तलाश पा रहे हैं और न इसका उपयोग ही रोक पा रहे हैं, तो क्यों न इसे विज्ञान और मानव सभ्यता की सबसे बड़ी असफलता मान लिया जाए?
वैज्ञानिकों ने पाया है कि प्लास्टिक हम सबके शरीर मेें किसी न किसी के रूप में पहुंच रहा है। कैसे पहंुच रहा है, इसे जानने के लिए हमें पिछले दिनों अमेरिका के कोलोराडो में हुए एक अध्ययन के नतीजों को समझना होगा। अमेरिका के जियोलॉजिकल सर्वे ने यहां बारिश के पानी के नमूने जमा किए। ये नमूने सीधे आसमान से गिरे पानी के थे, बारिश की वजह से सड़कों या खेतों में बह रहे पानी के नहीं। जब इस पानी का विश्लेषण हुआ, तो पता चला कि लगभग 90 फीसदी नमूनों में प्लास्टिक के बारीक कण या रेशे थे, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि हम इन्हें आंखों से नहीं देख पाते।

पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन चुके जल और वायु प्रदूषण से बचने के लिए विश्वभर में नए-नए उपाय किए जा रहे हैं। जबकि प्लास्टिक प्रदूषण की उससे भी ज्यादा खतरनाक एवं जानलेवा स्थिति है, यह एक ऐसी समस्या बनकर उभर रही है, जिससे निपटना अब भी दुनिया के ज्यादातर देशों के लिए एक बड़ी चुनौती है। कुछ समय पहले एक खबर ऐसी भी आई थी कि एक चिड़ियाघर के दरियाई घोड़े का निधन हुआ, तो उसका पोस्टमार्टम करना पड़ा, जिसमें उसके पेट से भारी मात्रा में प्लास्टिक की थैलियां मिलीं, जो शायद उसने भोजन के साथ ही निगल ली थीं। लेकिन अगर आप सोचते हैं कि प्लास्टिक सिर्फ हमारे आस-पास रहने वाले अबोध जानवरों के पेट में ही पहंुच रहा है, तो आप गलत हैं। हाल में हुए एक शोध के अनुसार एक वर्ष में एक वयस्क इंसान 52 हजार से ज्यादा प्लास्टिक के माइक्रो कण खाने-पानी और सांस के जरिए निगल रहा है। अध्ययन में पता चला था कि लगभग सभी ब्रांडेड बोतल बंद पानी में भी प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण मौजूद हैं। कनाडाई वैज्ञानिकों द्वारा माइक्रोप्लास्टिक कणों पर किए गए विश्लेषण में चैंकाने वाले नतीजे मिले हैं। विश्लेषण में पता चला है कि एक वयस्क पुरुष प्रतिवर्ष लगभग 52000 माइक्रोप्लास्टिक कण केवल पानी और भोजन के साथ निगल रहा है। इसमें अगर वायु प्रदूषण को भी मिला दें तो हर साल करीब 1,21,000 माइक्रोप्लास्टिक कण खाने-पानी और सांस के जरिए एक वयस्क पुरुष के शरीर में जा रहे हैं।

माइक्रोप्लास्टिक हमारे वातावरण का एक हिस्सा बन चुके हैं। प्लास्टिक की बहुलता एवं निर्भरता के कारण मौत हमारे सामने मंडरा रही है। हम चाहकर भी प्लास्टिकमुक्त जीवन की कल्पना नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि माइक्रोप्लास्टिक हवा में हैं, पानी में हैं, नदी में हैं, समुद्र में हैं, बारिश में हैं, और इन सबके चलते वे हमारे भोजन में भी हैं, हम मनुष्यों के भी, पशुओं के भी और शायद सभी प्राणियों के जीवन में भी हैं। आप चाहे मांसाहारी हों या शाकाहारी हों, पर इसके साथ ही आप प्लास्टिकहारी भी बन चुके हैं। आप व्रत या रोजा रख सकते हैं, लेकिन इस दौरान भी आप हवा में तैरते माइक्रोप्लास्टिक को सांस के साथ शरीर में घुसने से नहीं रोक सकते।

भारत में अगर प्लास्टिक प्रदूषण की बात करें तो यहां यह समस्या और भी विकराल है। यहां प्लास्टिक कचरे का निस्तारण तो दूर, इसके सही से संग्रहण और रख-रखाव की व्यवस्था भी नहीं है। आलम यह है कि भारत में सड़क से लेकर नाली, सीवर और घरों के आसपास प्लास्टिक कचरा हर जगह नजर आता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन लगभग 26 हजार टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। भारत में हर साल प्रति व्यक्ति प्लास्टिक का प्रयोग औसतन 11 किलो है, जबकि अमेरिका में एक व्यक्ति द्वारा प्लास्टिक प्रयोग का सालाना औसत 109 किलो का है। हर साल उत्पादित होने वाले कुल प्लास्टिक में से महज 20 फीसद ही रिसाइकिल हो पाता है। 39 फीसद जमीन के अंदर दबाकर नष्ट किया जाता है और 15 फीसद जला दिया जाता है। प्लास्टिक के जलने से उत्सर्जित होने वाली कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा 2030 तक तीन गुनी हो जाएगी, जिससे हृदय रोग के मामले में तेजी से वृद्धि होने की आशंका है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश समेत लगभग सभी राज्यों ने सिंगल युज प्लास्टिक पर रोक लगाई है लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि देश में प्लास्टिक की प्रति व्यक्ति सालाना खपत पिछले 5 सालों में दोगुनी से ज्यादा हो गई है। देश में इसकी मैन्युफैक्चरिंग और इंपोर्ट भी बढ़ रही है। इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर के आंकड़ों के मुताबिक देश के प्लास्टिक इंपोर्ट में 2017 के मुकाबले 2018 में 16 फीसदी की तेजी आई है और ये 15 बिलियन डॉलर को पार कर गया है। अमेजन एवं फिलीपकार्ट जैसे आनलाइन व्यवसायी प्रतिदिन 7 हजार किलो प्लास्टिक पैकेजिंग बैग का उपयोग करते हैं।

सरकारों के पास किसी भी नियम या अभियान को अमल में लाने के लिये सारे संसाधन उपलब्ध हैं, इन कम्पनियों को भी प्लास्टिकमुक्त भारत के घेरे में लेने के लिये कठोर कदम उठाने चाहिए। तभी देश को सिंगल यूज प्लास्टिक -एक बार प्रयोग होने वाली प्लास्टिक से मुक्त बना पाएगी। व्यापारियों और दुकानदारों को देश को प्लास्टिक मुक्त करने में अपना पूरा योगदान देना होगा। उनके विशेष सहयोग की आवश्यकता है और बिना उनके आगे आए देश को इस मुसीबत से मुक्त नहीं किया जा सकता। दुकानदार कई तरह के बोर्ड लगाते हैं। अब वह एक बोर्ड और लगाएं कि हमसे प्लास्टिक बैग की इच्छा न करें। जानकारों का कहना है कि सरकार को प्लास्टिक बैन करने के साथ-साथ इसके वैकल्पिक उपायों की खोज करनी होगी। प्रधानमंत्री मोदी की अपील इसे जन- जन का अभियान तो बना सकती है लेकिन रिसर्च पर खर्च बढ़ाना और प्लास्टिक से सस्ते विकल्प ढ़ूंढना बड़ी चुनौती होगी।

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

image_pdfimage_print


Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top