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रिज़वानः आधुनिक परीकथा का तिलस्मी नायक

स्कूल छोड़कर जिंदगी की किताबें पढ़कर 9 देशों में फैलाया कारोबार

रिज़वान अड़तिया से मेरी मुलाकात अचानाक ही मेरे मित्र श्री योगेश लखानी के कार्यालय में हुई। योगेश लखानी खुद भी बहुआयामी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत, ईमानदारी और सहज-सरल व्यक्तित्व से मुंबई के फिल्मी और कॉर्पोरेट जगत में ऐसी धाक जमाई है कि किसी भी फिल्म या बड़े प्रोडक्ट को जब तक लखानी जी की कंपनी ‘ब्राईट’ के होर्डिंग पर जगह नहीं मिलती, तब तक मुंबई में उस फिल्म या प्रोडक्ट की पहचान ही नहीं बन पाती…खैर योगेशजी के बारे में फिर कभी बात करेंगे।

बात करते हैं रिज़वान भाई की। योगेशजी ने साधारण सा परिचय कराया ये मेरे मित्र हैं, दक्षिण अफ्रीका से आए हैं…बस इतनी छोटी सी मुलाकात मगर जैसे ही रिज़वान भाई से बातचीत शुरु हुई तो ऐसा लगा मानो कोई खज़ाना हाथ लग गया है। मासूम सा चेहरा, दमकता व्यक्तित्व और मन में हजारों सपनों की उड़ानों से सराबोर इस अद्भुत व्यक्ति ने जैसे कुछ ही क्षणों में सम्मोहित सा कर दिया। हालाकि उनसे बहुत कम बात हो पाई मगर उनके व्यक्तित्व के कई आयामों का पता चल गया।

उनके अभिन्न मित्र श्री रुपेश भाई उनके साथ थे, मैने रुपेश जी से संपर्क कर रिज़वान भाई के बारे में जो जाना वो किसी परीकथा जैसा रोमांचक, किसी फिल्म की कहानी जैसा अविश्वसनीय लगा।

गुजरात के पोरबंदर में जन्में 7 भाईयों व माता-पिता के साथ बेहद गरीबी में दिन गुजारने वाले रिज़वान ने बचपन से ही ठान लिया था कि वो समाज के लिए कुछ करेगा। पिता मूँगफली बेचकर घर पाल रहे थे तो रिज़वान और इनके भाईयों की पढ़ाई कैसे होती। मगर रिज़वान तो किसी और ही मिट्टी के बने थे, पढ़ने का ऐसा चस्का लगा कि साहित्य से लेकर हर धर्म की किताबें पढ़ने लगे। इसका असर ये हुआ कि बचपन से ही धार्मिक और सेवा का भाव मन में पैदा हो गया। उन्होंने स्कूली किताबें बहुत नहीं पढ़ी मगर जो किताबें पढ़ी उनको आचरण में लाकर खुद ही किताब बन गए। 14 साल की उम्र से सुबह ( या यों कहिए कि तीसरे पहर रात) 3 बजे उठने की आदत डाली और आज भी वे 3 बजे उठकर तीन से चार घंटे ध्यान, साधना और अवचेतन मन की ऊर्जा को जाग्रत करने में देते हैं। इसके बाद दुनियादारी के कामों में लग जाते हैं।

रिज़वान भाई का स्कूली किताबों में कभी मन नहीं लगा और ये दसवीं में फेल हो गए। मगर इन्होंने हिम्मत नहीं हारी। फेल होने के बाद ये पोरबंदर के ही एक श्रृंगार की दुकान माधुरी नॉवेल्टी के मालिक के पास पहुँच गए कि मैं आपके यहाँ काम करना चाहता हूँ मगर आपसे पैसे नहीं लूंगा। हैरान-परेशान दुकान मालिक ने पूछा कि भाई पैसे क्यों नहीं लोगे, तो रिज़वान ने पूरे आत्मविश्वास से जवाब दिया मैं तो काम सीखना चाहता हूँ तो आपसे पैसे क्यों लूँ। इनका जवाब सुनकर दुकान मालिक ने इनको नौकरी पर रख दिया और दुकान मालिक को आश्चर्य इस बात पर हुआ कि एक महीने में उनके यहाँ बिक्री चार गुना बढ़ गई। रिज़वान ने दुकान पर आने वाले ग्राहकों पर ऐसा जादू चलाया कि कोई भी ग्राहक सामान खरीदे बगैर जाता ही नहीं। इस पर दुकान मालिक ने सोचा कि इतने संस्कारवान, चरित्रवान और ईमानदर बच्चे को मैं काम करने के पैसे नहीं दूं तो ये तो अन्याय ही होगा। एक महीना होते ही दुकान मालिक ने रिज़वान के हाथ में 140 रुपये रख दिए।

140 रुपये हाथ में देखकर रिज़वान को लगा जैसे कोई खजाना हाथ आ गया है। ये पैसे घर वालों पर कैसे खर्च करेंगे इसके सपने देखने लगे। रात को ये अपने टूटे फूटे घर के बाहर बैठे ते कि एक बुजुर्ग इनके पास आया और मेडिकल स्टोर का पता पूछा। उस बुजुर्ग ने बताया कि उसके बेटे का बेटा बहुत बीमार है और उसके लिए दवाई लेना है। रिजवान भाई उसे खुद अपनी साईकिल पर बिठाकर मेडिकल स्टोर पर लेकर गए। बुजुर्ग के पास दवाई के पूरे पैसे नहीं थे और मेडिकल वाला कम पैसे में दवाई देने को तैयार नहीं था। ये देखकर रिज़वान ने अपनी जेब में रखे पैसे मेडिकल वाले को दे दिए और बुजुर्ग को दवाई दिलवा दी। इसके बाद जब बुज़ुर्ग ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए सिर पर हाथ रखा और कहा कि तुझे जिंदगी में कभी कोई परेशानी नहीं आएगी। इन्हें लगा कि ये सुख, ये आनंद तो मैं पैसे से खरीद ही नहीं सकता हूँ। बस तभी से धुन लग गई कि परोपकार से बड़ा कोई काम नहीं।

1986 में इस घटना के दो महीने बाद ही इनके बड़े भाई जो अफ्रीका में के कोंगो में एक किराने की दुकान चलाते थे।उन्होंने अपने छोटे भाई रिज़वान को जब वहाँ बुलाया तो वे अपने भाई के बुलावे पर दक्षिण अफ्रीका के कोंगो में चले गए।

उन दिनों अफ्रीका के कुछ देशों में हालात बेहद खराब थे। सैनिकों को तीन महीने का वेतन नहीं मिला था। जिसके चलते वहां विद्रोह हो गया और दंगों में रिजवन के भाई की दुकान और उनके गौदाम लूट लिए गए। इसके बावजूद भी रिजवान और उनके भाई ने हिम्मत नहीं हारी और माहौल शांत हो जाने के बाद एक बार फिर अपनी मेहनत और लगन से अपने कारोबार को शुरू किया। वहाँ बाकी स्टोर वाले अपने माल को 100 फीसदी प्रॉफिट पर बेचते थे, वहीं रिजवान के स्टोर में वही सामान 30 फीसदी मुनाफे पर बेचा जाता था। इसी वजह से उनके स्टोर में ग्राहकों की भीड़ बढ़ती गई और देखते ही देखते रिजवान ने अफ्रीका के बाकी कई शहरों में भी अपने बिजनेस का विस्तार किया।

रिज़वान की ईमानदारी और काम के प्रति लगन को देखते हुए हुए वहां के बड़े व्यापारी उन्हें बिना किसी शर्त के उधारी पर माल दे दे ते थे। कई बार रिजवान अग्नि परीक्षा से गुज़रना पड़ा और उनका जमा जमाया कारोबार शून्य पर आ गया मगर रिज़वान ने कभी हिम्मत नहीं हारी और हर चुनौती को एक नए अवसर के रूप में स्वीकार कर अपना काम आगे बढ़ाते गए।

उनका मानना है कि जीवन में जो भी कुछ नकारात्मक होता है वहवह किसी न किसी फायदे के लिए ही होता है, ये आप पर है कि आप उसे किस तरह से लेते हैं। पिछले 35 सालों से रिजवान अफ्रीका में रह कर अपने बिजनेस को लगातार बढ़ा रहे हैं।

वहाँ काम करने के साथ ही परोपकार करने की ऐसी धुन लगी कि जीवन का हर दिन किसी न किसी परोपकार से शुरु करते हैं। और इसी परोपकार की बदौलत रिज़वान भाई का कारोबार आज दुनिया के 11 देशों में फैला हुआ है। इनके विशाल 200 स्टोर हैं। ये स्टोर मुंबई के डी मार्ट या इनऑर्बिट की तर्ज पर हैं। इनके पास 3500 कर्मचारियों की फौज है।

जबकि एक दौर ऐसा भी आया जब अफ्रीका के कुछ देशों में हालात बेहद खराब थे। सैनिकों को तीन महीने का वेतन नहीं दिया गया था। जिसके चलते वहां विद्रोह हो गया और दंगों में रिजवन के भाई की दुकान और उनके गौदाम लूट लिए गए।

रिज़वान भाई की एक और विशेषता जानकर तो उनके प्रति सिर सम्मान से झुक गया। वे अपने स्टोर में शराब और सिगरेट नहीं बेचते, जबकि दक्षिण अफ्रीका में इन चीजों का करोड़ों का कारोबार है।

आज रिज़वान भाई अपने सभी भाईयों व परिवार के साथ रहते हैं। इनकी पत्नी प्रतिदिन दक्षिण अफ्रीका में 250 लोगों को अपने हाथ से खाना खिलाती है इसके बाद पूरा घर खाना खाता है। वे रिज़वान फाउंडेशन का पूरा काम देखती है। दो बेटियाँ कॉलेज में पढ़ रही है।

उन्होंने ‘मिशन २०१५-३०’ के माध्यम से यह स्वप्न देखा है कि जरूरतमंद लोगों का जीवन स्तर सुधारा जाये जिससे उनके उन्हें आंतरिक शांति प्राप्त हो सके। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये उन्होंने इन १५ सालों में विभिन्न ऐसे एनजीओ की सहायता करना की योजना बनायी है जो जरूरतमंद लोगों की किसी न किसी प्रकार से सहायता करती है। मोजाम्बिक के साथ ही उन्होंने भारत में भी इस मिशन का विस्तार करने की योजना बनाई है। रिजवान आडतिया फाउंडेशन ने २०३० तक १० लाख जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य बनाया है और इस दिशा में अपने हाथ फैलाने शुरू भी कर दिए हैं

विदेशों में करोड़ों अरबों का कारोबार होने के बावजूद रिज़वान भाई हर महीने में एक या दो बार भारत आते हैं और देश के कोने कोने में इनसे सेवा कार्य चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के नक्सली क्षेत्र में इन्होंने सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है।

गुजरात के एक गाँव मालाहाटीना का इन्होंने गोद लिया है और वहाँ वे खुद जाकर गाँव के बुजुर्गों के साथ पूरा दिन बिताते हैं। बुजुर्ग इनके साथ खेलते हैं, गाने गाते हैं, मस्ती करते हैं।

गाँव को इन्होंने एक ऐसे आदर्श गाँव में विकसित कर दिया है कि हर राज्य के मुख्य मंत्री व मंत्री उसे देखने आते हैं। गरीब बुजुर्गों को जिनके पास पासपोर्ट तक नहीं होता उनका पासपोर्ट बनवाकर उन्हें क्रूज़ की सैर करवाते हैं और खर्च के लिए 500 डॉलर भी देते हैं।

डॉ. शरद ठाकर ने रिज़वान भाई की ज़िंदगी के तमाम उतार-चढ़ावों पर गुजराती में एक पुस्तक भी लिखी है जो फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है।

इसके अलावा दुनिया के जिन देशों में भी उनका कारोबार है, वहाँ उनके रिज़वान फाउंडेशन द्वारा सामाजिक कार्य लगातार किए जा रहे हैं।

दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से लेकर देश की कई संस्थाएँ उन्हें सम्मानित कर चुकी है।

रिज़वान का अर्थ होता है- जन्नत के दरवाजे का प्रहरी- और रिज़वान भाई उसी प्रहरी की भूमिका बखूबी निभा रहे हैं….

रिज़वान भाई के काम और कारोबारों के बारे में विस्तार से जानकारी इस वेब साईट  पर उपलब्ध है।

रिज़वान भाई के यू ट्यूब  का लिंक

 

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