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पद यात्राओं का दौर

हमारे देश में पैदल-यात्राओं का लम्बा इतिहास रहा है।राजनेताओं ने भी ये यात्राएँ की हैं और सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने भी।राजनीतिक यात्राएँ अपेक्षाकृत ज्यादा हुयी हैं। राजनीतिक पदयात्राओं की शुरुआत का श्रेय महात्मा गांधी को दिया जाता है। 

एक तरह से महात्मा गांधी को राजनीतिक पदयात्राओं का जनक कहा जा सकता है।महात्मा गांधी अक्सर पैदल ही चला करते थे, जिससे आम लोगों से उनका सम्पर्क भी होता था और भारत के लोगों में स्वतंत्रता के लिए एक जनचेतना भी जागती थी। 

गांधीजी की ऐसी ही एक प्रसिद्ध पद-यात्रा ‘दांडी-यात्रा’ थी, जिसकी शुरुआत उन्होंने साबरमती से की थी। तब उनके साथ सिर्फ ७९ स्वयंसेवक थे और जब 386 किलोमीटर लंबी यह यात्रा 6 अप्रैल 1930 को खत्म हुई, तब महात्मा गांधी के साथ सैकड़ों लोग जुड़ चुके थे। इस यात्रा का इतना बड़ा असर हुआ था कि एक वर्ष तक पूरे भारत में नमक सत्याग्रह चलता रहा और इसी घटना से सविनय-अवज्ञा आंदोलन की बुनियाद पड़ी।

इस समय जो यात्रा चर्चा में है, वह कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की कन्याकुमारी से जम्मू-कश्मीर तक की ‘भारत-जोड़ो-यात्रा’ है। दरअसल,सवा-सौ साल पुरानी राहुल की पार्टी अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। यह यात्रा भले ही देश को जोड़ने, आपसी सद्भाव बढ़ाने और नफरत को मिटाने के उद्देश्य से शुरू हुई हो, लेकिन इस यात्रा का राजनैतिक मकसद साफ़ है और वह है पार्टी के जनाधार को मजबूत कर सत्ता में लौट आना। कौन नहीं जानता कि कुछ अपवादों को छोड़कर, राजनीतिक-यात्राएं अक्सर वे पार्टियां और नेता निकालते हैं, जो सत्ता से बाहर हुए होते हैं और इन यात्राओं के ज़रिए वे वोटों की फसल को काटना चाहते हैं।राहुल की यात्रा में हर तरह के लोग शामिल हो रहे हैं। अग्रिम पंक्ति में वे हैं जो अच्छी हैसियत रखते हैं और महंगाई या बेरोज़गारी उनका कुछ नहीं बिगाड़ रही। रही बात शेष जनता-ज़नार्दन की, उसे तो वायदे/घोषणाएं सुनने की आदत पड़ गयी है। जब तक जनसंख्या के विस्फोट को रोका नहीं जाता, कोई भी सरकार आये, कतनी भी यात्राएं निकलें,महंगाई और बेरोज़गारी दूर नहीं हो सकती।यात्रा के दौरान राहुल ने कहीं भी इस अहम मुद्दे पर बात नहीं की।

एक बात और, गरीबी हटाने वाली या रोज़गार के लिए आवाज़ बुलंद करने वाली यात्राएँ तभी प्रभाव छोड़ती है जब उनका मुखिया खुद गरीब या बेरोज़गार हो और वर्षों से इस अभिशाप को मिटाने के लिए संघर्षरत रहा हो।समर्थ और साधन-सम्पन्न से गरीबी,महंगाई आदि पर प्रवचन दिखावा ही लगते हैं क्योंकि ये बातें भोगे हुए यथार्थ से जुडी नहीं होतीं।

वैसे,राहुल गांधी की यह यात्रा आधुनिक युग में भारत देश की ही नहीं, संभवतः दुनिया की सबसे लंबी दूरी की पदयात्रा है।अगर यह अपने मंतव्य में सफल रहती है तो यह यात्रा अपने आप में एक इतिहास रचेगी।

शिबन कृष्ण रैणा

सम्प्रति दुबई में

DR.S.K.RAINA
(डॉ० शिबन कृष्ण रैणा)
MA(HINDI&ENGLISH)PhD
Former Fellow,IIAS,Rashtrapati Nivas,Shimla
Ex-Member,Hindi Salahkar Samiti,Ministry of Law & Justice
(Govt. of India)
SENIOR FELLOW,MINISTRY OF CULTURE
(GOVT.OF INDIA)
2/537 Aravali Vihar(Alwar)
Rajasthan 301001
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