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व्यंग्य यात्रा के आगरा व्यंग्य महोत्सव में गूँजे ठहाके

‘व्यंग्ययात्रा’ पत्रिका की और से आगरा में दो दिवसीय ‘आगरा व्यंग्य महोत्सव’ का आयोजन राष्ट्रीय कवि संगम, आगरा के सहयोग से आगरा के चन्द्र पुष्प पैलेस, होटल में किया गया।कार्यक्रम की अध्यक्षता धौलपुर से वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री अरविंद तिवारी ने की।

इस मौके पर स्थानीय व्यंग्यकारों के साथ दीपक सरीन, डॉ. अनुज त्यागी,व ढपोरशंख का भी सम्मान किया गया। इस मौके पर समाचार4मीडिया डॉट कॉम के संपादकीय प्रभारी और युवा व्यंग्यकार अभिषेक मेहरोत्रा, वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय व डॉ. लालित्य ललित मौजूद थे। इस सत्र में दीपक सरीन व अनुज त्यागी के साथ सौम्या दुआ व डॉ लालित्य ललित के तीन कविता संग्रहों का भी लोकार्पण किया गया।इस मौके पर दीपक सरीन व सौम्या दुआ ने अपने गीतों से उपस्थित जन समूह को मन्त्र मुग्ध कर दिया।

शाम के सत्र में गद्य व्यंग्य पाठ में दर्जन भर रचनाकारों ने अपनीव्यंग्य रचनाओं का पाठ किया। इस अवसर पर लालित्य ललित, अभिषेक मेहरोत्रा, रणविजय राव, रमाकांत ताम्रकार इत्यादि ने अपनी व्यंग्य रचनाओं का पाठ किया।

मंचस्थ विद्वानों में मुम्बई के गोपी बूबना, बिलासपुर के डॉ. सोमनाथ यादव व अनवरत के सम्पादक रांची से दिलीप तेतरबे प्रमुख रहे।Inline image 3

कार्यक्रम का संचालन डॉ अनुज त्यागी ने किया। कार्यक्रम उपरांत स्थानीय समन्वयक दीपक सरीन ने लालित्य ललित के जन्मदिन के उपलक्ष्य पर केक कटवा कर व्यंग्यकारो के संग जश्न मनाया।

मुख्य अतिथि रहे झारखण्ड से अनवरत पत्रिका के सम्पादक श्री दिलीप तेतरबे। विशिष्ठ अतिथि परसाई की नगरी जबलपुर से वरिष्ठ व्यंग्यकार रमेश सैनी रहें। सानिध्य रहा सुनील जैन राही और रणविजय राव का।

व्यंग्ययात्रा के गद्य व्यंग्य पाठ सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे एम.पी. ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन स्क्वाड्रन लीडप ए.के.सिंह ने व्यंग्ययात्रा को 21000 रुपये की धनराशि का चेक भेंट करते हुए कहा कि व्यंग्ययात्रा निश्चित ही अपने मिशन को लेकर चल रही है, आने वाले समय में अगला आयोजन हमारे परिसर में सभी सुविधाओं के साथ आयोजित किया जाएगा।

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आरम्भिक वक्तव्य देते हुए डॉ प्रेम जनमेजय, सम्पादक, व्यंग्ययात्रा ने कहा, आज आलोचना के मायने बदल गए। आज जरूरत है कि सामने वाले को भी पहचाना जाना चाहिए। नई पीढ़ी क्या लिख पढ़ रही हैं, इस पर चर्चा होनी चाहिए। आज व्यंग्य के विषय नहीं है, किसी के पास बात करने के लिए। हमारी इस यात्रा में देश के अनेक रचनाकारों से सहयोग मिला और मिल रहा है। आने वाले समय में जालन्धर,पटना,कुल्लू में भी आयोजन किये जायेंगे। हमारी कोशिश यह रहती है कि हम हर आयोजन में नए-नए विषयों पर चर्चा करें और अपनी आहुति रचनात्मक स्तर अपना सहयोग प्रदान करें।

झारखण्ड से आमन्त्रित व्यंग्यकार व अनवरत पत्रिका के सम्पादक दिलीप तेरतबे ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि समय विधाता है। समय बलवान है,वह सभी को देखता है, उसमें सबकुछ है। व्यंग्यकार की भूमिका बड़ी होती है,जब व्यंग्यकार देखता है कि सीधी उंगली से धी नहीं निकल रहा तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है। उंगली की टेढ़ा करना ही पड़ता है।

इस मौके पर अपनी यादों के झरोखे से कुछ ऐसी मधुर स्मृतियों को सांझा किया,जिसमें जीवन के प्रति कुछ एहसास थे। उन्होंने यह भी कहा कि रोज-रोज बढ़िया व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। लिखना भीतर का वह संत्रास है जो आपने भोगा है,महसूस किया है, तभी उस अनुभूति को आप महसूस कर पाएंगे। आज व्यंग्यकार को व्यंग्य की चिंताओं के प्रति भी सजग रहना होगा। व्यंग्य के नाम कई स्कूल चल रहे है,उनकी भूमिका को भी समझना होगा। श्रीलाल शुक्ल हमारे सामने है,रवींद्रनाथ त्यागी है।उनका काम बोलता है। एक सच्चा व्यक्ति ही व्यंग्यकार होता है,वह समय की पहचान को अपने सूक्ष्म अन्वेषण से अन्वेषण कर सकें।व्यंग्यकार को शालीन होना होगा, भाषा के प्रति,यह उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। व्यंग्यकार को सोचना होगा कि उसकी दृष्टि क्या है, उसकी विचारधारा से कौन सा वर्ग लाभान्वित होने वाला है,यह अवश्य देखना होगा। बिना फील्ड में गए आपको अनुभव नहीं मिल सकते,इसलिए फील्ड का अनुभव होना बेहद लाजिमी है।

नए व्यंग्यकार डॉ अनुज त्यागी ने अपनी बात रखते हुए कहा,आज सोशल मीडिया ने एक ऐसा समाज दिया है जो सत्ता पक्ष के भी है और विरोधी पक्ष के भी है। यह हमारा नजरिया है जो हम देखते है वही तो लिखेंगे। मैं तो कहूंगा कि हमारे लेखन में आप वही पाएंगे, जो हम जीते है। शहर में पढ़े लिखे है, तो हमारे व्यंग शहरी ही होंगे। हम प्रेमचंद पर नहीं लिख पाएंगे। जो महसूस करेंगे उसी को अपने लेखन का विषय बनाएंगे। आज सब सामने है,जो पठनीय होगा,वह टिकेगा,वह पढ़ा जाएगा। सबका अपना ऑब्जर्वेशन है, उसी के आधार पर उनका लेखन निर्भर करता है कि वह टिकेगा अथवा बाजार से गायब हो जाएगा। आज शरद जोशी को पढ़िए तो समझ आता हैं कि लेखन के प्रति हमारी चिंताएं कितनी मौलिक है और लेखक को कितना समर्पित होना पड़ेगा।

अनुज ने कहा कि कई महीनों से बैचेनी मन में थीं कि व्यंग्य में कहानी का तत्व कैसे लाऊं, इस पर चिंतन जारी है। नई पीढ़ी को भी लेखन के प्रति ईमानदारी का भाव लाना होगा, तभी वह लेखन सार्थक होगा। आज हड़बड़ी से बचना होगा।

स्थानीय रचनाकार अंशु प्रधान ने कहा, हमें दर्द को महसूस करना होगा वह तार्किक शक्ति की गहराई को समझना होगा,यह लेखन के लिए अनिवार्य है। इस आयोजन में आकर मुझे और मेरी सोच को नया आधार मिला हैं।

मशहूर साहित्यकार हरिशंकर परसाई की नगरी जबलपुर से पधारे रमाकांत ताम्रकार ने कहा, आज यह देखे तो इकीसवीं सदी में यह बात जनहित में जाहिर हो चुकी है कि आज पठनीयता का स्तर या मापदंड काफी कम हो गया है, यह चिंताएं हमारी सृजनशीलता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती है कि हमारा व्यंग्य कहाँ जा रहा है, कितनी पत्रिकाएं व्यंग्य के प्रति सचेत है और स्थान दे रही है। आज कपिल शर्मा जैसे फूहड़ लोगों ने व्यंग्य को काफी नुकसान पहुंचाया है। व्यंग्य लेखक को सहारा देता है कि वह विसंगतियों पर व्यवस्थाओं पर चोट करता है। व्यंग्य के कई मुद्दे ऐसे है जो विश्व पटल की समस्याओं पर करारी चोट करते है।हमें व्यंग्य की चिंताओं को समझना होगा।

दिल्ली से आमन्त्रित सुनील जैन राही ने कहा, व्यंग के विषय बदल गए है, मैं पलायन करना चाहता हूँ,गांव जाना चाहता हूं। छोटी-छोटी बातों को आधार बना चुके सुनील जैन राही ने सभी श्रोत्राओं को मन्त्र मुग्ध ही नहीं किया,अपितु सभी पाठकों को अपने कहन के प्रति आकर्षित भी किया।

ग्वालियर से आमन्त्रित वरिष्ठ पत्रकार व व्यंग्यकार राकेश अचल ने कहा, आज व्यंग्य चाहे कविता में हो या गद्य में हो, उसके प्रति हमारी चिंताओं का मौलिक होना अनिवार्य है। कई देशों में व्यंग्य के प्रति अपनी चिंता पक्ष को रख चुके राकेश अचल ने कहा कि कविता भी व्यग्य का एक बहुत अच्छा फॉर्मेट है, उस पर काम करने की बहुत आवश्यकता है। चाहे किसी भी भाषा की कविता हो वह एक हथियार की भूमिका निभाने में सक्षम हैं। हमें स्थानीय बोलियों को भी आधार बनाना होगा,कविता का वह आदर्श पक्ष होगा।

‘लोकसभा’ दिल्ली से रणविजय राव ने कहा कि यह विषय इतना वृहद है जिस पर व्यापक चर्चा हो सकती है, मैं इतना कहूंगा कि व्यंग्य हड़बड़ी में नहीं रचा जाना चाहिए, व्यंग्य या लेखन को समय चाहिए ताकि वह खरा सोना हो जिसकी मांग बनी रहती है और सोने की मांग किसी भी समय पर पड़ सकती है और यह सही मायने में असल व्यंग्य है।

जबलपुर से वरिष्ठ लेखक रमेश सैनी ने कहा कि आज व्यंग्य का स्वर्ण काल चल रहा है। आज व्यंग्य बहुत तेजी से लिखा जा रहा है। आज आलोचक की हालत देखिए, अंधा बांटे रेवड़ी,अपने अपने को दें। इस चलताऊ फार्मूले से बचना चाहिए। आज ऐसे आलोचक की आवश्यकता है जो सही निर्धारण कर सकें। आज व्यंग्यकार छपना तो चाहता है पर व्यंग्य के प्रति गंभीर नहीं है, इस बात पर जोर देकर यह देखना होगा कि हमारी चिंताएं कितनी वाजिब है। आज अनेक मठ बन रहे है,कितने बेवकूफ किस्म के लोग आज एक दूसरे को पूज रहे है, इस प्रवृत्ति से बचना होगा। हम कितने दकियानूसी हो चले है, आज देखने का नजरिया बदल रहा है, आज थूक कर चाटने की आदत पहली प्राथमिकता में शुमार होने लगा है,इस प्रवृत्ति से बचना होगा। जो ईमानदार होगा वह असली व्यंग्यकार होगा। आज आपसी तालमेल को बिठाना होगा। समाज से मतलब रखना होगा।

सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री अरविंद तिवारी ने कहा, हमें यहां मुक्तिबोध की बात याद आ रही है कि मूल से पृथक नहीं होना पहली शर्त है। भारतेंदु की बात करें तो उस काल में हास्य ज्यादा था, तब वह व्यंग्य की शुरुआत थीं, उस समय की मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर उस समय की चिंताएं बेहद मौलिक थीं। जब मेरे व्यंग्य पहले छपते थे, उसका विषय कुएँ होते थे, लेकिन तब के विषय आज हँसी का विषय है, आजकल कुएँ देखने में भी नहीं मिलते, कभी-कभी फिल्मों में यह दृश्य नजर आ जाता है। आज हालात बदले है, सरोकार बदले है। आज देखिए अन्य विषयों में क्या आंदोलन चल रहे है,क्या रोमांच आपको विचलित करते है या आपके भीतर एक नए तरह की ऊर्जा आपको छूती है। व्यंग्य जैसे जैसे परसाई के युग में उन्नति कर रहा था, लेकिन आज बढ़िया कार्टून देखने को कहां मिलते है। यह बड़ी चिंतनीय पक्ष हैं। इसको गंभीरता से लेना होगा। मैंने जितने व्यंग्य उपन्यास लिखे है,उसमें ऑब्जरबेशन का होना बेहद जरूरी है। हमें देखना होगा कि हर कोई क्यों उसे नहीं लिख पाता है। व्यंजना और लक्षणा दो कारक है जिसकी शक्ति को समझना होगा।

साभार- http://samachar4media.com से



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