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प्राचीन ऋषियों की वैज्ञानिक सोच है अधिक मास

आज से अश्विनअधिक मास प्रारम्भ हो गया है , अधिक मास को पुरुषोत्तम मास और दामोदर मास के नाम से भी जानते है। पौराणिक और आध्यात्मिक पक्ष की बजाय आपकी जानकारी हेतु अधिक मास के गणितीय पक्ष को प्रस्तुत करने की मंशा है।

वर्तमान में दो प्रकार के मास प्रचलन में है एक सौर मास और दूसरा चंद्र मास तथा चंद्र मास को अमांत और पूर्णमान्त दो प्रकार से मानते है।

जब किसी चंद्र मास में सूर्य संक्रांति यानि सूर्य का राशि परिवर्तन नहीं होता तब अधिक मास होता है। और इसकी व्यवस्था इसलिए की गयी ताकि चंद्र मास और सौर मास में समन्वय स्थापित किया जा सके।

सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे से कुछ अधिक होता है जबकि चंद्र वर्ष 354 दिन और 12 घंटे से कुछ अधिक । अतःचंद्र मास सौर मास से करीब 11 दिन कम होता है और चूँकि तीन साल में यह अंतर 33 दिन के लगभग जो जाता है और क्योंकि 33 दिन एक माह से अधिक का समय है इसलिए ऋषियों ने अधिक मास की व्यवस्था करके सौर और चंद्र मास में समन्वय स्थापित किया।

अधिक मास हर तीसरे साल आता है दो अधिक मासों में कमसे का 2 वर्ष चार महीने और अधिक से अधिक 2 वर्ष 11 महीने का अंतराल संभव है। अधिक मास वैसाख, ज्येष्ठ आषाण, श्रावण, भाद्र पद और अश्विन यानि इन्ही 6 महीनों में संभव है।

अधिक मास की तरह क्षय मास भी होता है जो 19 और 141 साल के अंतराल पर आता है और वर्तमान पीढ़ी क्षय मास नहीं देख पायेगी, क्योंकि इस सदी में अब कोई क्षय मास नहीं आएगा। क्षय मास केवल् अगहन, पौष और माघ महीने में ही संभव होता है।

अधिक मास में सभी प्रकार के शुभ मांगलिक कार्य स्थगित रहतें है और धार्मिक कार्य प्रचुर मात्रा में करने की अनुशंषा शास्त्रो ने की है। इस महीने में विष्णु भगवान की पूजा अर्चना से विशेष लाभ होता है ऐसा विभिन्न विद्वानो का मत है। वेदोक्त विष्णु सूक्त अथवा विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ इस महीने में जरूर करना चाहिए।

(लेखक चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं व अध्यात्मिक विषयों पर शोधूपर्ण लेखन करते हैं)

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