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धारा 35 एः हकीकत जो हर बार छुपाई जाती रही है ः2

1947 में जब भारत का विधान लिखा गया उस समय भारत के नेता पहली बार एक विधान लिख रहे थे इस लिए उस समय किसी बात की ओर उनका सूक्ष्मता से ध्यान न गया हो ऐसा हो सकता है इस लिए कुछ कमियाँ उस समय की सोच और फैसलों में रह सकती है . इसी तरह से जम्मू कश्मीर का विधान लिखते हुये भी हो सकता था, इस लिये विधान में संशोधन करने के प्रभ्धान और जम्मू कश्मीर में स्थाई निबासी ( जिस को आम तोर पर स्टेट सब्जेक्ट के नाम से जाना जाता है ) सम्बन्धी सेक्शन 8 और 9 को रखा गया था पर इन सेक्शन का इस्तमाल समय के साथ जरूरी सुधारों के लिये नहीं किया गया जिस कारण आज जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी की श्रेणी बाले भारत के नागरिक भी अनुच्छेद 35A को हटाने या इस के न होने की बात कर रहे हैं !

अगर यह भी मान कर चलें की आर्टिकल 35A भारत संबिधान में उचित ढंग से रखा गया है तो फिर डॉ फारूक अब्दुल्लाह , सुश्री महबूबा मुफ़्ती जी और कश्मीर की सिविल सोसाइटी में आज सक्रिय हुए बंधुओं से कोई पूछे की क्यों:

(1) जम्मू कश्मीर की एक नारी जो जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी की श्रेणी ( जिस को आम तोर पर स्टेट सब्जेक्ट के नाम से जाना जाता है ) में आती है को भी अपनी मर्जी से अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं है , वह यदि किसी नॉन स्टेट सब्जेक्ट ( जो जम्मू कश्मीर का स्थाई निवासी न हो ) से शादी करती है तो उस के पति और बच्चों को जम्मू कश्मीर में सरकारी सेवा में जाने , अपने नाम से घर बनाने का अधिकार नहीं होगा ! इस से बड़ा ह्यूमन राइट्स और नारी के अधिकारों का हनन और क्या हो सकता है ! इस राज्य के आधे स्थाई निबसिओं का भी अधिकार हनन हो रहा है क्यों कि इस प्रकार के नियमों को संग्रक्षण अनुच्छेद 35A के अंतर्गत मिला हुआ है !. यह कहना भी गलत नहीं होगा की स्थाई निबासी श्रेणी बलों में भी भेद भाव हो रहा है ! इस में सुधार किया जा सकता है , जम्मू कश्मीर की सेक्शन -8 और 9 में इस के लिए रास्ता है पर उस रस्ते पर कश्मीरी नेता नहीं चलना चाहते , क्यों ? यही प्रश्न दिसम्बर २०१३ में बरखा दत्त ने डॉ फारूक अब्दुल्ला से पूछा था और उन का उत्तर था मैं तो इस में सुधार करना चाहता हूँ पर मेरे लोग / साथी नहीं मानते और वे क्यों नहीं मानते इस बात का उत्तर वे नहीं दे सके थे. इस तरह से यह अनुच्छेद आज के दिन जम्मू कश्मीर के सतही निवासी का भी अहित करता है .

2. साल 1947 के बिभाजन के समय पाकिस्तान से करीब ५७०० परिवार जम्मू कश्मीर में आए थे और उन को उस समय महाराजा ने इस राज्य में रुकने दिया था ! साल 1954 में उन परिवारों को एक सरकार आदेश ( Notification No.578-C 0/5 1954 of 7.5.1954 ( State Cabinet’s decision No. 9578-C of 1954) के तहत यहाँ पर कुछ जमीनों पर रहने और उन पर खेती करने की इजाजत भी दे दि गई थी और वे लोग आज करीब ६ दशक से इस राज्य में रह रहे हैं और खेती कर रहे है पर उन को जम्मू कश्मीर का स्थाई नागरिक नहीं माना जाता जिस कारण वे न सरकारी सेवा में जा सकते हैं, न सरकारी मेडिकल कॉलेज में जा सकते हैं , न ही विधान सभा चुनाव में भाग ले सकते है , न ही … ! डॉ फारूक अब्दुल्लाह कहते हैं स्टेट सब्जेक्ट का प्राभ्धान महाराजा हरी सिंह ने 1927 में किया था और यहाँ की सरकारें उसी पर चल रही है ! फारूक जी से कोई पूछे की अगर ऐसा है तो फिर जब महाराजा हरी सिंह के समय जो लोग सरकारी इजाजत से ( “इजाज़तनामे” से ) यहाँ घर बना कर 10 साल तक रह लेते थे उन को “रियायतनामे” के तेहत जम्मू कश्मीर का state सब्जेक्ट क्लास –III बना लिया जाता था और सब अधिकार मिल जाते थे लेकिन आप के सरकारों ने पाकिस्तान से 1947 में आए शर्णार्थी परिवारों को यहाँ सरकारी अनुमति से करीब 70 साल से जम्मू कश्मीर में रह रहे हैं और भारत के नागरिक हैं उन के वार वार प्रार्थना करने पर स्थाई नागरिक के अधिकार क्यों नहीं दिए जब के आप ऐसा जम्मू कश्मीर के संबिधान से धारा -8 और 9 के अंतर्गत तो कर ही सकते थे ?. उच्चतम न्यायालय ने भी उन के लिए साल 1987 में कुछ करने की सिफारिश की थी और अनुच्छेद 35A के होने कारण कोई आदेश नहीं दिया था

(Hon’ble Supreme Court of India had in the case of Bachan Lal Kalgotra vs State Of Jammu & Kashmir And Others (Writ Petition No. 7698 of 1982 2 SCC 223 pertaining to 1947 West Pakistan refugees settled in J&K ) on 20 February, 1987 made observations in this regard with particular reference to Art35A of Constitution of India .. Quote :-“ It is to be noticed here that these provisions are not open to challenge as inconsistent with the rights guaranteed by Part III of the Constitution of India because of “the Constitution (Application to Jammu & Kashmir) Order, 1954” issued by the President of India under Art. 370(1)(d) of the Constitution by which Art. 35(A) was added to the Constitution in relation to the State of Jammu & Kashmir. …. In the circumstances, in view of the peculiar Constitutional position obtaining in the State of Jammu & Kashmir. We do not see what possible relief we can give to the petitioner and those situate like him. All that we can say is that the position of the petitioner and those like him is anomalous and it is up to the Legislature of the State of Jammu Kashmir to take action to amend legislation, such as, the Jammu & Kashmir Representation of the People Act, the Land Alienation Act, the Village Panchayat Act, etc. so as to make persons like the…….. This can be done by suitably amending the legislations without having to amend the Jammu & Kashmir Constitution …. We do hope that the claims of persons like the petitioner and others to exercise greater rights of citizenship will receive due consideration from the Union of India and the State of Jammu & Kashmir. We are, however, unable to give any relief to the petitioners….” : ). कारण जम्मू कश्मीर के स्थाई निबासी का हित कम और राजनीतिक गोरखधंधा ज्यादा रहा है .

ऐसे ही 1947 में पाकिस्तान के हमले से जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान अधिकृत भाग से हजारों परिवार अपनी जमीन जायदाद छोड़ कर जान बचाने के लिए इस और आ गए थे , हजारों बच्चे , बूड़े , औरतें कतल कर दिए गए थे , अधिकतर लोग अपने सरकारी / जाति दस्तावेज भी साथ नहीं ला पाए थे , कई परिवार आखिर तक दुश्मन का सामना करते रहे थे और मीरपुर के लोगों ने भारत के साथ अधिमिलन होने ( २६ अक्टूबर 1947) के ३० दिन वाद (२५ नवम्बर 1947) को अपने घर को छोड़ा था! साल १९५० में उस समय के प्रधानमंत्री शेख मोहमद अब्दुल्लाह ने एक आदेश नीलाक कर साफ़ शब्दों में इस को विस्थापित का नाम दिया था क्यों कि इन्हों ने अपने घर दुश्मन के हमले के कारण छोड़े थे और सरकार इन को संग्रक्ष्ण नहीं दे पाई थी ! सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन में उस समय ५३०० परिवार ऐसे थे जो जम्मू कश्मीर के निबासी थे ( स्टेट सब्जेक्ट) थे और वे उस समय के हलात को देखते हुये अपने जीवन निर्वाह के लिए भारत की अन्य रियासतों में रहने को रहने को गए ! यह लोग हर प्रकार से जम्मू कश्मीर के स्थाई निवासी की श्रेणी में आते हैं पर यहाँ भी देखिये साल १९७१ में जम्मू कश्मीर की विधान सभा में कांग्रेस के राज में एक एक्ट पास हुआ ( THE जम्मू एंड कश्मीर Displaced Persons ( Permanent सेटलमेंट ACT १९७१ ACT No.. X ऑफ़ 1971) जिस में इन परिवारों को पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर से विस्थापित परिवारों की श्रेणी से नीकाल दिया गया , एक तरह से त्याग दिया गया और जम्मू कश्मीर में किसी भी नेता ने इस के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई, जम्मू क्षेत्र से भी किसी ने नहीं इस पर प्रश्न किया !

(“-displaced person. Means any displaced person (DP) who is permanent of that State and who on account of setting up of the Dominions of India and Pakistan, or on account of civil disturbances or fear of such disturbances, in any area of the State occupied by Pakistan has, after the first day of March 1947 left or have been displace from his place of residence in such are and who has been subsequently residing outside such area in the State and also includes the successors in interest of any such person” ).1971 Act को बिना बदले साल 2016 में 1947 के विस्थापितों के साथ 1965 और 1971 के विस्थापितों को भी जोड़ लिया गया पर 1947 के ५३०० परिवारों को जम्मू कश्मीर वाहर रह रहे थे उन की ओर किसी का ध्यान 2016 में भी नहीं गया ! विस्थापित इतना ही नहीं साल २०१4 में कांग्रस –एनसी सरकार ने भारत सरकार को 1947 pojk विस्थापित परिवारों को कुछ अनुधन देने के लिए एक प्रस्ताब भेजा और उस में इन ५३०० परिवारों को वाहर रखा गया ! मैंने इस का विरोध लिख कर किया ! साल 2016 ( मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया – FFR Division, No 31/01/2011 / -R&SO 22दिसम्बर 2016 s/d डायरेक्टर Rehabilitation ) में प्रधान मंत्री के डेवलपमेंट पकेज 2015 के तेहत एक आधा अधूरा 5.5 लाख रूपए प्रति परिवार सहायता राशि का आदेश हुआ और उस में भी इन 5300 परिवारों को जम्मू कश्मीर के स्टेट सब्जेक्ट होने के बाबजूद भी वाहर रखा गया ! अनुच्छेद 35A तो इन परिवारों को कहीं भी नहीं नकारता था , यह अनुच्छेद इन के के लिए भी था पर इन को भी बाहर किया गया शायद इस लिए कि इन में अधिकांश कश्मीर घाटी के वाहर के थे ? 2016 की भारत सरकार भी ‘कश्मीर घाटी’ के नेताओं के मत के साथ बह गई , आखिर क्यों ?.

4. जम्मू कश्मीर रियासत और यहाँ रहने बालो के लिये एक सेना के सिपाही जिस ने राज्य की सीमानों पर शत्रु से लड़ते हुये परम वीर चक्र जैसा सम्मान हासिल किया हो जब कि उस का परिवार जम्मू कश्मीर का स्थाई निबासी न हो ( स्टेट सब्जेक्ट न हो ) से बड कर सम्मान एवं प्रेम दर्शाने योग्य कोन हो सकता है ! पर अगर किसी को यह पता चले कि सेना के ऐसे 15 जवान हुए हैं जिन्हों ने जम्मू कश्मीर का स्टेट सब्जेक्ट न होते हुए भी परम वीर चक्र हासिल किया है और किसी भी वीर के परिवार का कोई सदस्य न जम्मू कश्मीर में सरकारी सर्विस में है और न ही सरकार ने किसी ऐसे परिवार जहां रहने की अनुमति दि है तो यह बात उस को जे ही सन्देश देगी की जम्मू कश्मीर के लोग बहुत ही नशुकरे हैं.! जो लोग यह कहते हैं कि अनुच्छेद 35A की छत्र राज्य को कश्मीर का मुस्लिम मेजोरिटी चेहरा बचाए रखने के लिए है दिया गया है उन से कोई यह पूछे कि 10-15परिवारों के राज्य में आने से कौन से डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी ) बदल जानी थी ? अभी तक कुल २१ परम वीर चक्र मिले हैं और 15 नॉन स्टेट सब्जेक्ट्स ( जो जम्मू कश्मीर के स्थायी निबासी की श्रेणी में नहीं आते है ) ने जम्मू कश्मीर की सीमाओं पर लड़ते हुए हासिल किए हैं. यदि यह महाराजा हरी सिंह का समय होता तो परम वीर चक्र जैसे सम्मान से शुशोभित जनों को इस राज्य का state सब्जेक्ट / सथाई निवासी बना कर यहाँ की सरकार अपने को सम्मानित मानती.

5. 200के करीब जो परिवार साल 1957 में जम्मू श्मीर राज्य में सफाई कर्मचारी आन्दोलन से पंगु हुई जम्मू म्युनिसिपल कौंसिल का भोज उठाने के लिए उस समय के प्रधान मंत्री बक्शी गुलाम मोहमद जी के प्रयास से पंजाब से जम्मू आए थे वे आज 60 साल बात भी अगर सरकारी सेवा में जाना चाहें तो सिर्फ सफाई कर्मचारी की नौकरी ही कर सकता हैं क्यों कि उन को जहां रहने के अधिकार बैसे नहीं मिले हैं जैसे एक जम्मू कश्मीर के स्थाई निबासी को हैं ! इन के परिवार के सदस्यों को एक तरह से अपने जीवन को सुधारने और समाज में सम्मान रहने का अधिकार नहीं दिया गया है ! जो लोग आप के जीवन को स्वस्च रखते हैं आप उन को भी एक सामान्य नागरिक का जीवन जीने का अधिकार जम्मू कश्मीर राज्य में नहीं देते हैं जब कि जम्मू कश्मीर का संबिधान और न ही अनुच्छेद 35A सरकार / विधायका को ऐसा करने से रोकता हैं , हाँ यह जरूर है कि आप अगर ऐसा न करें तो ‘सरकार’ को बचाता जरूर है ! इन लोगों के बच्चे उच्च तकनिकी शिक्षा नहीं ले सकते क्यों की प्राइवेट कॉलेज की भारी फीस यह दे नहीं सकते. इस लिए इन के बच्चे पड़ने से भी दूर भागते है ! यह सारे परिवार जम्मू क्षेत्र में ही रहते हैं ! इनको बाल्मिक समुदाय भी कहते हैं और वतमान में इस समुदाय के पढ़े लिखे युवाओं को भी अंततः सफाई कर्मी ही बनना पड़ता है। कुछ युवा अपने भविष्य को अँधेरे में देखते हुए राज्य से पलायन करने के लिए भी विवश हो सकते हैं.

6. ऐसे ही इस राज्य के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटललों और मेडिकल कालेजों में कहा जाता है कि प्रमाणित स्तर के विशेषज्ञ/ अनुभवी/ बरिष्ठ डॉक्टर्स / अध्यापक नहीं हैं और दूसरे राज्य से लोग आ नहीं सकते क्यों कि राज्य सेवा के नियम इज्जाजत नहीं देते ! यह स्थिति कई सालों से है और सेवा न्यमों में सुधार करने से अनुच्छेद 35A रोकता नहीं है , राज्य के विधान में नियमों में बदलाव करने के लिए सेक्शन 8 और 9 भी हैं , बैसे भी ऐसे निर्देश राज्य सरकार / राज्य कार्यकारणी भी दे सकती है और पहले भी ऐसा हुआ है .कोई पूछे कि अब क्यों नहीं होता और अगर जम्मू कश्मीर के राजनेताओं पर कोई यह आरोप करे कि वे जान बूज कर इस राज्य को विवादों में रखना चाहते है तो गलत नहीं कहा जा सकता .७. अखिल भारतीय स्तर पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए कॉमन पूल है जिस में सभी राज्य अपने कॉलेजों की 15% सीटें देते है और उन के लिए पूरे भारत से प्रार्थी भाग ले सकते हैं पर जम्मू कश्मीर राज्य उस पूल से नहीं जुड़ा है जिस यहाँ के प्रर्थिओं को कई हजार सीट्स में भाग लेने का अवसर नहीं मिलता है ! इस के पीछे की सोच भी तर्क संगत नहीं है क्यों कि 40 से 50 सीटों के एवज में कई सो सीटें बच्चों को मिल सकती हैं! इस में बदलाब करने के कई सुजाब सरकारों को दिए गए पर आज तक कोई असर नहीं दिखा है !8. ऐसे ही कुछ और भी प्रश्न उन लोगों को किये जा सकते हैं जो आज जम्मू कश्मीर राज्य की पहचान की बात अनुछेद 35A और महाराजा हरी सिंह के समय में वनाये गए state सब्जेक्ट कानून की दुहाई दे कर कर रहे हैं.

धारा 35 एः शहीद सैनिकों की राष्ट्र भक्ति पर भी सवाल उठाती है-1

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